Sunday, June 14, 2026

छाता वाले सर

                        जिस स्कूल में मैंने लंबा समय बिताया 

गणित के सर के तौर पर उनकी पहचान होने के साथ साथ उनकी एक और पहचान थी छाता वाले सर। कॉलिजिएट स्कूल के बारे में आज सोचने पर कोई डरावना सा कुछ लगता है। ऐसा लगता है जैसे नालंदा यूनिवर्सिटी के खंडहर जैसा ही कुछ वहाँ भी हो गया होगा जहाँ उस वक्त के सब लोग ज़िंदा जल गए होंगे। कक्षा सात और आठ के उधर जो पतली जगह थी वास कक्षा छह की तरफ़ पीछे से जाती हुई कितनी डरावनी दिखती थी। ओह, सच में क्या मैंने वहाँ उस दौर में पहुँच रहा हूँ। नहीं…

वो विशम्भर सर के लिए कक्षा का सबसे प्रिय छात्र था चंदन। वही जयेश कुमार चंदन! वह उनकी आँखों का तारा था। गणित अच्छी थी उसकी और कोई भी हिसाब जब सर उसे देते तो वो बना देता था। यह एक तरह से ऐसा ही था जैसे सचदेव में हेमंत सर का सबसे प्यारा छात्र था चितरंजन।

खैर, कुछ दिन पहले जब कमोठे से मानसरोवर स्टेशन जा रहा था तो लगा जैसे धूप जला ही डालेगी। संयोग ये था कि दो-तीन दिन पहले ही बारिश हुई थी और मैंने साढ़े तीन सौ में छाता भी खरीदा था। छाता तब से बैग में ही पड़ा था। मैंने सोचा कि छाता निकाल हूँ धूप से बचने के लिये लेकिन फिर लगा कि लोग क्या कहेंगे जो देखेंगे! धूप से बचने के लिए छाता अक्सर सुंदर लड़कियां लगाती हैं। इतना सोच ही रहा था कि विश्वंभर सर की अचानक याद आई। क़रीब चौबीस साल हो गए उन्हें देखे। अब तो पता नहीं वह होंगे भी या नहीं और अगर होंगे तो किस हाल में होंगे! 

कलेजा मुंह को आ जाता है जब ऐसी कोई घटना याद आती है। शायद मैं बहुत दूर, बहुत अलग और बहुत अथाह में आ चुका हूँ।

Saturday, June 6, 2026

AIBE

 समानांतर दुनिया 


अंधेरे में जमीन टटोलती लाठी!

Sunday, May 31, 2026

वो दौर

 विक्रांत तुम उस दिन‌ कह रहे थे न कि तुम्हें तब लगा कि तुम सही जगह आए हो जब तुमने मुझे अपनी कही बातों को मुझे सादे कागज पर लिखते देखा।


बात २००९ की होगी शायद। देर रात मैं विश्वनाथ बाबू के यहां गया था। उन्होंने मुझसे उस बदमाश के बारे में पूछा तो मैं बता नहीं पाया। फिर उन्होंने कहा था कि कैसा दिखता है। वह कागज पर उसका स्कैच बनवा रहे थे। तब मुझे भी लगा था कि मैं सही जगह आया।

Sunday, May 17, 2026

एक बार जहांगीरपुरी


                                                 दिल्ली का वह अंधेरा

बात कब की है ठीक ठीक याद नहीं लेकिन हाँ मैं तब दिल्ली में था और मनीष सिसोदिया की स्टाफ स्नेह कोठावाड़े के टच में था। करेगी बनाने को लेकर चक्कर लगाने के उस दौर में मैं इधर उधर भटक रहा था। इसी दौरान उसे भी बोलता था कि कहीं कुछ मिले तो बताना।


स्नेहा का एक बॉयफ्रेंड था जोगी। वह अक्सर उसकी चर्चा करती और सुनकर मुझे भी अच्छा लगता था। स्नेहा लंबी थी और हमेशा सिस्टर लुक में रहती।


खैर, मुझे याद जहाँ तक आ रहा है बहुत उम्मीद लेकर मैं जहांगीरपुरी पहुँचा था। दिल्ली में रहने के दौरान शायद पहली और आख़िरी बार मैं वहाँ गया था। दूर कहीं पहाड़ ऐसा कुछ था, रेत थे, डरा देने वाले घर के स्ट्रक्चर थे और खुली नलियाँ जैसी थी जहाँ कोई पेशाब भी करके आगे जा सकता था। दिल्ली के भयानक दौर में ये वाला दिन मोटे अक्षरों से लिखने वाला दिन था।


उस दिन मैं सोच रहा था कि किस अँधेरे में मैं आ हुआ हूँ। घर में सबको क्या लगता होगा जिन्होंने दिल्ली कभी देखी नहीं…! बड़े शहर और खासकर दिल्ली का संघर्ष कैसा होता है यह दिल्ली कभी नहीं गया आदमी नहीं समझ सकता। पब्लिक ट्रांसपोर्ट और स्ट्रीट फ़ूड के सहारे किया जाने वाला वह स्ट्रगल कितना कठिन था।


हंटर फ़िल्म के शुरुआती सीन में 1989 का एक दृश्य फ़िल्माया गया है। जैसी ही उस दृश्य को देखा अचानक डेढ़ दशक पहले बीता वह दिन याद आ गया।


कितना भटकाव लिखा है जीवन में पता नहीं…