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Wednesday, April 22, 2015

जाने चले जाते हैं कहां...

                
                   एक थी अंशु सचदेवा

जब मीना कुमारी अस्पताल में दम तोड़ रहीं थीं तो अस्पताल का बिल चुकाने के रुपये भी उनके पास नहीं थे. वह बिल उनके एक फैन ने चुकाया था जो पेशे से डॉक्टर था.

जिस शौहर ने मीना कुमारी को तलाक दिया था, उसके लिए उन्होंने शायरी लिखी

तलाक तो दे रहे हो नजर-ए-कहर के साथ,
  मेरी जवानी भी लौटा दो मेहर के साथ

अंशु सचदेवा का जिक्र करने से पहले मीना कुमारी का यह छोटा प्रसंग इसलिए लिखा क्योंकि अंशु की कहानी का अंतिम हिस्सा मीना कुमारी के इस प्रसंग से प्रेरित है.

आईआईएमसी के हिंदी पत्रकारिता का सत्र (2010-11) इतिहास में सबसे अभागे बैच के रूप में दर्ज हो चुका है. इस बैच के एक छात्र सागर मिश्रा ने पिछले ही साल कथित तौर पर खुद को खत्म कर दिया था और करीब एक साल के बाद बैच की एक और छात्रा ने कथित तौर पर अपने घर में फंदे से लटककर आत्महत्या कर ली.  

अाईआईएमसी के दोस्तों के साथ गुरूद्वारे की सैर की एक फोटो
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अंशु को संभवत: तलाक की जगह तिरस्कार मिला जिसे वह सह नहीं सकी. ऐसा सोचने या विचार करने के पीछे कई मजबूत तर्क और सबूत हैं. आईआईएमसी के कैंपस कपल में बैच के ही एक लड़के ने उसके साथ शादी करने की बात कही थी. चूंकि मैं तब वहां था इसलिए मैं इस घटना का गवाह बना रहा. लेकिन कुछ दिनों बाद ही जानकारी मिली कि उस लड़के से सबके सामने ऐसा कहने के लिए अंशु ने ही उसे कहा था.

इस घटना का एक मतलब यह है कि अंशु उस लड़के पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर पा रही थी. क्योंकि आमतौर पर अंशु जिस तरह के मध्यवर्गीय जीवनशैली को पसंद करती थी वहां शादी से पहले उस लड़के से इस तरह इस बात को सार्वजनिक रूप से कबूल करवाना थोड़ा अटपटा सा था, और दूसरा यह कि उस लड़के में इतना नैतिक साहस नहीं बचा था कि वह अंशु के उस आदेशनुमा आग्रह को टाल सके. लेकिन खैर!

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दिल्ली से करीब तीन सौ किलोमीटर दूर आगरा की एक लड़की जो कि उस लड़के की एक समय गर्लफ्रैंड रह चुकी थी, उससे अच्छा परिचय होने के बाद हमारे बीच लड़के को लेकर हुई बातचीत में यह पता चला कि वह लड़का अब भी उस लड़की को फोन करता है और फोन पर रोने लगता है.

ऐसी कई कहानियां हैं जिनमें लड़का हाथ के नस काटने की धमकी देकर, रोकर या फिर किसी और तरीके से लड़की को कमजोर करके अपनी मनमानी करता रहता है.

                                                                                                  फाइल फोटो

आगरा की उस लड़की के साथ हुई बातचीत में ही यह साफ हो गया ता कि अंशु जिस लड़के के साथ है वह न केवल धूर्त है बल्कि वह भरोसेमंद नहीं है. वह दो लड़कियों को एक साथ शादी का झांसा दे रहा था लेकिन अंशु ने यकीन किया और उस लड़की ने यकीन करना बंद कर दिया था.

विनाश काल में बुद्धि विपरीत हो जाती है ऐसा कहीं कहा गया है. जब आगरा की उस लड़की ने अंशु को उस लड़के के बारे में सबकुछ बताना शुरू किया तो अंशु ने उसकी एक न सुनी. कहते हैं जब आदमी फिसलता है तो न गति में नियंत्रण होता है और न दिशा पर. आगरा की वह लड़की अपना फर्ज निभाकर वापस अपने काम में लग गई.

इसके बाद मैंने भी अंशु को एक बार जीमेल में थोड़ा सतर्क किया लेकिन वही हाल मेरा हुआ जो आगरा की उस लड़की का अंशु ने किया था.

गुस्से में मैंने अंशु को फेसबुक में अपनी फ्रैंडलिस्ट से बाहर कर दिया. ऐसा इसलिए क्योंकि मैंने एक तरह का जोखिम लेकर अंशु को अलर्ट किया था और उसका उसे नजरअंदाज करना मुझे नागवार गुजरा और फिर उसके बाद मैंने अंशु से कभी बात नहीं की. जहां तक याद है कि दो बार उस लड़के से बात करने के दौरान उसी ने अंशु को फोन दिया था और औपचारिक बात होकर फिर बात खत्म हो गई.

इसमें कोई शक नहीं कि अंशु उस लड़के के साथ काफी आगे बढ़ चुकी थी और वहां से लौट कर आना अंशु के लिए तभी संभव था जब उसके पास एक वैसा दोस्त हो जैसा आगरा वाली उस लड़की के पास था. आज भी आगरा वाली उस लड़की से बात होती है तो वह यही कहती है कि अगर उसके पास उसकी एक दोस्त न होती तो पता नहीं वह अभी जिंदा होती भी या नहीं!

औरत अपने प्रति आने वाले प्यार और आकर्षण को समझने में चाहे एक बार भूल कर जाए, लेकिन वह अपने प्रति आने वाली उदासी और उपेक्षा को पहचानने में कभी भूल नहीं करती

-    गुनाहो का देवता

अब जबकि अंशु सबकुछ छोड़कर हमेशा के लिए जा चुकी है तो इनसब चीजों के लिखने या बोलने का कोई मतलब नहीं बनता है, फिर भी कम से कम मुझे इस बात की तसल्ली जरूर रहेगी कि मैंने और आगरा की वो लड़की ने अपने स्तर से प्रयास जरूर किया था कि अंशु उस लड़के के सम्मोहन से बाहर आ जाए और उसके झांसे को तवज्जो न दे लेकिन अब जो हो गया उसपर बस आंसू ही बहाया जा सकता है.

बहरहाल लड़के ने एक अच्छी नौकरी जुटा ली है. बाकी समय तय करेगा...
  
अंशु का न बोलना अब ज्यादा सुनाई देता है.


Saturday, June 28, 2014

Miss you Sagar Mishra



                                       A dream succumb to death!


It’s strange and painful that I am coming out in the public about the matter I am not concerned. It’s about taking on the institution which awarded me a much needed certificate against my one year.  

I am a journalist and I have a duty to perform. I would not go to illogical lengths to attack or defend anyone including IIMC faculty members or any student lobby like IIMC alumni association or others, if any.

No reason to abort my willingness to say that even after four years of CWG episode, not even a single student of my batch (2010-11) has been given the certificate of internship which was assured to us.

Y K Sheetal
Death Anniversary of Nirupma Pathak in IIMC Campus

There are series of incidents I have been witnessing closely in IIMC including “Shokshabha” of Nirupma Pathak, open assessment of one of my classmates about IIMC entrance exam when it comes to short questions and certain names like Arundhati Roy are asked, Coca Cola sponsored Alumni Meet endorsed by my teachers and many others but what brought matters to a head was royally ignorance of Sagar Mishra’s mysterious death!

Who is Sagar Mishra?

To me, a dreamer who succumbed to his dream! IIMC Alumni association, a self-proclaimed group of IIMCians has allegedly made strenuous efforts to keep his associates away from this tragedy. 

If my close friends of IIMC are to be believed, IIMC alumni association was compelled to break the ice after receiving unexpected demoralization and embarrassment due to its role as an organization that it often claims for! No doubt, Abhishek Ranjan Singh’s initiative and his single effort to pressurize IIMC administration for Hostel facility have badly exposed IIMC alumni association.

Sagar Mishra and Rupesh Pathak (IIMC HJ 2010-11)
Feeling the heat of the IIMC students, IIMC Alumni Association had no choice but to prove its share in the sadness! After drawing flak from many students of IIMC over ignorance of Sagar’s demise, at least IIMC Alumni Association said something (I don’t know and neither interested to know) but is it the remembrance Sagar deserved? 
Why there is no official call for “Shoksabha” by IIMC teachers as it has been organized for Nirupma Pathak? Why IIMC teachers seem to be scared of breaking the “IIMC BRAND”, as once upon a time Pradeep Saurabh during his class in IIMC had defined IIMC as a Brand rather than an institution.


At this time when I am badly occupied with my assignments and duties, I dare to urge IIMC teachers to call a “Shoksabha” for Sagar Mishra where we could gather and share some memories Sagar Mishra left for us.









Thursday, June 26, 2014



                         सोच का सागर

सागर मिश्रा के आत्महत्या के कारणों के बारे में सोचना शुरू करता हूं लेकिन बीच में ही दम तोड़ने लगता हूं. भारतीय जनसंचार संस्थान में हम दोनों साथ पढ़े थे और वह अन्य लड़कों की तरह ही हममें से एक था. जैसे हमारे सपने थे वैसे ही उसके भी सपने थे. जैसे सबकी शादी होती है वैसे ही उसकी भी शादी हुई. बाद में पता चला कि लव मैरेज था. लेकिन फिर भी उसने सुसाइड क्यूं किया यह सोचने के लिए निकलता हूं तो कई कारणों के बीच दिमाग को फंसा हुआ पाता हूं और फिर सोचना छोड़ कर दूसरी चीज सोचने लगता हूं.

कभी-कभी याद आता है पांच-सात साल पहले का वो समय जब कुर्सी टेबल पर बैठे सोचते-सोचते घंटों खपा दिया करता था. गर्मी की रात में छत पे बने सीमेंट की छोटी-छोटी कुर्सी पर बैठकर कितना कुछ सोच लिया करता था. साइकिल चलाते-चलाते भी दिमाग सोचना जारी रखता था. यहां तक कि शौचालय में भी भविष्य के सपने बुनना जारी रहता था. लेकिन अब ऐसा लगता है कि सोचने की एक सीमा सी हो गई है जो बस महसूस की जाती है. इसे शायद मेरे उम्र का और भी कोई महसूस कर रहा होगा.

सोचते-सोचते थकान महसूस करने का यह एक नया दौर है. हो सकता है यह कोई बीमारी भी हो लेकिन अगर यह बीमारी है तो मानवीयता के लिए इससे गंभीर बीमारी अब तक कोई नहीं हुई. क्योंकि जब हम किसी के बारे में नहीं सोच पा रहे तो संभव है कि सामने वाला भी हमारे बारे में नहीं सोच पा रहा होगा. ऐसी स्थिति में इसकी पूरी संभावना है कि हम आपस में भ्रमित रहेंगे और सही-गलत से दूर यह भी नहीं जान पाएंगे कि वर्तमान और भविष्य के बीच की कौन सी सड़क सही है और कौन सी गलत. बड़ा डरावना लगता है ये सब!

कुछ दिन पहले एक साथी ने फेसबुक पर लिखा, खुद से ही जंग है. आखिर ऐसा यूं ही तो नहीं लिखा होगा उसने. जरूर कोई न कोई बात होगी हो सकता है वह भी सोच नहीं पा रहा होगा या एक टर्मिनल पर जाकर दिमाग उसे अकेला छोड़ देता होगा.

 फिल्मों या आम जिंदगी में कभी न कभी हम सबने किसी के मुंह से जरूर सुना होगा कि मेरी जगह रह कर सोचो या मेरी जगह कोई होता तो वही करता जो मैंने किया. ऐसी बातें युवा जोड़ों के बीच अक्सर होती हैं लेकिन फिर भी क्या वो एक दूसरे की जगह रहकर एक दूसरे को समझ पाते होंगे? जिस समाज के नस नस में तनाव घुलता जा रहा है और जहां की हवाएं भी अब लोगों को डराती हैं वहां क्या ऐसा मुमकिन है कि कोई किसी की जगह खुद को रखकर सोच सके? खासकर वह युवा जो अपनी योग्यता का आकलन कर पाने में असमर्थ सा दिखता है और बाहरी दुनिया को देखते-देखते अपना सुधबुध और विवेक खोने लगता है क्या यह सच नहीं है कि वैसे कई युवा आज खुद के बारे में भी नहीं सोच पा रहे?
 
सोचने की सीमा है. मसलन आप अगर दिल्ली के किसी मेट्रो स्टेशन पर बैठकर सोच रहे हैं तो आपकी वह सीमा अगले मेट्रो के आने तक है. इसी तरह मुंबई में अगली लोकल के आने तक. दफ्तर में सोच रहे हैं तो आपकी सीमा अगले फोन कॉल के आने तक है. और बाकी जगह अगर आप सोच रहे हैं तो आप अपने बारे में सोच ही नहीं रहे आप उस काम के बारे में सोच रहे हैं जो अभी आपको करना है. उठने के बाद ब्रश, ब्रश के बाद बाथरूम, बाथरूम के बाद कपड़े, कपड़े के बाद जूते, जूते के बाद पर्स, पर्स के बाद टैक्सी, टैक्सी के बाद लोकल, लोकल के बाद सीट, सीट के बाद स्टेशन, स्टेशन के बाद टैक्सी, टैक्सी के बाद दफ्तर, दफ्तर के बाद डिनर, डिनर के बाद आप सोचने लायक रह कहां जाते हैं क्योंकि कल रात के बाद ही शुरू होने वाला है और रात में सोचने के लिए तबतक इतनी सामग्री दिनभर में दिमाग में जमा हो चुकी होती है कि नई सोच की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती.

सागर के सुसाइड से मुझे इतनी तसल्ली है कि उसे कम से कम वैसी जिंदगी से राहत मिल गई होगी जिस जिंदगी ने उससे सोचने की क्षमता छीन ली होगी. 

अक्सर हम कहते और महसूस करते हैं कि हर चीज की एक सीमा होती है. लेकिन कई बार व्यावहारिक रूप में यह एक मिथक सा लगता है क्योंकि यह सीमा तय नहीं है उसी तरह जिस तरह सोचने की कोई सीमा नहीं है. लेकिन सागर की मौत या किंगफिशर के पायलट की पत्नी का आर्थिक संकट से गुजरकर आत्महत्या कर लेना यह बतलाता है कि सोच की एक सीमा निर्धारित हो चुकी है. कई लोग उससे आगे नहीं सोच पा रहे. इस सीमा को तोड़ने के लिए किसी बुल्डोजर या बाहरी ताकत की जरूरत नहीं है बल्कि आदमी को खुद की ही जरूरत है. उस साथी ने सही लिखा था, खुद से ही जंग है.

Saturday, February 25, 2012

JOURNEY TO IIMC

Good Morning Begusarai- भोर का समय साकेत के घर तैयारी कर के लौटते हुए. साकेत फिलहाल काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से विधि की पढाई कर रहा है.
वो गली ...

बागवान 

अतीत 

                                      कागद कारे            

पसंदीदा जगह 

इडेन लेंड में क्रिकेट 

अपील बेकार गई 

तेलंगाना मुद्दे पर अमित के साथ बहस 
संगीत जीवन है 

भगवान सर न होते तो मैं ऐसा न होता, साथ में साकेत 

राजीव भैया को भुलाना नामुमकिन 

नीतीश सरकार शर्म करो, पत्रकारों पर हमला बंद करो 

                                चप्पे चप्पे पे नजर 


Good Morning Delhi

Welcome to IIMC

IIMC CANTEEN
कश्मीर का सच, छात्रों की नजर से
Playing role of Indian Army



Clockwise from the top- Rajesh Kumar, Bharti, Shweta Sharma, Gunjan Jain, Ramesh Bhagat, Y K Sheetal, Balram, Dadan and Krishna
Shipra Das. a brave photo journalist
Attending class at Suchna Bhavan with D. Sengupta, Director, Photo Division, Ministry of I&B
Class at Suchna Bhavan
A BIG HAND

नीला आसमां खो गया...(कृष्ण के विशेष फरमाइश पर)
दीक्षांत समारोह (2010-11)