लास्ट में पेन ड्राइव का खराब होना, रेलवे पार्सल काउंटर पर मामला फंसना और बदनामी हिस्से आना, स्कूटी का फ्यूल एलटीटी से ठीक पहले खत्म होना, ये सब शनिवार की बात है। पिछले कितने ही सालों से चला आ रहा यह सिलसिला और कितने सालों तक चलेगा यह सटीक जानने की सारी कोशिशें व्यर्थ हो गई।
Y K SHEETAL
JOURNALIST
Sunday, February 15, 2026
Saturday, January 31, 2026
फैसलों का अनंत दौर
मुंबई या बिहार!
फैसले लेने का दौर पहले भी था लेकिन अब जो दौर है यह पहले से अलग है क्योंकि अब पापाजी नहीं रहे। मुंबई से वाइंड-अप करने का फैसले को कठिन कहा जाए तो इससे पहले के सभी फैसले को क्या कहा जाएगा! फैसला तो कभी भी आसान नहीं रहा।
Saturday, January 17, 2026
कामोठे डायरी
समेटने का वक्त
समेटना आसान नहीं होता लेकिन मेरे मामले में यह उतना कठिन नहीं रहा। मुझे याद है बच्चों के कपड़े रखने के लिए हमने आलमीरा लंबे समय तक नहीं लिया था और अमेजन या फ्लिपकार्ट से तीन-चार हजार में पाईप और कपड़े का एक आलमीरा लिया था जो लंबे समय तक चला। जब यह पता हो कि यह घर अपना नहीं, यह ईमारत अपनी नहीं, यहां के लोग अपने नहीं, यहां की चीजें अपनी नहीं, कुछ भी अपना नहीं तो फिर क्यूं वहां पैसे लगाना...!
ये रविवार समेटने के नाम रहा। सबकुछ समेटना। कपड़े, किताब और अन्य चीजें।
भावनाएं बिखरी नहीं, दृढ रहीं। हो सकता है ऐसा इसलिए हुआ हो क्योंकि पापाजी के सामान और मां के सुहाग की निशानियों को जमा करके घर से बाहर करते हुए अभी महीना ही बीता था।
अटैचमेंट। यही सब दुख की जड़ है। खुद से अरजा हुए एक-एक सामान अपने हाथों से दूसरे को दे देना। आसान तो नहीं होता है लेकिन अगर इस लड़ाई को नहीं जीता गया तो जो युद्ध है उसे कैसे जीता जा सकेगा। क्यूं याद करूं कि मैंने उस सोफा-कम-बेड को कब लिया या फिर आलमीरा को लेते वक्त कितना तैयार था मैं। घर में एक-एक चीज जोड़ना और फिर उसे उस घर से निकाल देना। खुद मैं भी निकल जाऊंगा अब इस घर से। एक घर जहां गजब का स्ट्रगल रहा लेकिन उस बीच कितनी मीठी-मीठी यादें भी रहीं। एक न एक दिन तो यहां से निकलना ही था।
बच्चों के छोटे कपड़े, भाग्य के वे नोट्स बुक्स जिसको उसने रात-रात भर जगकर पूरा किया था और एक सरकारी नौकरी हासिल की, मेरी मेहनत की वे सब दास्तान जो अनगिनत पन्नों में दर्ज हैं, सबको एक-एक कर कबाड़ वाले तो देते वक्त दिल धक-धक तो तेज करता रहा लेकिन आंखें नम नहीं हुई।
याद है जब दिल्ली से पैकिंग करके निकल रहा था तो आंखें भींग गईं थीं। मेरी भी और उन लोगों की भी जो वहां थे। दिल्ली का कटवारिया सराय छूटा, न्यू अशोक नगर छूटा, मुंबई का घाटकोपर छूटा, एंटोप हिल छूटा दो बार अलग-अलग और अब कामोठे छूट रहा है। जिंदगी तब शायद सफल हो जाएगी जब मैं छुटूंगा उस जमीन से जो मेरे खुद के पैसे से ली हुई होगी। अपना जमीन, अपना घर। पिताजी की अर्थी उस आंगन से निकली जो जमीन उन्होंने खरीदी। मैं भी यही चाहूंगा कि कभी जब मेरी अर्थी निकले तो किराए के मकान से नहीं निकले।
कितना कुछ बदल गया अक्टूबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच। पापाजी का जाना सबकुछ ले गया अपने साथ शायद!
गोविंद, गोविंद...
