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Thursday, July 9, 2026

अच्छा वक्त

                                                      योगिनी एकादशी 

जैसे बुरा वक्त का एहसास हो जाता है वैसे ही अच्चे वक्त का भी एहसास हो जाता है। न्यूजरूम का दरवाजा अगर खुला हो तो पूरा कॉरीडोर वहां से साफ दिखाई देता है।

नीचे भाग्य से फोन पर बात करने के बाद जब वापस उपर आया तो पीछे सा आवाज आई। भारती ने आवाज दी थी। गया तो वहां सर भी थे। सर ने कहा कि दिल्ली को योगिनी एकादशी पर स्टोरी चाहिए। सर जिस तरीके से कह रहे थे उससे यही लगा कि वह यह मानकर चल रहे थे कि मैं चौंक जाऊंगा और पूछूंगा का यह एकादशी क्या होता है। लेकिन वैसा हुआ नहीं। जैसे ही उन्होंने योगिनी एकादशी कहा मैंने कहा वो तो कल है न! इसके बाद वह चकित से रह गये और वहां जितने लोग न्यूजरूम में थे सबने देखा कि किस तरह उन्होंने शाबाशी वाले लहजे में कहा कि तुमको पक्का पता होगा यह मुझे मालूम था। यह एहसास सुखद था।

इसके समानांतर दूसरी घटना हो रही थी कामोठे में। जब मैने पिछले दिनों तीनों कैलेंडर बदले तो मैं एकादशी की तारीख देख रहा था। यूं तो मैं एकादशी नहीं करता हूं लेकिन इस कोशिश में रहता हूं कि कम से कम उस दिन चावल नहीं खाऊं। यह मां-पापाजी की एक परंपरा है जिसे आगे चलाते रहने में कोई दिक्कत नहीं है। इसी क्रम में आज सुबह भात बनाते हुए मैंने देखा कि एकादशी कल है। मैंने गौर से देखा तो वहां लिखा था योगिनी एकादशी। 

यह एक संयोग ही था कि सुबह का देखा हुआ कैलेंडर ऑफिस में इतनी इज्जत दिलवा दिया। कैलेंडर यही कोई अस्सी या सौ रुपये में मैंने लिया होगा आज वह पैसा एक तरह से वसूल हो गया। 

Thursday, February 26, 2026

अंधकार ही अंधकार

                                                     ऐसा दौर...

पुणे में एक निचली अदालत के बाहर एक आदमी से आत्महत्या कर ली। बिना गूगल देखे जो याद है वह यह कि उसका कोई सिविल मैटर कोर्ट में चल रहा था जो हर तारीख को अगली तारीख में बदलता जा रहा था। जो खबरें छपी उसके मुताबिक मामला उसके जमीन से संबंधित था और बार-बार तारीख मिलने के बाद एक दिन उसने आत्महत्या कर लिया।

पिछले साल 16 अक्टूबर को हिंदुस्तान टाइम्स की वेबसाईट पर छपी इस खबर के मुताबिक उसकी उम्र इकसठ साल थी और वह उसके मामले की सुनवाई पिछले इक्कीस साल से हो रही थी। आखिरकार उसने कोर्ट के तीसरे फ्लोर से सवेरे करीब पौने बारह बजे छलांग लगाई और अपना वजूद समाप्त कर लिया। बाद में पुलिस को उसके पास से एक सुसाइड नोट मिला जिससे पता चला कि नब्बे के दशक में उसके पिता ने जिस पुश्तैनी जमीन को बेचा उस बिक्री को उसने कोर्ट में चुनौती दी थी और वह इस सुनवाई के दौरान घोर मानसिक प्रताड़ना से जूझ रहा था। उसे एक टुकड़ा दिया गया था लेकिन उसपर उसके भाई ने कंस्ट्रक्शन किया जिसे बात में कोर्ट ने स्टे लगाया लेकिन फिर स्टे हटा लिया गया। कुल मिलाकर चीजें हर स्तर पर उलझी हुई थी। उसकी बेटी को बयान दर्ज के लिए पुलिस ने बुलाया और पूरे मामले को कानूनी दृष्टिकोण से देखते हुए मामले को रफा-दफा कर दिया गया। कौन पड़े इस झमेले में कि वह मरने से पहले कितनी बार मरा था और कितनी बार मर रहा था...

ऐसी ही एक खबर थी पुणे की जहां पोर्श कार मामला। एक लड़के ने नशे में एक बेशकीमती कार से कुछ लड़कों को कुचल दिया। मौते हुई। पुलिस ने जांच की और मामला दबता गया। मामला एक बार फिर उफान मारा जब पता चला कि मेडिकल रिपोर्ट में तो ड्राइवर के खून में नशा नहीं मिला लेकिन सीसीटीवी से पता चला कि उसने थोड़ी देर पहले ही जमकर दारू पी थी। जांच फिर बढ़ी तो पता चला कि वहां के एक बड़े अस्पताल के कुछ बड़े अधिकारियों ने रुपये लेकर खून बदल दिये थे। यही कोई दो-चार लाख। कहीं चिता जली लेकिन कही पैसों की भूख भरी नहीं! ससून अस्पताल के चिकित्सा अधिकारी जिसने रक्त में नमूनो में बदलाव किया से लेकर उस लड़के के परिवार वालों को पहले बॉम्बे उच्च न्यायालय और बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत दे दी। ट्विटर पर बहुत लोगों ने बहुत कुछ लिखा लेकिन कुछ नहीं हुआ। अनिश अवधिया और अश्विनी कोष्टा की चिता जल गई और उन दोनों के जाने की टीस उनके परिवारों को ताउम्र रहेगी लेकिन किसे पड़ी है...


भागलपुर में विक्रमशिला ब्रीज पर एक महिला का अपने छोटे से बेटे के साथ पुल से कूदने के प्रयास करने के दौरान एक पुलिसवाला द्वारा बचाने का वीडियो वायरल हुआ था। हिम्मत जुटाकर देखा तो औरत भी गरीब थी और बच्चा एकदम ही अबोध था। ऐसी कुछ तो नाउम्मीदी होगी जो उस औरत को लगा होगा कि मर जाना ही अब एकमात्र उपाय है। यह वीडियो एकदम थर्रा देने वाला था।


Monday, November 24, 2025

खौफनाक रात


                                           आईजीआईएसएस का ई-एचडीयू

18 नवंबर की रात जो देखा वह दहला देने वाला था। इतनी बेचैनी, इतना डर, इतनी विवशता शायद पहले कभी नहीं देखी या महसूस की थी।

"मास्क पहन लो न", इतना मैंने उससे कहा था। ई-एचडीयू के चौथे बेड पर बैठा वह दम लगाकर सांस खींच रहा था। एक मौत वहां शाम में मेरे सामने हुई थी एक बुजुर्ग की और मैं वहां बेहद अशांत और बेचैन था। हर बिस्तर को देखकर लगता कि अब किसी की धड़कन रूक जाएगी! भयानक नकारात्मकता से भरा वह कमरा घुटन से भरता जा रहा था। पापाजी कभी आंख बंद रखते तो कभी खुली आंखों से सोए रहते तो कभी दम लगाकर उठते और बिस्तर से नीचे उतरने के लिए बेचैन होते। उनके हाथ बांध देने का भी ज्यादा असर नहीं हो पा रहा था क्योंकि उनकी विवशता देखकर मैं हाथ ढीला कर देता था और फिर वह उतरने लगते। एक बार तो उन्होंने पैर से मुझे पीछे किया और तब उतरे। इतना कमजोर देह में भी उनकी दृढ़ता कमजोर नहीं हुई थी।

मैंने नोटिस किया कि वह लड़का अब लेटा था। मुझे संदेह हुआ और मैंने गौर किया तो पाया कि उसे सांस लेने में तकलीफ़ भी नहीं होती दिख रही थी। मैं सहम गया क्योंकि ऐसा आभास हुआ कि वह अब सांस ले ही नहीं रहा। हरकत तेज हुई मेरे अंदर क्योंकि उसी समय बाहर से धर्मेंदर भी आया जो वहां नर्सिंग करता था। उसके पीछे-पीछे आंख मलते हुए काजल सिस्टर आई। उस लड़के की मां ने छाती पीटना शुरू कर दिया था।

 मैं बदहवास सा बाहर भागा और डॉक्टर जो कि कमरे से आंख मलते निकल रहा था उसे कहा कि अंदर पेनिक सिचुएशन है थोड़ा जल्दी चलिए। उस डॉक्टर के व्यवहार की वजह से मुझे पहले ही वह ठीक नहीं लगा था लेकिन नाईट शिफ्ट में उसी के हवाले ई-एचडीयू था तो मैं उससे सीधा पंगा नहीं ले सकता था। उसने आया और मरीज के परिजन को डांट लगाई कि ऑक्सीजन क्यूं नहीं लगाए थे जब बार-बार बोला गया था।

ये सब मैं अपनी आंखों के सामने होता देख रहा था। कभी उसकी मां की चीख देखता तो कभी उसके भाई की विवशता। फिर सीपीआर दी गई, तीन सुई दी गई, थोड़ी देर तक सबकुछ समझते हुए भी जान डालने की कोशिश की गई। हालांकि शुरू में सीपीआर के समय एक बार उसने चीखा तो मुझे गरूड़ पुराण की बातें याद आने लगीं कि जान कैसे निकलती है। भाग्य नीचे साई हुई थी। मैं मन ही मन यही सोच रहा था कि उसकी नींद न खुले।

सुबह देर तक उस लड़के का शरीर वहीं पड़ा रहा जैसे आमतौर पर सरकारी अस्पतालों में होता है। मुंबई लोकल, दफ्तर, दफ्तर का कमरा, अपना कमरा, कैंटीन की चाय, समोसा, ऑफिस का बगीचा इन सबके अलावा एक चीख-पुकार वाली जिंदगी भी कहीं चल रही होती है जहां लोग मर रहे होते हैं, तड़प रहे होते हैं, हार रहे होते हैं.

अगली सुबह मैं अपने अंदर अजीब से बेचैनी महसूस करने लगा। लग रहा था कि कैसे पिताजी को यहां से कहीं दूर ले जाऊं जहां हर तरह लोग हंस रहे हों, अच्छी बातें हो रही हो, ताजे फूल की खुश्बू आ रही हो, सुंदरकांड का पाठ हो रहा हो और वैसा सबकुछ हो रहा हो जो पापाजी को पसंद है।

है राम...


लाश...





Tuesday, August 15, 2023

 बावस्कर दंपति


ऐसे समय में जब न कहीं से कोई आवाज ही झकझोरती हो या फिर कोई खुश्बू ही भाती हो, बावस्कर दंपति से मिलकर अच्छा लगा।











Wednesday, April 19, 2023

हीनबोध

                                            

                                              पत्रकारिता से निर्जीवता तक!

सब कुछ फालतू बहुत तेजी से रहा है लेकिन कई बार लगता है कि कोई रह-रहकर आवाज देकर रोकना चाहता है। जैसे कि कोई कह रहा हूं कि इतनी तेज से भागे जा रहे हो बाद में कौन सा तुम पलट के वापस आओगे। 

सरसों की घटना रह रह कर ध्यान में आती है और मन अपराध बोध से भर जाता है। शनिवार को जब खारघर के सेंट्रल पार्क ग्राउंड में गया था तभी एक बार सोचा था कि बिना पंडाल के इतनी गर्मी को लोग भला कैसे झेल पाएंगे। गृह मंत्री की रैली में जितने लोगों के लिए जगह बनाई गई थी उतनी बड़ी रैली मुझे याद नहीं कि मैंने आखरी बार कब देखा था। जब शनिवार की देर रात दफ्तर के एक अधिकारी का फोन आया और उन्होंने बताया कि गृह मंत्री के कार्यक्रम को थोड़ा पहले कर दिया गया है तब लगा की हो ना हो यह गर्मी से लोगों को बचाने के लिए ही किया गया होगा। 

रविवार की सुबह जब कार्यक्रम वाली जगह पर पहुंचा तो बसों का काफिला देखकर ताज्जुब नहीं हुआ क्योंकि रैलियों में ऐसे दृश्य पहले अनगिनत बार देख चुका हूं। उनमें और इनमें कोई फर्क नहीं था सिवाय इसके कि मुझे और मेरी गाड़ी को बेरोकटोक कार्यक्रम स्थल तक जाने दिया गया। गाड़ी के आगे लगा भारत सरकार का वोट और मेरा हाव भाव शायद ऐसा था की व्यवस्था संभाल रहे हैं सेवकों ने मुझे बेवजह परेशान नहीं किया था।

गर्मी की तपिश नौ बजने से पहले ही महसूस की जाने लगी थी और मैंने तय कर लिया था कि मैं डीएसएनजी में ही बैठूंगा जहां एसी चल रहा था। करीब 1:30 2 घंटा गाड़ी में बैठने के बाद मुझे ऐसा लगा कि गाड़ी का एसी काम नहीं कर रहा है। इंजीनियर को बताया तो उसने हंसते हुए कहा कि सर बाहर गर्मी इतनी तेज हो गई है की ऐसी का असर कम हो रहा है। गाड़ी के अंदर बैठे मुझे गृह मंत्री के सभा का पूरा विजुअल दिखाई दे रहा था स्क्रीन पर और मैं इस इंतजार में था कि कब अप्पासाहेब धर्माधिकारी का आखरी भाषण समाप्त हो और लोगों को इस गर्मी से निजात मिले। बाहर हाल उनका भाषण इतना लंबा खींच गया था कि मेरा धैर्य जवाब दे दिया और मैं डीएसएनजी से निकल कर सीधा अपने ड्राइवर को फोन लगाया और चलकर अपनी गाड़ी तक पहुंचा। इस दौरान जो दृश्य दिखे वह विचलित कर देने वाले थ। कम से कम 4 एंबुलेंस को मैंने तेजी से कार्यक्रम स्थल से जाते और आते देखा था। यह देखकर सुकून था की कार्यक्रम आयोजकों के द्वारा एंबुलेंस का प्रबंध पहले ही किया जा चुका था लेकिन मन में एक तरह की घबराहट भी थी कि कहीं कोई अनहोनी ना हुई हो। बरहाल कार्यक्रम स्थल से लौटकर रात करीब 11:30 बजे सो गया।

सुबह पहला फोन दफ्तर का था। थकान होने के कारण फोन बजने दिया और फोन का कोई जवाब नहीं। काफी देर के बाद फ्रेश हो जाने के उपरांत जब दफ्तर को फोन किया तो जो जानकारी मिली उसने सन्न दिया। रवि जानना चाह रहा था की गर्मी की चपेट में आकर कितने लोगों की मौत हो गई है। उसने सीधे-सीधे आंकड़े की अद्यतन स्थिति मांगी। ऐसा आमतौर पर किसी इमारत के ढह जाने या किसी इमारत में आग लग जाने के दौरान होता है जब हम वितरकों के आंकड़ों पर पूरी खबर को केंद्रित किए रहते हैं। ‌ आनन-फानन में इंटरनेट से जुड़ा तो मालूम चला कि कम से कम 11 लोगों की मौत अब तक हो चुकी है। ‌ परेशान करने वाली बात यह भी थी कि इसकी जानकारी रात में ही ग्रुप पर आ गई थी लेकिन मैं देर रात उसे देख नहीं पाया था। ‌ सरकार द्वारा 55 लाख के मुआवजे की भी घोषणा की गई थी और बाद में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का एक दूषित दौर भी शुरू हो चुका था।

समय अपनी गति से बढ़ता गया फिर अगले दिन मे दूसरी जगह रहा फिर उसके दिन दूसरी जगह रहा लेकिन मन में यह बात का छुट्टी रही कि काश शनिवार को मैं प्रकाशित कर देता तो शायद मुझे यह मलाल नहीं होता कि मैंने पत्रकारिता नहीं की। लेकिन उस्मानाबाद में जो किसानों की आत्महत्या से जुड़ी मेरी स्टोरी के साथ हुआ था उसके बाद मैं जन सरोकार से जुड़े मुद्दों पर ऐसी कोई स्टोरी करने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाया या यूं कहें कि अपने अंदर की पत्रकारिता को मैंने दफना दी।

इस कुंठा को लिए मैं किसके पास जाऊं और क्या कहूं!

Tuesday, January 5, 2021

कोरोनाकाल


                                           जो गिनती में नहीं आए...!

यह मालूम चलने पर कि उसकी दुकान अब किसी दूसरे आदमी के पास आ गई है, कोविड की कई खबरों की यहां-वहां फैली कतरने फिर से आंखों के सामने कड़कती हुई गुजर गई।

बातचीत से वह आदमी राजस्थानी लगता था। मृदुभाषी था और दुकानदारी में सक्रिय था। घर में पीने का पानी उसी के दुकान से आता था। उसको फोन करने के बाद वह किसी को बिसलरी का बीस लीटर का डब्बे के साथ भेजता था। उसका आदमी गूगल पे पर रुपये लेता था और पानी रखकर खाली डब्बा ले जाता था। यह सिलसिला तब शुरू हुआ था जब घर में परिवार के लोगों का आनाजाना शुरू हुआ। दिल्ली के दिनों से ही गर्म पानी को ठंढा पीने की आदत लग गई थी। वही आदत शादी के बाद भी जारी रही। ज्यादा लोगों के लिए बार-बार पानी करना मुश्किल था तो बिसलरी का सप्लाई शुरू करवा दी थी।

घर में दो लोगों के लिए गरम पानी को ठंढा करके स्टोर रखना ज्यादा मुश्किल नहीं था इसलिए पानी के लिए दुकानवाले को फोन किये बहुत दिन हो गये थे। इस बीच कोविड के खतरे को देखते हुए भाग्य और बच्चों को भी घर पर भेज दिया था। पिछले दिनों जब ध्यान आया कि बिसलरी का वह खाली डब्बा ऐसे ही पड़ा है तो सोचा इसको वापस ही कर दिया जाये। अगर सिक्योरिटी मनी मिल जाये तो अच्छा न मिले तो भी घर कम से कम थोड़ा हल्का होगा।

दुकान पर जाकर मालूम चला कि वह दुकान दो दुकान के बाद शिफ्ट हो गई है। वहां जाकर जिस लड़के को देखा उसे पहले कभी नहीं देखा था। उससे पूछने और वह मोबाइल नंबर जिसपर पानी ऑर्डर करता था, दिखाने के बाद पता चला कि वह राजस्थानी आदमी अब गांव चला गया है और दुकान थर्ड पार्टी को मिल गया है।

कोविड 19 ने सबसे ज्यादा खुदरा व्यापारियों और दैनिक आमदनी करने वालों को मारा। 

दो मिनट के लिए वहीं रखे प्याज को टटोलते हुए सोचने लगा कि वह आदमी कितना विवश होकर शहर छोड़ा होगा और उससे ठीक पहले उसके क्या-क्या दिन देखे होंगे! कैसे-कैसे फोन उसके पास आये होंगे और लॉकडाउन के कैसे बोरिया बिस्तर समेटकर या फिर जैसे तैसे बेचबाच कर वह यहां से गया होगा।

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याद नहीं आता कि कभी उस दुकान के अलावा कहीं और से फोटोस्टेट करवाया होगा। कुमावत की दुकान छोटी भले थी, लेकिन साफसफाई और उन दो लड़कों का व्यवहार बहुत अच्छा था। 

काफी समय के बाद फोटोकॉपी की जरूरत पड़ी थी। भाग्य को कुछ कागज प्रिंट कराने थे और मुझे गोवा के हॉटल का बिल ऑफिस में देना था जिसकी सॉफ्ट कॉपी ही मेरे पास थी। 

स्कूटी से दूर से ही वह दुकान बंद दिखी। मन उसी तरह की आशंका से भर गया। बंद दुकान के आगे गाड़ी रोकी तो वहां ए-4 साईज का एक पोस्टर दिखा, जिसपर एक मोबाईल नंबर लिखा था। रिंग होते ही मुंह से निकला "कुमावत कहां हो"!

सामने से जो आवाज आई उससे यह समझने में देर नहीं लगी कि वह आवाज कुमावत का नहीं बल्कि किसी और का है। फिर उसने बताया कि दुकान बंद हो गई है और अब कुमावत कहीं दूसरी जगह चला गया है।

ठीक-ठीक याद है कि उन दो लड़कों में से किसी की पत्नी भी कई बार दुकान पर दिखती थी। कुल मिलाकर पूरा परिवार जतन करके दुकान चलाता था लेकिन उस जतन को कोविड 19 के दौरान लगा लॉकडाउन कुचलते चला गया और किसी की कराह की आवाज तक किसी को शायद ही सुनाई दी!

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जिस बिल्डिंग में मैं रहता हूं उसके नीचे ही पिछली तरफ वह छोटी सी दुकान थी। तन्वी को सुबह घुमाने के क्रम में कई बार देखता था तो वहां एक बुजुर्ग बैठे दिखते थे। एक बार तन्वी ने जिद की तो वहां उसे कुछ चॉकलेट वगैरह दिलवा दिये थे।

पिछले सप्ताह उधर से जा रहा था तो ध्यान आया कि पासपोर्ट के अप्वाइंटमेंट का पेपर प्रिंट आउट लेना है। सोचा यहां ट्राई करता हूं। दुकान पर वह बुजुर्ग नहीं दिखे, उनकी जगह एक लड़का दिखा। आशंका का भाव चेहरे से छिपाते हुए पूछा कि वह आपके पिता जी हैं क्या! मालूम चला वह दुकान बिक गई है और अब यही लड़का यह दुकान चलाता है।

उस बुजुर्ग के अते-पते के बारे में उस लड़के से पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

Friday, August 14, 2020

ऐसी करनी कर चलो, हम हंसे जग रोए

 

                                 ... और अनंत की यात्रा पर निकल गये लोके!

लोके के निधन की खबर पाकर फिर से कुछ देर के लिए सबकुछ ठहर गया।

उस दिन लाइब्रेरी के सामने गुजरते हुए शोर से बीच उनकी आवाज ठीक से सुने बिना आगे बढ़ गया था तो उन्होंने आवाज दे दी। ठहरने के बाद मालूम चला कि उन्होंने यूं ही अनौपचारिक हालचाल के लिए आवाज दी। भला आजकल ऐसा कहां होता है! 

एक-दूसरे से कटते-बचते चलने के दौर में कोई आदमी अगर भीड़ से भी आपको बस "कैसा है-सब ठीक है न-और सब..." कहने के लिए आवाज दे तो वह आदमी आपका समय डिजर्व करता है। रूक कर उस दिन लाइब्रेरी के दरवाजे पर ही न्यूज रूम के कॉरीडोर में उनसे बात करने लगा। गर्म आवाज थी उनकी लेकिन मधुर रहती थी। अब वह आवाज कॉरीडोर में फिर कभी सुनाई नहीं देगी।

श्री दत्तात्रेय लोके

सवेरे एक सहकर्मी ने जब कमरे में आकर बताया कि लोके नहीं रहे तो उनसे जुड़ी कई यादें अचानक आंखों के सामने से एक-एक करके गुजरने लगी। वह उनसठ की उम्र में भी काम करने में दिलचस्पी लेते थे। बाद में मालूम चला कि उनकी यह दिलचस्पी पिछले कुछ सालों से देखने को मिली थी जबसे उनका तबादला समाचार प्रभाग में किया गया था। पहले वह कार्यक्रम प्रभाग में थे। उनके करीबियों से बात करके ऐसा लगा कि उनकी "आखिरी इच्छा" समाचार प्रभाग में काम करने की थी और उसके लिए उन्होंने अधिकारियों से कई बार आग्रह किया था। 

करीब तीन साल पहले जबसे वह समाचार प्रभाग में आए थे उन्होंने एक भी छुट्टी नहीं ली थी जबकि कार्यक्रम प्रभाग में काम करते हुए उन्होंने अपने करीब तीस साल के कार्यकाल में लगभग चार सौ छुट्टियां ली थी।

आदमी को जहां मन लग जाए वह वहां रम जाता है। लीन हो जाता है। खो जाता है।

मैं जब कहीं फिल्ड पर लाईव करके दफ्तर आता था तो मुझसे टकराते ही बोल पड़ते थे कि आपका शर्ट आज अच्छा लग रहा था, बढ़िया बोल रहे थे...! नोटिस करने वाले लोग किसे पसंद नहीं होते!

दफ्तर के एक कैजुअल वीडिया एडिटर के सात-आठ साल के बच्चे के पैर में कैंसर होने के बाद उन्होंने टाटा कैंसर अस्पताल में अपनी सारी पहुंच लगाकर उसकी मदद की थी। यहां तक कि वह खुद भी अस्पताल चले गये थे। दफ्तर के लोग बताते हैं कि कई लोगों को उन्होंने आर्थिक मदद की थी। गौर करने वाली बात यह है कि इतनी बातचीत में भी आजतक उन्होंने कभी अपने मुंह से यह सब नहीं कहा जबकि दौर वह चल पड़ा है कि लोग किसी के लिए कुछ कर दें तो उसकी चर्चा करना किसी मौके पर छोड़ते नहीं हैं।

लोके जैसे आदमी का जाना वास्तव में मायूसी से भर देने वाला है क्योंकि आजकल वैसे लोग कम मिलते हैं जो हालचाल लेने के साथ-साथ मदद के लिए भी तैयार रहते हैं। बाकी औपचारिक दुनियादारी तो हर जगह दिखाई दे ही जाती है।


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दूरदर्शन सह्याद्री के दफ्तर में श्री लोके के निधन का सूचनापट





Monday, March 9, 2020

                                   
                                                              एक त्रासदी

असामयिक मौत एक साथ कई मौत की तरह होती है। असामयिक मौत में भी जो मौत अचानक होती है वह एक त्रासदी की तरह होती है, जिससे उबरना एक पूरी पीढी के लिए नासूर की तरह होता है।

महाराष्ट्र विधानसभा के बजट सत्र के दौरान व्यस्तता आम दिनों से अधिक थी। फोन किसी का भी हो उसे ले लेना एक आदत सी ही है, अन्यथा उस थकावट में वह फोन शायद इग्नोर कर देता। लालू भैया दूसरी तरफ थे। उन्होंने बताया कि रूपक भैया एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हैं और किसी निजी अस्पताल में उनको भर्ती करवाया गया है। उनके अनुसार रूपक भैया को सर पर गहरी चोट लगी थी और आईसीयू में उन्हें विशेष निगरानी में रखा गया था। औपचारिक जानकारी के बाद जो सवाल बिना पूछे नहीं रहा गया वह था कि उनका बच्चा कितना बड़ा है!



काफी हाथ-पैर मारने के बाद भी मेरा पुणे जाना नहीं हो पाया और पुणे में जिस पत्रकार को मैंने उसी रात उस अस्पताल पहुंचने के लिए कहा उसे भी उसकी परिस्थितियों ने वहां जाने नहीं दिया। चीजें असामयिक हों तो महानगरों में उसकी तैयारी करने में जरा-सा वक्त तो लगता ही है। खैर!


दो दिनों पहले रूपक भैया के खत्म होने की खबर आ गई। छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनल से महाराष्ट्र विधानसभा के लिए एक नंबर की बस लेने के लिए कतार में खड़े रहते हुए जब यह खबर मिली तो मन क्षुब्ध सा हो गया। किसी का यूं ही चले जाना इतना आसान कैसे हो सकता है! रूपक भैया का एक बेटा था जो शायद प्ले स्कूल में जाना शुरू किया था। याद है, बेगूसराय में वह अपने ग्रुप में शायद सबसे स्मार्ट दिखने वाले लड़के थे। पढ़ाई पुणे में की थी और फिर वहीं एक निजी मोबाईल कंपनी में नौकरी कर रहे थे। पढ़ाई, शादी, बच्चे सब ठीक ही चल रहा था कि अचानक इस हादसे ने उनका अस्तित्व ही खत्म कर दिया एक तरह से!

वक्त की रफ्तार कभी इतनी तेज होगी यह तो किसी ने भी नहीं सोचा होगा।

Monday, December 30, 2019


                                                       वैसी महिलाएं!

आदमी प्रतिस्पर्धा और नफरत के बीच जीते हुए कई बार अचानक किसी ऐसे शख्स से टकरा जाता है जो उसे वापस उसी जगह लाकर खड़ा कर देता है जहां से वह नफरत के रास्ते पर काफी आगे तक चल चुका होता है।

2008 के बाद ऐसा सीधे 2019 में हुआ।

ऐसे समय में जब कोई अपने से भी अपनेपन को अभिव्यक्त कर पाने में हिचकिचाता है, उस महिला ने गजब का अपनापन जाहिर किया था उस रोज। साल 2008 की वह शाम, पापाजी को दिल का दौड़ा पड़ा था और ईलाज के लिए कलकत्ता के देवी शेट्टी अस्पताल में वह भर्ती थे। घर का माहौल वैसा ही था जैसा कर्फ्यू लगे किसी मुहल्ले में शाम का होता है। शाम के बाद का अंधेरा!

दाल चढ़ा चुका था और रोटी बेलते हुए खामोशी से कुछ सोच रहा था। वह कमरा होटल वाले ने कुछ रुपये लेकर दिये थे जिसमें रसोई का सामान था। यह कमरा उन लोगों को दिया जाता था जो होटल का बना हुआ खाना रोज नहीं खा सकते थे। हमलोगों ने तय किया था कि अब खाना खुद ही बनाया जाएगा। अस्पताल के पास ही वह होटल था।

"लाईए मैं बना देती हूं"
"..."
"आप हटिए"
"...न...हीं नहीं...मैं बना रहा हूं...बना लूंगा...थोड़ा ही बचा है"

उस महिला ने जितने हक से बेलन मेरे हाथ से लिया मैं अवाक् रह गया था। बगैर किसी जान पहचान के कोई इतना हक जता दे वह भी किसी दूसरे राज्य के किसी होटल में तो यह आश्चर्य ही तो है।

मैं वहीं खड़ा रहा। मुझे एहसास हो चुका था कि मैं रोटी बनाते हुए कहीं खोया था और रोटियां जलती जा रही थी और शायद यही वजह थी कि उस महिला को ऐसा लगा हो कि मुझे रोटी बनाना आता ही नहीं या फिर मैं कहीं अपना नुकसान न कर लूं!

दो-चार रोटियां बनाने के बाद उनकी नजर बगल वाले बरतन पर गई जिससे दाल का पानी रिस रिस कर चुल्हे पर गिर रहा था। मैंने दाल को पूरा ढक रखा था और वह खौलने के बाद ढक्कन को धकेल रहा था। उन्होंने दाल का आधा ढक्कन खिसका दिया और फिर कुछ धीरे से कहा जो शायद यह था कि दाल को ऐसे नहीं ऐसे बनाते हैं।

फिर अचानक ही उन्होंने कहा कि वह वहां अपने बच्चे के ईलाज के लिए आई हैं जिसके दिल में छेद है।

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इस दुनिया की सबसे अच्छी बात है चीजों का बीत जाना या खत्म हो जाना। नीचे से ऊपर और इधर से उधर, सबकुछ बीतता है या खत्म हो जाता है। तनाव बस इस दौरान कटने वाले समय का ही होता है।

अनगिनत लोग आए-गए, कुछ क्षणभर के लिए याद रहे कुछ लंबे वक्त तक स्मृति में बने रहे। क्या खोया-क्या पाया का गणित अगर कोई लेकर कभी कहीं दूर जाकर बैठे तो उसको हर वह चीज अप्रासंगिक लगेगी जिसका लेखाजोखा लेकर वह उस गणित का हल ढूंढने की कोशिश करेगा।

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हर दरवाजे को हम खटखटाते हैं इस उम्मीद में कि कहीं कोई दरवाजा किस्मत का हो। दो साल के इंतजार के बाद जब 2 मई को वह दरवाजा खुला तो वह किस्मत का नहीं बल्कि अथाह दुख का था। इस साल का 2 मई शायद कुछ सालों तक याद रहे, वैसे ही जैसे 2008 या 2012 या 2016 की कई घटनाएं दिमाग में घर कर गईं।

29 दिसंबर को ऐसा ही एक दरवाजा खटखटाते हुए नवी मुंबई के नेरूल में पहुंचना हुआ। डीवाईपाटिल यूनिवर्सिटी के परिसर में लगातार तीन घंटे दोनों अबोध बच्चों को संभालना एक एडवेंचर ही था।

अचानक ही पीछे से उनकी आवाज आई कि एक मुझे दे दो। यह उतना भी अप्रत्याशित नहीं था लेकिन था अप्रत्याशित ही। बच्चों को प्यार से अपने पास लेना, गोदी में रखना या उसके गाल को छूना अलग बात है लेकिन बच्चे को इसलिए किसी की गोदी से अपनी गोदी लेना ताकि वह थोड़ा चैन ले सके, यह खास है।

दोनों को दोनों कंधे पर रखकर सुलाने का जो प्रयास मैं लगातार कर रहा था उसमें सफल नहीं हो पा रहा था। शायद यह देखकर उनको दया आ गई होगी।

2008 में भी शायद यही हुआ हो। खैर!


महिलाएं!

Monday, September 16, 2019

खामोशियां...

                                               
                                                    गुमनाम है कोई...!

नीलम शर्मा के निधन की खबर पर यकीन मुश्किल से हुआ। कॉलेज के दिनों में उनके एक शो में ऑडिएंस के बीच बैठकर सवाल करना और फिर बाद में उनके साथ कई बार लाइव रिपोर्टिंग करना, उनसे मिलना, दूरदर्शन के मुंबई गेस्ट हाऊस में ग्यारहवें तल उनके साथ जाना और उनके साथ काम करने वाले प्रोड्यूसर रमन हितकारी का किसी को फोन करके यह कहना कि यह कमरा रहने लायक नहीं है, वगैरह कई चीजें दिमाग में बारी बारी से घुमने लगी।

अप्रैल में जब चुनाव का कवरेज करने के दौरान अमरावती गया था तो बोरियत दूर करने के लिए संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में बैठने का निर्णय लिया ताकि पत्र पत्रिकाएं पढ़कर मन को बहलाया जा सके। अंदर की प्रक्रिया थोड़ी सरकारी थी। एक आवेदन देना और फिर उसपर हस्ताक्षर करना फिर उसे लेकर इधर से उधर जाना जैसा।

इसी बीच लाइब्रेरियन पर नजर पड़ी तो उनके केबिन में गया और अपना परिचय दिया। औपचारिकता के बाद उन्होंने जो पहला नाम लिया वह नीलम शर्मा का था। वह अचानक उस ब्लैक एंड व्हाइट दौर मं पहुंच गये जब दूरदर्शन ही एकमात्र चैनल हुआ करता था। उन्होंने नीलम शर्मा से जुड़ी स्क्रीन की कई यादें गिनाई। आलम यह हो गया कि मैंने नीलम शर्मा को वहीं से फोन कर दिया लेकिन पुस्तकालय में नेटवर्क न होने की वजह से मुझे उन्हें यह बताने के लिए परिसर में आना पड़ा कि महाराष्ट्र के विदर्भ के एक पुस्तकालय में मैं उनके एक प्रशंसक के सामने बैठा हूं। हालांकि मैं उस लाइब्रेरियन से उनकी बात तकनीकी कारणों से नहीं करवा पाया, जिसका खेद मुझे उस दिन के बाद भी रहा।

खैर, समय अपनी गति में चलता रहता है।

अलविदा नीलम शर्मा 
अब जब नीलम शर्मा राख हो चुकीं है जिंदगी के दर्शन को लकर मन में अचानक एक नई तरंग सक्रिय हो गई है। पिछले दिनों उनके साथ काम करने वाली एक एंकर मुंबई आई और खाना खाते हुए उसने बताया कि दफ्तर में भी किसी को नीलम शर्मा की बीमारी के बारे में जानकारी नहीं थी।

इसका एक मतलब साफ है कि दफ्तर में कोई भी उनके करीब नहीं रह पाया दशकों के उनके दफ्तर में उनके होने के बावजूद।

इस गोपनीयता का एक अपना दर्शन है। आदमी अपनी निजता को लेकर अतिरिक्त सतर्कता तभी बरतता है जब वह बाहरी दुनिया से किसी भी तरह की उम्मीद होनी बंद हो जाती है। खुद को किसी के साथ साझा करना अत्यंत ही जोखिम भरा काम है, खासकर महानगरों में काम करने वाली किसी महिला के लिए, जिसकी लोकप्रियता इतनी हो कि उसके निधन के बाद सारे समाचारपत्रों में खबर छपे और लोग सोशल मीडिया पर लंबी चौड़ी पोस्ट लिखकर उनके व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं का जिक्र करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए कतारबद्ध हो जाएं।

नीलम शर्मा मरी नहीं हैं बल्कि गुम हो गई हैं। वह पहले भी गुम थीं, अब भी गुम हैं। कोई तो ऐसा व्यक्तित्व का पहलू उनका जरूर होगा जो उन्होंने शायद किसी से साझा नहीं किया वरना आज जब लोग रक्तदान करते हुए भी फोटो खिंचवा कर सोशल मीडिया पर डाल देते हैं, ऐसे में ब्रेस्ट कैंसर जैसी बीमारी को जीते हुए एक संजीदा महिला भला कैसे बिना किसी को बताये कोई इस तरह कैसे मुख्यधारा से हाशिये की तरफ खिसकते हुए गायब हो सकता है।

बहरहाल, उनकी गुमनामी ही नया दौर है, जहां आज वह हैं, कल कोई और था और कल कोई और होगा।

Wednesday, June 19, 2019


                                                      अलविदा प्रवीण!

कॉलेज के वाट्सएप ग्रुप के चैटबॉक्स में करीब तीन सौ मैसेज पड़े थे। सवेरे अचानक कई लोग एक साथ टाईप करते दिेखे, आमतौर पर ऐसा किसी के जन्मदिन या किसी त्यौहार में बधाई देते समय होता है जब सबलोग बारी-बारी से औपचारिकता निभाते हैं और इस क्रम में कुछ लोगों की टाईपिंग दूसरे से टकराती हुई भी दिखती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं था। प्रवीण द्विवेदी की मौत हो चुकी थी और उसी से जुड़े हुए चैट वहां हो रहे थे।

प्रवीण के फेसबुक पर किसी से खोजा तो कुछ दिनों पहले किया हुआ उसका एक पोस्ट दिखा।

                                    "नसीब का लिखा, वह लिखकर जिससे राफ्ता न हो,
                                    समुंदर तो समुंदर रहा पर साहिल अब साहिल न रहा।"

पढ़ते हुए ऐसा लगा कि प्रवीण इसे अपनी आवाज में सुना रहा हो और वहां दूर-दूर तक कोई नहीं हो। कल ही "द फॉल्ट इन आवर स्टार्स" फिल्म देखी थी। अगस्टस अपनी मौत से पहले एक बनावटी अंत्येष्टि आयोजित करता है और वहां अपनी तरह ही कैंसर से जूझ रहे दो दोस्तों को बताता है जिसमें से एक होती है हेजल, जो कि उसकी दोस्त बन जाती है और दोनों गहरे प्यार में पड़ जाते हैं। हेजल खुद भी कैंसर के बुरे दौर से गुजर रही होती है।

प्रवीण की जिंदगी में बाधाएं कॉलेज के समय से ही दिखनी लगी थी। वह एक पैर से विकलांग था। आमतौर पर वह आशुतोष मणि त्रिपाठी के साथ ही ज्यादा दिखता था और दोनों की अच्छी दोस्ती भी थी। आशुतोष अंदर का ठीक लड़का था हालांकि उन दोनों की दोस्ती की वजह का कभी पता नहीं चला।

प्रवीण द्विवेदी को प्यार से सब पीडी कहते थे। ग्रुप में भी उसके बीत जाने की खबर पीडी के नाम से ही आई, जो सबको बारी-बारी से चौंका गई। पिछले कुछ महीनों से वह बीमार था और डॉक्टरों से उसे ब्रेन टीवी का मरीज बताया था। मुश्किल से बत्तीस-तैंतीस की उम्र में आईआईएमसी बैच 2010-11 ने अपने एक जवान साथी को खो दिया। प्रवीण तीसरा है। प्रवीण से पहले सागर मिश्रा और अंशु सचदेवा अलग-अलग वजहों से आत्महत्या कर चुके हैं।

प्रवीण ने क्या जिया, कितना जिया, कबतक जिया यह सब उसके नजदीक रहने वाला ही कोई इंसान बता सकता है लेकिन प्रवीण जिस तरह से गया उसके पूरे बैच को और भी खाली कर दिया है।

एक वाक्या याद करते हुए आशुतोष बताता है कि उसके रूममेट ने एक नया किराये का कमरा देखा था जो चौथे फ्लोर पर था। प्रवीण से जब उसने पूछा तो वह खुशी-खुशी राजी हो गया। इतना ही नहीं कई बार चाय पीने के लिए वह झट से नीचे भी आ जाता था। यह सब तब था जब उसका एक पैर नकली था और उसे उतनी सीढियां चढ़ने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती थी। उसकी जिंदादिली के कई किस्से उसके साथ ही चले गये।


Saturday, May 18, 2019

आदमी ठीक से देख पाता नहीं


                                               और परदे से मंजर बदल जाता है!

आकाश गुप्ता बस एक नाम नहीं है, यह एक कलंक है जो भारतीय शिक्षा प्रणाली पर कालांतर से चला आ रहा है।

हर जिले में कई मुहल्ले होते हैं और हर मुहल्ले में कई गलियां होती हैं। हर गली में कई घर होते हैं और हर घर में अमूमन बच्चे होते हैं। यहां तक सुखद अहसास देने वाली बात अगले ही पल मनहूस हो जाती है जब यह कहा जाये कि उनमें से कई बच्चे आकाश गुप्ता से मिलते-जुलते होते हैं।

"लाखों में एक" देखते हुए मैट्रिकुलेशन और इंटरमीडिएट के दौरान देखी, सुनी और भुगती गई कई सारी घटनाएं अचानक आंख के सामने से गुजरने लगी।

मुझे मालूम चला था कि उसका दाखिला अमेठी विश्वविद्यालय में हुआ था। कुछ सालों बाद मुझे मालूम चला कि उसने कहीं कॉल सेंटर में काम शुरू कर दिया है और करीब दो साल पहले मालूम चला कि वह किसी कंपनी में काम करने के लिए मुंबई आया है और अब वहीं रहने वाला है।

हमारे यहां शिक्षा और रोजगार को जोड़ने वाले रास्ते में इतनी भूलभूलैया है कि इन दोनों से अलग सोचपाने का जोखिम कोई मध्यमवर्गीय परिवार लेने से डरता है।

शिशिर सिन्हा की वह बात यादगार हो गई जो उन्होंने दस साल पहले आईआईएमसी में कही थी। सरकारी नौकरी का मतलब किसी बिहारी से जाकर पूछ लो, इतनी सी बात दिल को इतने अंदर तक छू देगी किसने सोचा था। पढ़ाई और नौकरी, इसके बीच में जो घटना घटती है वह है शादी। इतना बड़ा ही मोटे तौर पर होता है संसार।

आकाश गुप्ता बदनसीब इसलिए नहीं है क्योंकि उसे जबर्दस्ती रायपुर से विशाखापत्तनम् भेज दिया गया बल्कि वह बदनसीब इसलिए है क्योंकि वह इतना ज्यादा अकेला है जितना होना उस उम्र में खतरनाक है। अकेलापन को जीने के लिए जो प्रशिक्षण चाहिए होती है उसका एक अपना पाठ्यक्रम होता है जो समय तय करता है, आकाश के पास वह प्रशिक्षण नहीं है इसलिए वह एक स्युसाइड नोट रूम में छोड़कर टेरेस पर जाकर कूदने का निर्णय कर लेता है। सबलोग कहां इतनी हिम्मत जुटा पाते हैं!

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और अंत में..

जब क्या करना है यह समझ में न आए तो यही सोचो कि क्या-क्या नहीं करना है। यह सोच शायद इंटरमीडिएट खत्म करने से कुछ महीने पहले आई थी और आज इसी सोच को एक टीवी सीरिज पर हूबहू देखना उत्साहजनक रहा। सही था मैं तब, वरना क्या पता कॉल सेंटर में नौकरी कर रहा होता।




Tuesday, February 26, 2019

सॉरी दोस्त


                                                 अंधेरे से अंधेरे तक

यह अचानक था। उससे बात करने की कई दिनों से सोच रहा था लेकिन फोन करने के लिए समय और माहौल बन नहीं पा रहा था। बीती देर शाम स्टेशन से घर को ओर चलते हुए उसे फोन किया तो जो बात पता चली वह विचलित करने वाली थी। उसका भाई शादी कर रहा है 2 मार्च को! सवालों का एक जत्था सा महसूस हुआ अपने अंदर लेकिन कहने से परहेज ही करना ठीक लगा। हालांकि यह उसे कह गया कि परिणाम अच्छे नहीं होंगे और पीढियां भुगतेंगी इसे!

29 नवंबर से 5 दिसंबर 2012 के बीच जो सब घटित हो रहा था वह उसे मालूम था। एक बार उसने अपनी डायरी मुझे पढ़ने दी थी। पड़ोस की ही एक लड़की के बारे में उसने उसमें काफी कुछ लिखा था। सार समझकर मैंने उसे वह डायरी लौटा दी थी।

मुहल्ला पूरे तरीके से अंधकार में डूबा हुआ था। माली हालत ठीक नहीं होने के कारण उस अंधकार से निकलना उस गली में हर किसी के लिए एक चुनौती थी। कुछ परिवारों ने उस चुनौती से पार पा लिया था और कुछ छटपटाहट में जी रहे थे। वह उस अंधकार के दौर में कटिहार अपने मामा के यहां जाकर रहने लगा और फिर वहां उसने फोटोस्टेट की दुकान खोली और अपने दम पर परिवार को बहुत हद तक संभाला। समय बदला और घर के सबसे बड़े भाई को नौकरी लगी। हालांकि वह तब भी अपने अलग-अलग कामों में रमा रहा। इस बीच उसकी भी नौकरी उत्तर प्रदेश पुलिस में लगी। एक समय हम बहुत करीब थे लेकिन मेरा मुंबई आना और उसका बनारस जाना, हम दोनों को दूर कर दिया था।

बेगूसराय में जब वह समाज कल्याण विभाग में ऑपरेटर था, हमारी खूब बनती थी। जब मैं दिल्ली में इंटर्नशिप कर रहा था तबतक वह पटना में कहीं काम पर लग चुका था। हमारे और उसके बीच वे सब बातें हुआ करती थी जो उस उम्र में घटित होती है। उसे मैं भरोसेमंद लगता था और यही वजह थी कि जब वह एक लड़की की शादी में जाने को उतावला था तो मेरे मना करने पर वह मान गया था। वह दरअसल उस लड़की से प्यार करने लगा था और उसके अनुसार वह लड़की भी उससे प्यार करती थी लेकिन परिवार के दबाव में वह कहीं और शादी कर रही थी। तब मैंने उसे यही कहा था कि लड़की की शादी होने दे, लड़की दूसरी मिल जाएगी लेकिन अगर उस लड़की की शादी के समय कुछ तमाशा हुआ तो फिर शायद उस लड़की की जिंदगी में अच्छा लड़का कभी न मिल पाये!

उस रोज बाघी में सिर्फ वही मेरे साथ था, जिस रोज वहां जोरदार हंगामा हुआ था। मारपीट के बीच से उसने मुझे सुरक्षित निकाला था।

हमारे रिश्तों की गर्माहट ऐसी थी कि जरूरत पड़ने पर हम एकदूसरे को कितना भी रुपया देने के लिए हमेशा तैयार रहते थे और कभी एकदूसरे को यह याद दिलाने की नौबत नहीं आती थी कि उसे रुपये चुकाने हैं।

शायद इन सब वजहों से ही जब कल रात यह मालूम चला कि 2 मार्च को वह शादी करने जा रहा है तो मन एक तरह से क्षुब्ध हो गया।

जो उसके साथ घटित हो रहा है उसे हूबहू महसूस करने के बाद भी मन में एक टीस सी है। टीस इस बात की है कि उसका भविष्य वापस उसी अंधकार में जानेवाला है जहां से वह बाहर आया है और टीस इस बात की भी है कि मैं ऐसे वक्त में उसकी मदद नहीं कर पा रहा हूं जब उसे एक सही दोस्त की जरूरत है।


Wednesday, October 31, 2018


                                                 अच्यतानंद साहु के बहाने

दूरदर्शन के कैमरामेन अच्यतानंद साहु की शहादत के बाद संयोगवश आज अपने कैमरामेन के कई संस्मरण साझा करने का मौका मिला।

झबुआ में खराब सड़कों के बीच करीब बीस किलोमीटर प्रति घंटे की गति से जा रही दूरदर्शन की गाड़ी से कैमरा चोरी हो जाना, फिर कैमरा विभाग द्वारा सभी कैमरामेन की सैलरी से उसका रुपया काटना और फिर जाकर तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के हस्तक्षेप के बाद हुई पुलिस दबिश से कैमरा का मिलना।

इसी तरह झबुआ के उन बदमाशों की कहानी जो लूटपाट करते हुए हत्या जरूर करते थे क्योंकि बिना हत्या या मारकाट किये लूटपाट करने को वह फोकट का खाना मानते थे और उन दुर्दांतों का मानना होता था कि रुपये यूं ही नहीं लेने चाहिए बल्कि उसके लिए मेहनत करना चाहिए और मेहनत के अंतर्गत मारकाट आता था।

इसी तरह कोहिमा में वहां के अलगाववादियों द्वारा मना करने के बाद भी दूरदर्शन के कैमरामेन का वहां जाना। अलगाववादियों द्वारा एक कैमरामेन के कनपटी पर बंदूक तान देना और फिर कैमरामेन कै बहादुरी से यह कहना कि वह वहां अपनी ड्यूटी के लिए आया है। अलगाववादी द्वारा दोनों कैमरे को कुएं में फेंक देना।

इसी तरह राजीव गांधी के प्रेस कांफ्रेंस के दौरान एक पत्रकार को उसके नाम से बुलाना और हालचाल पूछने के दौरान पत्रकार का यह कहना कि उसे चाय नहीं दी गई और फिर राजीव गांधी का प्रेस वार्ता को थोड़ी देर के लिए स्थगित करके उस कैमरामेन के लिए चाय मंगवाना। 

Monday, June 4, 2018

राजकिशोर की याद में

कतरनों में राजकिशोर! राजकिशोर के निधन की खबर तेज भागती ट्रेन में अचानक किसी के जंजीर खींचकर उतर जाने जैसा है। तब सहारा समय साप्ताहिक अखबार हुआ करता था, जो बाद में दैनिक “राष्ट्रीय सहारा” हुआ और फिर धीरे-धीरे उसकी दशा भी “आज” की तरह हो गई। बेगूसराय में हिंदुस्तान और दैनिक जागरण का तब साझा वर्चस्व था और प्रभात खबर में हरिवंश के कलम का जादू और मार्केटिंग स्ट्रेटजी बदलने तक इन दो अखबारों का ही बर्चस्व वहां कायम रहा। साप्ताहिक सहारा समय अखबार के प्रकाशन बंद होने के बाद समकालीन लेख, टिप्पणियां और वाद-विवाद जैसी सामग्रियों का अभाव महसूस होना शुरू हुआ। हिंदुस्तान और दैनिक जागरण क्रमश: कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा से प्रेरित थे, इसलिए उनसे उस व्यापक सामग्री की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी, जिसकी तलाश तब थी! पुस्तकालयों का चक्कर काटते हुए जनसत्ता का नाम कई बार कान से टकराया था। 2008 के जाड़े की दोपहर थी। सामने डॉ भगवान प्रसाद सिन्हा चेहरे पर भव्य तेज समेटे इंडियन एक्सप्रेस के किसी लेख का अनुवाद कर रहे थे। डॉ सिन्हा मेरे लिए क्या हैं, यह फिर कभी! उनसे बातचीत के क्रम में मुझे मालूम चला कि वह बेगूसराय के उन चुनिंदा पाठकों में से हैं जिनके यहां जनसत्ता आता है। कुछ दिन उनके विश्वनाथ नगर स्थित आवास पर ही बैठकर मैंने जनसत्ता पढ़ना शुरू किया और फिर उस अखबार में छपने वाले लेखों ने कम समय में ही अपनी आदत दिलवा दी। जिन लेखकों ने सबसे ज्यादा आकर्षित किया था उनमें से राजकिशोर एक थे। उनके अलावा जवाहरलाल कौल, सत्येंद्र रंजन, आनंद प्रधान, तरूण विजय, अपूर्वानंद सहित तमाम पत्रकारों के लेख जनसत्ता में रहते थे, जो एक तरह की संतुष्टि का एहसास दिलाते थे। इस अखबार में विचारधारा का प्रसारण नहीं बल्कि मुठभेड़ होती थी, जो इसे अन्य अखबारों से अलग बनाती थी। मेरे अनुभव में जनसत्ता जितना अपने लेखकों को स्पेस देता था, उतना कोई अखबार नहीं देता था। प्रभाष जोशी यूं ही महान नहीं कहलाए। खैर! कई बार ऐसा हुआ कि कोई लेख इतना तथ्यपरक और तार्किक मिला कि उसे कैंची से काटकर फाईल में संग्रह करने की नौबत आ गई। आज मैं मुंबई में हूं लेकिन वे फाईलें अब भी बेगूसराय में सुरक्षित हैं। उन फाईलों में राजकिशोर तब भी जिंदा थे और अब भी जिंदा हैं। राजकिशोर उन कतरनों में हमेशा जिंदा रहेंगे और मेरी फाईल इसकी गवाही देगी। हिंदी के इस मूर्धन्य पत्रकार को मेरी श्रद्धांजलि!

Wednesday, March 21, 2018

SC take on SC/ST act

                   
                     My first encounter with The Dalit Atrocities Act

Two reports secured a significant place in the mainstream media on Tuesday. The first was a Supreme Court observation in which the apex court expressed its anxiety over the misuse of The Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention and Atrocities) Act and the second was a statement of Union Minister of State for Social Justice Ramdas Athawale in which he expressed anxiety over politicizing atrocities against Dalits.

My first encounter with The Scheduled Caste and Scheduled Tribes Act was staged near Mahad in Raigad district where two state transport buses and some other vehicles fell into the swollen Savitri river after the bridge collapsed on the night of August 2, ’16.

I left headquarter for Raigadh immediately along with my team. By the time, we reached NDRF, Navy, Coast Guard and other agencies were carrying out search operation on war footing. With the help of local administration, we deployed our OB Van and started hot switches directly from the spot. Everything was going on the track until I noticed that the cameraperson didn’t off the camera even after the hot switches got over. I reminded him and he immediately switched it off.

In the duration of one hour, that was the third time I reminded him that he had missed to switch off his camera.

It was very irritating and also surprising because, we had only four batteries and I was instructed by Delhi Headquarter that hot switched would be carried out in the morning bulletins next day. The area was located in remote place and I was not confident that we would get logistic supports so I didn't want to take any risk.

With the support of locals, I managed accommodation for my camera person, assistant and driver for one night and asked them to be prepare for the hot switches for the next day as search operation for missing bodies was expected to be continued.

DD News broadcasts first morning bulletin at 7-8 AM and subsequently news bulletins are carried whole day in language and subject based sequence.

What surprised me, was the camera, which was left switched on even after hot switch got over. This time, I directly asked my camera person why he wanted to drain the batteries! He maintained that he didn’t notice.

In the next bulletin, I was told that battery is about to drain so entire day hot switches were not possible. I informed Delhi Headquarter and they asked me to remain present on the spot and try to find an alternative. My camera person refused to stay and started arguments,  he argued that he had no business on the spot without a camera. After a short argument, he left alone by public transport as I didn’t let him take the official vehicle, which was supposed to be moved only by my instruction. As, I had to manage hot switches at any cost, I hired a private cameraperson and completed the assignment till combine operation announced to be over.

In Mumbai office, I submitted my ordeal to the competent authority as I was asked to do. I was expecting an official memo to be served to the camera person for his misconduct and reluctance to perform duty.

When, after few days, I wanted to know the status of the complaint, I learnt that the camera person had filed a complaint in the minority commission and also threatened Grade I officer to falsely implicate them in Dalit Atrocities Act if they tried to escalate the issue.

I left stunned. I had heard about the misuse of SC/ST atrocities act but that was the first time I was directly involved in the episode.

The most interesting thing is, I had been under the impression that the camera-person belong to Christian community until this episode jolted me.

We must observe fresh Supreme Court observation in the light of equality. As the division bench of Justices A K Goel and U U Lalit has rightly said that steps should be aken to achieve the constitutional  goal of a caste-less society and prevent misuse of law resuling in spreading hatred on caste lines.



We must not forget Kopardi gang rape case in which accused had threatened the victim’s family not to file a case against them otherwise they’ll file a false case against the family, who belonged to Maratha community, under SC/ST Act.

We must welcome Supreme Court for coming out with a clear stand on this burning issue.

Monday, January 29, 2018

संक्रमण काल


                                    गूगल मेप, ईयरफोन और कैलकुलेटर के आईने में                                                 

मुंबई के एक निजी एफएम चैनल का एक विज्ञापन हाल में जारी हुआ है जिसमें एक बुजुर्ग टैक्सी चालक एक प्रेमी जोड़े को टैक्सी में मुंबई में कहीं ले जा रहा है।

जैसा कि अमूमन होता है, जोड़ा पिछली सीट पर बैठा है। एक मोड़ के पास से गुजरते हुए लड़का टैक्सी को आगे से दाएं लेने के लिए कहता है तो बुजुर्ग अपने तजुर्बे का हवाला देकर कहता है कि वह उस रास्ते से भी छोटे रास्ते से उसे वहां तक पहुंचा देगा जहां उसे जाना है। बात बढ़ती है तो बुजुर्ग टैक्सी चालक अपने उम्र का हवाला देते हुए कहता है कि वह मुंबई के हर रास्तों से वाकिफ है और जब गूगल मेप आया भी नहीं था तब से वह टैक्सी पर उन जैसे कई जोड़ों को मुंबई घुमा चुका है।

अभी हाल में बिहार जाना हुआ। पत्नी के लिए होम्योपैथ को कोई दवा लेनी थी और इस बारे में जानकारी नहीं थी कि वहां होम्योपैथ की दवा कहां मिलेगी। मेरी और पत्नी की बात पास बैठी कक्षा सात में पढ़ने वाली साली सुन रही थी। उसने बीच में ही कहा कि जायसवाल के यहां होम्योपैथ की दवा मिलेगी।

मुझे लगा कि शायद जायसवाल का कोई दवाखाना होगा जो उसके स्कूल के रास्ते में पड़ता होगा लेकिन वैसा नहीं था। वह कभी किसी के साथ कहीं गई थी तब उसने जायसवाल की क्लीनिक के बोर्ड पे पढ़ा था कि वहां होम्योपैथ की दवा मिलती है।


करीब सात साल पहले जब मैं दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर बनारस के एक साथी को लेने गया था तो उन्होंने एक मजेदार बात बताई थी।

वह अमेरिका से आए थे और उस वक्त रात के बारह बजने में कुछ ही मिनट बाकी रह गये थे। हमलोग एयरपोर्ट में ही बने एक रेस्टोरेंट में बैठकर उनकी दिल्ली से बनारस की कनेक्टिंग फ्लाईट का इंतजार करने लगे।

मैंने उनसे यूं ही पूछ लिया कि अमेरिका और भारत में सबसे बड़ा अंतर आपको क्या लगता है। मुझे उम्मीद थी कि वह कुछ ऐसा बताएंगे जो भारत को अमेरिका की तुलना में पिछड़ा दिखाएगा लेकिन उन्होंने यह कहकर चौंका दिया कि भारत के लोग अमेरिका के लोगों से ज्यादा स्मार्ट होते हैं।

उन्होंने चौंकाने का सिलसिला जारी रखते हुए तुरंत उसका उदाहरण भी पेश कर दिया। पास ही एक स्नैक्स की दुकान पर जाकर उन्होंने दुकानदार से पूछा कि जो फ्लाईट अभी आई है वह कहां से आई है। उन्होंने चेहरे का भाव ऐसा किया कि वह किसी का इंतजार कर रहे हों।

दुकानवाले ने चौंकाते हुए न केवल अमेरिका से आई उस फ्लाईट का पूरा विवरण दे दिया बल्कि बात बात में हवाई अड्डे के अंदर से बाहर की सारी प्रक्रिया बता डाली।

ऐसा ही कुछ पिछले दिन भी हुआ जब ईजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू मुंबई के होटल ताज में आये। होटल के बाहर ओबी वैन की पार्किंग और पूरी व्यवस्था करने के चक्कर में मोबाइल की बैट्री तीन फीसदी पर आकर टिक गई। फोन आना तो बंद होने से रहा!

पास के ही पान दुकान को मानमनोव्व्ल करके अपना मोबाइल चार्ज करने के लिए दे दिया। पानवाला निकला बिहारी तो कुछ बात भी निकलने लगी। बात बात में उसने ताज के रसोईए के नाम पते के अलावा, पिछले दिनों होटल में घटी हर छोटी बड़ी जानकारी दे दी। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह थी उसे इंटर्न के तौर पर वहां आए युवकों की भी पूरी कुंडली मालूम थी।



ये सब बातें इसलिए प्रासंगिक होने लगी हैं कि मुंबई लोकल से लेकर दिल्ली मेट्रो तक के पिछले करीब पांच साल के अनुभव से यही जान पड़ता है कि लोग अपनी आंख और मोबाईल स्क्रीन के बीच तीसरा कोई चीज देखना नहीं चाहते।

कान में अब बातों के बजाए ईयरफोन से निकले गाने भर रहे हैं।

आलम यहां तक पहुंच गया है कि दूध, अंडा और बेसन अगर एकसाथ खरीद लिया जाये तो कुछ दुकानदार रुपये जोड़ने के लिए कैलकुलेटर निकाल लेते हैं।

वहीं एक वह दौर भी था जब छह-पांच करते हुए पांच-छह सौ रुपये का जोड़ तो परचून की दुकान पर ऐसे ही हो जाया करता था।

मुंबई का वह वृद्ध टैक्सीवाला शायद उस अंतिम पीढी का कोई नुमाइंदा है जिसके बारे में वह एनआरआई मेहमान फख्र के भाव से उस दिन हवाईअड्डे पर बता रहे थे। आगे की पीढी कैलकुलेटर, ईयरफोन और गूगल मैप वाली हो चली है। हम अपनी खूबी बड़ी तेजी से खो रहे हैं।




Thursday, August 17, 2017

समय से संवाद



                                       गोरखपुर से मुंबई वाया दिल्ली

इंग्लिश विंग्लिश जैसी धमाकेदार फिल्म का निर्देशन करने वाली गौरी शिंदे "अहा जिंदगी" को दिए एक साक्षात्कार में कहती हैं कि वह फिल्में इसलिए बनाती हैं क्योंकि यह उनके दिल को अच्छा लगता है.

सपाट कहने वाली और आम बात करने वाली शिंदे एक पंक्ति में बहुत गहरी बात कह जाती हैं. वह मौजूदा फेमिनिस्ट सी नहीं दिखतीं लेकिन उनके समानांतर मजबूत व्यक्तित्व के रूप में जरूर दिखतीं हैं.

पत्रिका लिखता है कि शिंदे उन चुनिंदा महिला निर्देशकों में से हैं जो अपनी शैली को तवज्जो देती हैं. पत्रिका कई बातें गौरी शिंदे के बारे में लिखता है लेकिन जो बात सबसे महत्वपूर्ण है वह है गौरी का इंट्रोवर्ट होना.

इंग्लिश विंग्लिश गौरी की अपनी कहानी है. गौरी कन्वेंट स्कूल में पढ़ीं हैं और उनकी मां की अंग्रेजी अच्छी नहीं है. अपने परिवार के माहौल के ऊपर ही उन्होंने यह फिल्म बनाई जो समाज के एक बड़े हिस्से को अंदर तक छू गई.

प्यासा के बाद यह शायद दूसरी फिल्म है जिसे मैंने अबतक लैपटॉप से डिलिट नहीं किया है.

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पिछले कुछ दिनों में मनहूस खबरों का सैलाब सा आया है. मुंबई में एक महिला का कंकाल उसके घर से बरामद होना, बिहार के एक आईएएस का घरेलू विवादों से तंग आकर आत्महत्या कर लेना, मशहूर टेक्सटाइल कंपनी रेमंड के मालिका का अपने बेटे द्वारा संपति से बेदखल कर भटकने के लिए छोड़ देना सहित न जाने क्या-क्या खबरें पिछले कुछ महीनों में देखने सुनने को मिली. क्या सच में दुनिया ऐसी हो चली है कि यहां सबकुछ जोखिम में रखकर जीया जाये!

गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में दर्जनों बच्चों की दर्दनाक मौत की खबर वह आखिरी मनहूस खबर थी जिसके बाद कुछ लिखने का मन किया.

भाग्य शादी के बाद कई बार कह चुकी है कि अब तुम ब्लॉग क्यों नहीं लिखते! उसे देने के लिए कोई जवाब नहीं है. उसने यह भी भरोसा दिलाया कि मैं अगर अपनी नितांत व्यक्तिगत चीजें भी कहीं लिखूं तो वह उसका पोस्टमार्टम नहीं करेगी!

लेखन एक ऐसी लत है जो लग जाए तो छूटती नहीं है और आदमी के साथ ही जाती है. लत पर कुछ अंतराल के लिए काबू पाया जा सकता है लेकिन लत छूट जाए ऐसा मुश्किल है!

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संजीव मिश्रा उन सीमित लड़कों में से है, जिससे मुंबई में आने के बाद भी सपर्क बना रहा.

करीब पांच साल पहले वह अचानक कुछ दिनों के लिए दफ्तर से गायब हो गया था. जब वापस आया तो चेहरे का रंग सूख चुका था. खिलखिलाते रहने वाला लड़का सहमा सा दिख रहा था. हमेशा की तरह मैंने मजाक किया तो वह हंस दिया. उसकी बनावटी हंसी आसानी से पहचान में आ गई. दफ्तर से बाहर आकर बात की तो पता चला उसके पिताजी की तबियत अचानक बहुत गंभीर हो गई है और फिलहाल गोरखपुर में किसी अस्पताल के आईसीयू में हैं.


ठीक-ठीक याद नहीं है लेकिन चार या पांच हजार रुपये की मदद मैंने उसे तत्काल देकर सांत्वना दे दिया था कि आगे जरूरत पड़े तो बेहिचक मुझसे कहे.

कुछ महीने बाद मैं मुंबई आ गया और फिर हमारा संपर्क एकाध बार हुआ और हमदोनों अपनी अपनी दुनिया में खो गये. मुंबई नया था मेरे लिए 2014 में. दिल्ली की तरह यह शहर आपको मट्ठी, कढी चावल, आलू पराठा, छोले कुलछे या आलू पराठा ऑफर नहीं करता. यह ऑफर करता है वडापाव और कटिंग!

गोरखपुर में हुई जघन्य वारदात जिसमें दर्जनों बच्चों की कथित तौर पर ऑक्सीजन आपूर्ति रोकने के कारण मौत हो गई, के बाद मन व्याकुल हो उठा क्योंकि यह वारदात ऐसे समय हुई जब मैं अपने होनेवाले बच्चे की डिलीवरी मुंबई के एक सरकारी अस्पताल में प्लान कर रहा था.

गाड़ी नीचे लगाई और वाट्सएप चैक करते हुए सीढियों पर चढ़ने लगा. वही खबर हर तरफ पसरी हुई थी. ट्विटर पर कई लोगों ने कई मार्मिक तस्वीरें पोस्ट की थी, एक शख्स ने बच्चे की लाश लिए उसकी मां की फोटो अपने डीपी में लगाई थी. फेसबुक का मंजर इससे अलग नहीं था. न्यूज फीड गोरखपुर में हुई लोमहर्षक घटना पर केन्द्रित थी.

भाग्य ने हमेशा की तरह मुस्कुराते चेहरे और धैर्य से लबालब अपनी आंखों से नजर मिलाते हुए हेलमेट अपने हाथ में ले लिया और हम दोनों अंदर आ गये. कमरे में आकर भी ऐसा लगा नहीं कि कमरे पर आ चुका हूं. मन गहरे में जा रहा था.
नोएडा डीएलए दफ्तर में संजीव                     फोटो संग्रह


अनायास ही संजीव का ख्याल आया और गोरखपुर की खबर को गहराई से जानने के लिए उसे फोन लगा दिया.
वह दफ्तर से लौट ही रहा था. उसकी थकान उसकी बातों से साफ जाहिर हो रही थी.

बात चली तो दिल्ली के संघर्ष भरे दिन याद आ गये. बात बात में यह भी एहसास हुआ कि उसे मेरी आर्थिक मदद अबतक याद थी. बात खत्म होती इससे पहले संजीव ने यह कहकर चौंका दिया कि वह अपने मां और पापा को अपने साथ ले आया है और अब सबलोग दिल्ली के ही पांडव नगर में रह रहे हैं.

लगा कि इस साल की सबसे सुकूनदायक खबर संजीव ने दी. मन किया उसे गले से लगा लूं. ऐसे समय जब बूढ़े लोगों को बोझ या आउटडेटेड सा समझा जा रहा है ऐसे में संजीव का दिल्ली में एक समाचार पत्र में काम करते हुए औसत मासिक वेतन में भी अपने माता-पिता को दिल्ली में अपने साथ ले आना उत्साह से भर देने वाली खबर थी.

पापा की तबियत गंभीर होने के बाद संजीव की अफरातफरी में शादी हुई थी. संजीव शादी के बाद अकेला दिल्ली आ गया था. फेसबुक पर उसने कभी शादी या अपनी पत्नी के साथ कोई फोटो साझा नहीं की थी. जब संजीव ने यह बताया कि वह अपनी पत्नी और मां-पापा को दिल्ली ले आया है तब एक संतुष्टि हुई. यह एक ऐसा पल बीता जो लगातार आ रही अवसादग्रस्त खबरों के बाद थोड़ी सकारात्मकता लेकर आया.


Wednesday, July 19, 2017

वाट्सएप...

                         
                                                       क्लास
                       

दुनियादारी खुद को फैलाते हुए यहां तक ले आई है कि वाट्सएप भी अब दुनियादारी का ही एक हिस्सा सा बन गया है. साल भर पहले एक नजदीकी रिश्तेदार की तरफ से वाट्सअप पर भेजी गई दीपावली की शुभकामना का जवाब नहीं देने के कारण उनकी नाराजगी मोल लेनी पड़ी थी. महीनों बाद तक उन्हें वह बात याद थी और जब मिलने का संयोग हुआ तो तत्काल उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर कर दी.

आदमी भागा हुआ सा दिखता है. गौर से देखने पर हर आदमी कहीं न कहीं से छिपता हुआ सा दिखता है. माहौल इस रूप में लोगों को इतना डराएगा इसकी कल्पना शायद किसी ने भी नहीं की होगी और अगर की भी होगी तो शायद इस स्वरूप में नहीं की होगी.

वाट्सएप ने आदमी के व्यक्तित्व को सार्वजनिक करने या यूं कहें उसे एक्सपोज करने में बड़ी भूमिका अदा की है. किसी आदमी का व्यक्तित्व का एक हिस्सा उसके वाट्सअप स्टेटस से जाहिर होता है. कई तह हैं.

स्टेटस बदलने की दर, स्टेटस का कंटेंट वगैरह जैसे कई तह हैं जिससे किसी को भांपा जा सकता है और उसके मानसिक स्थिति के करीब तक पहुंचने का जोखिम उठाया जा सकता है.

वाट्सएप मैसेज में आने वाले चुटकुले, कटाक्ष, व्यंग्य या फिर एक खास तरह की बातों से किसी आदमी के क्लास का भी पता चलता है.

सवेरे एक बड़े केन्द्रीय कर्मचारी का वाट्सएप आया. उन्होंने एक व्यंग्य भेजा जिसमें एक जोड़े का मजाक यह कहकर बनाया गया था कि उस महिला ने शायद सोमवारी के दिन व्रत करने के दौरान गलती से बर्गर खा लिया था!

मन क्षुब्ध सा हो गया.

क्लास एक बड़ी चीज है. वह क्लास ही है कि लोग चार पहिया और एक स्टियरिंग की समानता के बावजूद डीजल गाड़ी, पेट्रोल गाड़ी और सीएनजी में फर्क करते हैं.

एक पुराने पड़ोसी में दिल्ली में किसी तीसरे आदमी का जिक्र करते हुए कहा था कि वह इतना कंजूस है कि सीएनजी की गाड़ी से चलता है. यही क्लास है!

मुंबई में रहते हुए जिसने भी पुलिस इंस्पेक्टर से मिलना हुआ है या फिर उनके बारे में किसी से सुनना हुआ है, वे सब किसी आईपीएस की तरह बात करते हैं वहीं दूसरी तरफ जब किसी असाइनमेंट पर मुंबई से बाहर किसी देहाती या औसत शहरी जगहों पर गया हूं तो वहां बड़े अधिकारी भी वह छवि नहीं जमा पाते हैं. यही क्लास है!

क्लास माहौल से बनता है और माहौल की ही कीमत होती है. जो लोग माहौल नहीं भांप पाते वह पिछड़ जाते हैं और गुमनामी से हमेशा के लिए खो जाते हैं.

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अब जबकि तुम्हारे आने की आहट तुम्हारी मां ने भांप लिया है, मुझे तुम्हारे क्लास की फिक्र हो रही।








Monday, August 29, 2016



                                                काऊंटर बंद!

ब्लॉग खोलकर बैठे दस मिनट हो गये लेकिन तय नहीं हो पाया कि किसपर कहां से लिखना शुरू करना है!

इतने देर में दो कॉल आये. मन किया इन दोनों कॉल पर ही बारी बारी से सबकुछ लिखके दिमाग खाली कर दूं। तीन फ्रैंडशिप रिक्वेस्ट फेसबुक पर आये जिनमें से एक को स्वीकार कर लिया और दो को वैसे ही रहने दिया. जिसे स्वीकार किया वह बेगूसराय का कोई नौजवान है। हमारे फ्रैंडलिस्ट में दो म्युचूअल फ्रैंड हैं, जिनमें से एक अंग्रेजी के वह शिक्षक हैं जहां मैं स्नातक के दौरान पढ़ता था और दूसरा मुहल्ले का ही एक लड़का है, जो मुहल्ले के चौक पर ही दुकान चलाता है।

सोचता हूं जे जे हॉस्पिटल के बारे में लिखूं। फिर लगता है लिखने से क्या होगा! क्या जो तीन आदमी ब्लड देने के लिए ओपीडी के काऊंटर के बाहर कतार में पंद्रह मिनट से इस इंतजार में थे कि काऊंटर वाले सज्जन आएंगे और प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, लिखने से उस प्रक्रिया में कोई तेजी आएगी! खुद पर भी क्षुब्ध हो गया था कुछ देर के लिए। साथ खड़ी सिस्टर को जब कहा कि लहाने सर ही डीन हैं न अभी तो उसके चेहरे का भाव थोड़ा बदला था। शायद उसे लगा होगा कि मैं डीन को फोन न लगा दूं!

डॉ समकित को पहली बार इस तरह बर्ताव करते हुए देखा। कोई बुजुर्ग अपनी पत्नी को व्हील चेयर पर ले जा रहा था। शायद कोई बात हो गई थी जिससे समकित नाराज थे। शुक्रवार को जब उनसे मिला था तो उनका फोन लगातार बज रहा था। जब वह खुश होकर बता रहे थे कि एम डी की पढाई भी पूरी हो गई तभी उनका फोन फिर से बजा तो मुझसे रहा नहीं गया और मैंने विनम्रता से कह दिया कि आप बात कर लीजिए। इस बीच जो चीज मैंने नोटिस की, वह उनके हाथ में समा चुका फोन था, जिसमें कैमरा तक नहीं था. काफी पुराना मॉडल का कोई फोन था.

एम डी करने और जे जे अस्पताल में डॉक्टरी करने के बाद ऐसा फोन! खैर!

डॉ समकित को मोह है गरीब मरीजों को देखने का. कुंआरे हैं. आगे क्या होगा पता नहीं! काफी देर बाद ब्लड लैब के काऊंटर पर एक आदमी आया लेकिन इंतजार कर रहे परिजनों के साथ कोई अनबन होने के कारण उसने यह कह दिया कि खून के नमूने लेने का समय खत्म हो गया है! मराठी में गर्मागर्मी हुई लेकिन बात दोनों के इगो पर आ चुकी थी तो नतीजा सिफर ही रहा. काऊंटर बंद!

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