Sunday, September 6, 2026

छोटी-मोटी बातें

                                                         विक्रांत और लेन-देन 

यह एक संयोग जैसा था लेकिन लगा जैसे कोई परीक्षा ली जा रही हो। मई में जब विक्रांत के यहाँ दांत दर्द से कराहते हुए गया था तो ईलाज उस दिन लंबा चल गया। जो मुझे लगा था कि एक-दो घंटे में वहाँ से फ़्री हो जाऊँगा वह वहाँ पाँच-छह घंटे लगे क्योंकि विस्डम टूथ को निकालना पड़ा और उसकी प्रक्रिया एक्स-रे और बाक़ी चीजों से होकर गुजरी। अंत में उसने बाईस हज़ार का बिल बनाया था जो मैंने तब क्रेडिट कार्ड से चुका दिया। हालाँकि उस पूरी रात और अगले कुछ दिनों तक मैं बहुत परेशान रहा कि इतने पैसे फ़ालतू में लग गये लेकिन राहूकाल में ऐसे कई अनुभव पहले भी मिले थे जब अकस्मात् कोई खर्च आ जाता या फिर हाथ में रखे पैसे यूँ ही कहीं खर्च हो जाते। क़र्ज़ चुकाने के प्रयास असफल होते जाते और क़र्ज़ नहीं लेने की प्रतिबद्धता भी मज़बूत नहीं हो पाती।

इस घटना के कुछ दिनों बाद जब विक्रांत घबराये हुए मेरे पास आकर उसे मिलने वाली धमकियों के बारे में मुझे बताया था जो कि उसकी गर्लफ्रैंड के किसी दूसरे ब्वायफ्रैंड से उसे मिल रही थी तो उस रोज़ मैं उसे पुलिस थाने ले गया था और वहाँ जाकर पूरा मामला सेटल करवाया। उसी दिन थाने से निकलते हुए विक्रांत से उस बाईस हज़ार के एक बड़ा हिस्सा मुझे वापस कर दिया था ऑनलाइन। मुझे लगा कि मेरी फ़ी मिल गई और रिग्रेट भी कम हो गया। मैं यह भी सोच रहा था कि क्या होता अगर मैं उस वक्त बारगेनिंग करता जब मैं उसे बाईस हज़ार रुपये दे रहा था। मैंने नहीं किया और कलेजे पर पत्थर धरे रहा। बाद में मुझे मेरे चुकाए रुपयों पर छूट भी मिली और मेरी छवि भी उसके सामने अच्छी बनी उस दिन कि मैंने कोई बारगेनिंग नहीं की।

इस बीच मुझे भाग्ये के लिए कुछ रुपयों की ज़रूरत थी। मैंने उसे कहा और उसने पच्चीस हज़ार रुपये भेज दिये। यह रुपये अभी भी मुझपे उसका क़र्ज़ है। 

कल देर रात जब मानसरोवर स्टेशन पर उतरा तो बात करने के लिए किसी को खोज रहा था। उसका ख़्याल आया और उसे फ़ोन कर दिया। बातचीत में पता चला कि वह कल्याण में है। वहीं उसका घर था। खारघर में उसने किराए पर अपना डेंटल क्लीनिक द अलाइनर डॉक्टर के नाम से शुरू किया हुआ था। फ़ोन रखने से पहले उसने यह भी बताया कि उसका जन्मदिन है आज। बात हो गई। मैं चलते हुए घर तक आ गया। दरवाज़ा खोला और थका हुआ सा निढाल हो गया। मन में कुछ बातें चलती जा रही थी। लग रहा था कि उसने बर्थडे बोला है तो ऐसे में उसे कुछ भेज देना चाहिए। यह भी लग रहा था कि मुझे कोई ऐसे कुछ बर्थडे पर भेजता तो कितना अच्छा लगता। उसको भी वैसा फ़ील करवाने के लिए मैंने देर रात क़रीब साढ़े ग्यारह बजे उसे ब्लिंकिट से आईसक्रीम, गोल वाली काजू बर्फ़ी और नमकीन भेजने का फ़ैसला किया। 

इनकम टैक्स रिटर्न भरते वक़्त उसने अपना आधार और पेन कार्ड भेजा था वाट्सएप पर, जो मेरे चैटबॉक्स में अब भी था। मैंने उसी से उसका कल्याण का पता निकाला और ब्लिंकिट कर दिया। क़रीब पौने बारह बजे उसका फ़ोन आया मुझे लगा कि वह उत्साहित होकर कुछ बोलेगा लेकिन उसने उधर से कहा कि ऑर्डर जो ब्लिंकिट से किए हो वह कैंसल कर दो क्योंकि मैं यहाँ दूसरी जगह आ गया हूँ। मैं घर पर नहीं हूँ। मन खिन्न हो गया। एक दो मैं वैसे ही ऑनलाइन ट्रांजेक्शन से दूर रहता हूँ और उसके लिए उसके च्वाईस की चीजें भेजी थी वह भी बेकार हुई। अब मामला था कि उस ऑर्डर को कैंसल कैसे किया जाए जो डेलिवरी के लिए निकल चुका है। मैंने ब्लिंकिट एप में टिप-टिप करना शुरू किया। इतने में बड़े भैया का फ़ोन आ गया। अब बड़ा धर्मसंकट हो गया। क्योंकि उनसे बात करते हुए ब्लिंकिट वाले का फ़ोन आ रहा था। इधर आज भैया की बेटी का भी जन्मदिन था। बात-बात में जब मैं उन्हें बता रहा था कि दूसरे फ़ोन पर ब्लिंकिट वाले का फ़ोन आ रहा है तो बोलते-बोलते ठहर गया। उन्हें ऐसा भी लग सकता था कि मैं अपने दोस्त के बर्थ-डे पर उसे ब्लिंकिट से कुछ भेज रहा हूँ लेकिन अपनी भतीजी को कुछ नहीं भेजा।


खैर, बहुत उहापोह के बीच ऑर्डर कैंसल हुआ और भरोसा दिया गया कि बीस रुपये कैंसलेशन का चार्ज काटकर बाक़ी रुपये रिफंड कर दिये जाएँगे। अचानक दिमाग़ में घुमा कि विक्रांत को दिया गया रुपया कुछ डिडक्ट होकर मुझे वापस मिल जाता है। पहली बार यह संयोग था जब दांत निकलवाने गया था लेकिन क्या इस बार भी यह संयोग ही है या फिर कुछ और है!


Saturday, August 29, 2026

फिर वही दूरियां


                                                 कामोठे-पूर्णिया के बीच के फ़ासले

 लोकमान्य तिलक टर्मिनस जाते हुए हर बार दोनों तरह की फीलिंग्स आती है - अच्छी भी और वैसी भी।

श्रीशैलम में तीन दिन और मुंबई में चार दिन बिताकर भाग्य और बच्चे वापस पूर्णिया के लिए निकल गये। यह सिलसिला २०२३ से लगातार चलता आ रहा है और पता नहीं कितने सालों तक ऐसा चलता रहेगा। कभी-कभी लगता है कि मैं किसी जेल में हूँ और मेरा परिवार कुछ दिनों के लिए आकर मेरी रिहाई करवाता है, अपने साथ हमें घुमाता है, बातचीत करता है, समय बिताता है और फिर मुझे इसी कारावास में छोड़कर चला जाता है।

गुंटूर में जब हमलोग मिले तो लगा जैसे कोई ठंडी हवा चली है। योजना जो बनी थी उसके मुताबिक़ भाग्य की ट्रेन चेरलापल्ली और मेरी ट्रेन सुबह हैदराबाद पहुँचने वाली थी, जिसके बाद मुझे हैदराबाद से चेरलापल्ली जाना था सबको लेने और फिर वहाँ से बस लेकर श्रीशैलम। योजना वैसे ही जटिल थी और असम की बाढ़ में और भी जटिल हो गई। हुआ यह कि सिलचर से किशनगंज होकर चलने वाली भाग्य की ट्रेन नौ घंटे देर से चलने की सूचना आई। जो ट्रेन किशनगंज में दोपहर के तीन बजे आने वाली थी वह बारह घंटा लेन यानि कि देर रात तीन बजे अब आने वाली थी। परिवार की सुरक्षा और सुविधा को देखते हुए मैंने किशनगंज में रिटायरिंग रूम बुक कर दिया और बच्चों की नींद पूरी हो गई। अब कहानी का अगला हिस्सा हैदराबाद में बदला। हुआ यह कि मेरी ट्रेन तो समय से बस दो घंटे देर से हैदराबाद पहुँच गई लेकिन चेरलापल्ली जाने का कोई मतलब नहीं रहा क्योंकि वह ट्रेन जो सुबह साढ़े चार बजे वहाँ आने वाली थी वह अब दोपहर के चार बजे आती। एक अलग टेंशन यह था कि श्रीशैलम के लिए आख़िरी बस पाँच बजे थी जो छूटनी तय हो गई थी, ट्रेन के देर होने की वजह से। 

परिस्थितियाँ ग्राउंड पर कई बार अचानक बदल जाती हैं और इसका मुझे ठीकठाक अनुभव दूरदर्शन में काम करते हुए हो गया था। मैंने कैलकुलेशन किया और तय किया कि भाग्य की गाड़ी का चेरलापल्ली तक इंतज़ार नहीं किया जाएगा और उसको गुंटूर में उतरने के लिए कह दिया। इधर मैंने हैदराबाद से रेपिडो करके सिकंदराबाद जाकर वहाँ से कर्मभूमि एक्सप्रेस लेकर गुंटूर पहुँचा। कुल मिलाकर हम दोनों वहाँ ढाई बजे पहुँचे, भागकर गुंटूर बस स्टैंड पहुँचे और वहाँ से श्रीशैलम की बस ले ली। योजना ज़बरदस्त सफल हुई और हमें रात में जंगल में रूकना नहीं पड़ा। वहाँ जाकर पहले से बुक हरिथा रिजार्ट में रूककर फिर अगले दिन से हमारा कार्यक्रम शुरू हुआ।

जैसा कि अक्सर होता है वहाँ से निकलने से पहले वाली रात यानि २४ अगस्त की रात हमारे बीच ज़बरदस्त वाली लड़ाई हुई। बच्चों के चीख-पुकार हुए। सबकुछ घातक हुआ और फिर अगले दिन क़रीब-करीब चीजें सामान्य हुईं। 

वहाँ से मुंबई आकर फिर पहले की यादें ताज़ा की गई। गमले में पेड़-पौधे लगाए गये। सबठीक सा रहा। पानी-पूरी, आलूचाट, ठेकुआ, नमकीन सब बने और फिर आख़िरकार ३० अगस्त की सुबह आ गई।

अगरतला एक्सप्रेस उसे पकड़ाकर मैं उसे वहीं छोड़कर ठाणे आ गया और मन की बात कार्यक्रम में लग गया। कभी-कभी बीत रही चीजों पर यक़ीन नहीं होता है। याद भी नहीं रहता कि मैं कब कहां रहा, किसके साथ रहा और वह दिन, समय, तारीख़ क्या थी।


Saturday, August 22, 2026

श्रीशैलम

                                                         पावर और पैसा

पावर बड़ा या पैसा। या फिर दोनों या फिर दोनों में कोई नहीं। समय बड़ा बलवान है, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है। लेकिन जब बात पावर और पैसे की आती है तो उसके मेरे अपने अलग-अलग अनुभव हैं।

इस बार श्रीशैलम में लगा कि पावर तो ठीक है लेकिन पैसे का होना भी बहुत ज़रूरी है। मुंबई ऑफिस से आरएनयू हैदराबाद को मेरे श्रीशैलम जाने की सूचना लिखित रूप में दी गई थी और आरएनयू हैदराबाद ने श्रीशैलम मंदिर प्रशासन को इसकी जानकारी दी थी। हमें समय से फ़ोन आने शुरू हुए और २३ अगस्त की शाम हम मंदिर परिसर पहुँच गये। हमारी तरह कुछ और लोग थे जो इस तरह दर्शन के लिए आये थे। स्पर्श दर्शन के लिए जो निर्धारित शुल्क था उस दिन हमने सुबह मंदिर प्रशासन के आदमी को फ़ोन पर दे दिया था, जब उसका फ़ोन आया था। दिन में हमने ख़रीदारी की और फिर शाम में समय से पहुँच गये। सबकुछ ठीक-सा ही लग रहा था सिवाय मेरी जेब के। जैसा कि अक्सर मेरे साथ होता है मेरे हाथ में ज़्यादा रुपये तो थे नहीं, यही इधर-उधर से जुटा-जुटाकर सौ-हजार थे जिनमें से दिन में मंदिर जाने के लिए ख़रीदे जाने वाले कपड़े में कुछ खर्च हो गये थे। एक सौ का और एक पचास का फटा सा नोट जेब में था, बाक़ी गूगल-पे के भरोसे यात्रा चली जा रही थी।

अंदर जाकर जब दर्शन हो गये। हमलोग बाहर आये तो जो साथ में लड़का था उसने ज़ोर देकर कहा कि हो गया सबकुछ। भाग्य ने नोटिस किया था कि हमारे साथ जो और थे उनमें से एक ने उसे पाँच सौ रुपये दिए थे। मैं अंदर से दहला हुआ था और बेइज़्ज़ती के लिए ख़ुद को तैयार कर रहा था। कुल डेढ़ सौ मैंने उसे दे तो दिए और वहाँ से निकल भी गया लेकिन ऐसा लगता रहा कि कहीं भीड़ में वापस न टकरा जाऊँ। मन अजीब सा परेशान था। थोड़ी दूर जाकर जब प्रसाद वाले लड्डू के लिए भाग्य और हम जाने के लिए रास्ता बदले तो जिसका डर था वही हुआ। वह लड़का वापस आया था और मेरे दिए डेढ़ सौ वापस देने लगा हंसते हुए। घोर शर्मिंदगी की बात तो थी मेरे लिए लेकिन मैं इतना ही कर पाने की स्थिति में था। आख़िर मैंने उसे मोबाईल से ढाई सौ और भेजे। वह पाँच सौ की अपेक्षा कर रहा था। लेकिन उतना भेज के और जो डेढ़ सौ वह मुझे दे रहा था वह भी उसके हाथ में छोड़ते हुए बहुत झिझक के साथ हमलोग आगे बढ़ गये। फिर प्रसाद के लिए लड्डू लेकर जब हमलोग लौटे तो पूरे रास्ते मन सशंकित रहा कि कहीं वह वापस न आ जाए। 

पिछले दिनों दार्जिलिंग में भी ऐसा ही हुआ था। जब केयरटेकर को मैं बस डेढ़ सौ रुपये दे पाया था। बाद में मैंने अपने मोबाईल के कैमरे में देखा तो नोटिस किया कि जब मैं वहाँ से निकल रहा था तो कार के पीछे कमरे में बरतन साफ़ करने वाली वह महिला हमारी कार को देख रही थी। वहाँ भी रहने का इंतज़ाम मैंने अपने कंटैक्ट से किया था।

पावर अपनी जगह है लेकिन रुपये का होना कितना ज़रूरी होता है वह ऐसे अनुभवों से पता चलता है। अगर मैं ऐसी जगहों पर आसपास के लोगों को पाँच सौ-हजार देते चलूँ तो शायद मुझे मेरे दफ़्तर की वजह से मिला पावर जस्टिफ़ाई हो जाएगा। 

कुल मिलाकर न रुपया बड़ा है न पावर, बड़ा है तो बस समय। मुझे याद है जगन्नाथ पुरी में जब माँ-पापाजी के साथ सबलों दर्शन कर के लौटे और जिन्होंने मदद की थी उनको जब मैंने पाँच सौ रुपये दिये थे तो उन्होंने बड़ी विनम्रतापूर्वक लौटाते हुए कहा था कि आपने कहा था कि माँ नहीं चल सकती थीं इसलिए हमने आपकी मदद की। मुझे लगा कि इन्होंने पाँच सौ रुपये को ऐसे नकार दिया, इधर दूसरी तरफ़ कहीं पाँच सौ न देने के लिए अपमान की स्थिति भी बन गई। कुल मिलाकर हर तरह के लोग हैं तो न पावर बड़ा है न पैसा, बड़ा है समय। समय कब किससे, कहां, किस रूप में मिलवा दे किसे पता!

Thursday, August 20, 2026

ऐसी वैसी कैसी कैसी

 

                                                            श्रीशैलम यात्रा 

पिछले दिनों जब लाडली ने कहा कि स्कूटी के री-रजिस्ट्रेशन में करीब साढे पांच हजार लगेंगे तो लगा जैसे किसी ने मेरे अंदर करंट दौड़ा दिया हो। सर फटने जैसा लगा, खून खौलता गया और समझ ही नहीं आया कि क्या कहा जाए। श्रीशैलम का एक बार प्लान जून में बना था जो नहीं हो पाया। दूसरी बार अगस्त में बना लेकिन हाथ खाली होता गया। 10-11 अगस्त तक चिंता की लकीरें दिमाग पर साफ थी कि पता नहीं कैसे हो पाएगा। हमलोग अलग-अलग जगह पर रह रहे हैं। खर्च भी उसी हिसाब से हो रहा है। कहीं जाने का मतलब बस टिकट का खर्चा नहीं होता है बल्कि कपड़े, खानपान, रहना और अन्य जरूरतें भी होती है। दार्जिलिंग का खर्चा बीस हजार से ज्याद पड़ गया था टिकट मिलाकर। 

अच्छा हुआ कि गढचिरौली का टूर आ गया ऑफिस से और फिर उसके एडवांस में 15000 रुपये मिल गये। टिकट में वैसे ही करीब आठ हजार खर्च हो चुके थे ऐसे में यही कोई सात हजार थे जो हाथ में थे। वहां रहने खाने के दौरान एक-दो हजार खर्च होने के बाद बस वही पांच हजार थे जिसको लेकर श्रीशैलम की यात्रा होनी थी। यह जगह न सीधे किसी रेलवे स्टेशन से जुड़ा था और न ही आसानी से पहुंच वाला। पांच हजार में दिक्कतें होनी ही थी फिर भी लग रहा था कि हाथ बांधते हुए यात्रा हो जाएगी। ऐसी यात्रा का मुझे और भाग्य को अनुभव है। 

ऐसे में लाडली का फोन आना और साढे पांच सौ का खर्च तुरंत बताना मन को बेध गया। अकेले कमरे में बहुत देर तक रोने और पागलों की तरह चिल्लाने के बाद कितनी बार मैंने अपने ही सर को धुना। मन में आ रहा था कि कोई आए और बताए कि ये सब कब तक चलेगा! क्या राहू मेरे अकाल मृत्यु की वजह बनेगा? क्या जो भी बिगड़ा है वह कभी ठीक नहीं हो पाएगा! भाग्य को फोन किया तो उसने जले पर नमक छिड़क दिया यह बोलकर कि आप ही न बोले थे लाडली को करने और लाडली को बोले थे छोटी दीदी को नहीं बताने। यह इस तरह था कि अब भुगतिए।

रोना-चिल्लाना जो था वो हुआ लेकिन रुपये तो देने ही थे तो मैंने दि दिए। उसके बाद श्रीशैलम को लेकर जो रहा-सहा उत्साह था वह भी खत्म हो गया। दिन और रात घुटन भरी हो गई और ऐसा लगा कि यह अंधेरा आजीवन रहेगा। पंडित जी पहले ही बता चुके हैं कि राहु का दशा बहुत प्रभावशाली है और शनि भी घोर विपरीत है। कुल मिलाकर जो दिन जैसे बीत रहा है उसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं। अकाउंटेंट साहब को लेकर मन में प्रतिशोध दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है और साथ में यह मलाल भी कि उनका कुछ ऐसा नहीं हो पा रहा जिसे देखकर मन संतोष हो। उनके पास इतने रुपये हैं कि हर तरह का पूजा पाठ करवाकर ग्रहों को शांत करवा सकते हैं वह।

खैर, परिस्थितियां अपना खेल दिखा रही थी। मैं पहले भी कई बार इस तरह की परिस्थितियों से गुजर चुका हूं जब चीजें एक के बाद एक बुरी और एकदम बुरी होती चली जाती है और जो नहीं करना है वह भी करने को आदमी बाध्य हो जाता है। उदाहरण के लिए मैं एकादशी में चावल नहीं खाता लेकिन अप्रैल में ऐसी परिस्थिति बनी कि उसक दिन मुझे मछली-भात खाने के लिए बाध्य होना पड़ा और वह भी यह जानते हुए कि उस दिन एकादशी था। ऐसा कई बार हुआ जब मुझे समझ में आया कि जो होना है वह होकर ही रहेगा। राहु इसी का नाम है। कर्ज राहु का प्रिय है और वह जिसपर सवार होता है उसे वह कर्ज से बाहर आने नहीं देता। 

अगले ही दिन घर का रसोई गैस खत्म हो गया। जो पांच हजार मैंने बचाए थे उसके खत्म हो जाने के बाद अब जो गैस का खर्च था वह कर्ज ही होना था। मैं इतना प्रताड़ित हो चुका था कि कई बार मन करता था कि रेलवे ट्रैक पर लेटकर अपने शरीर को दो टुकड़ों में कट जाने दूं। कुछ घंटों का असहनीय दर्द होगा लेकिन फिर इतने सालों से चला आ रहा और पता नहीं कितने सालों तक चलने वाला दर्द कम से कम जड़ से खत्म हो जाएगा। यह अलग बात है कि ऐसा करने की हिम्मत जुट ही नहीं पा रही। गैस खत्म होने के बाद मकानमालिक की बेटी ने गैस ऑर्डर किया और फिर मुझे उसे 941.50 भेजने पड़े। यह रुपये मेरे दूसरे बैंक में थे जिसे मैं आपात स्थिति के लिए बचाकर रखता हूं। मैं एकदम दरिद्र हो गया। आंध्रप्रदेश में मंदिर जा रहा हूं, ऐसा सोचकर ही चिढने लगा।

19 अगस्त को एक मेल आया कि साढे तीन हजार रुपये मुझे दूरदर्शन से आए हैं। यह एकदम ही चौकने वाली बात थी क्योंकि पिछले महीने की आखिरी तारीख को जो दौरा मैंने किया था यह उसके पैसे थे जो इतनी जल्दी कभी नहीं आते। हमारे पैसे अकाउंट से क्लियर होने में चार-पांच महीने कम से कम लगते ही हैं। मैंने चौंकते हुए अकाउंट स्टाफ सुजाली जी को फोन किया तो उन्होंने कहा कि क्लियर जल्दी कर दिया उन्होंने। कुछ महीने पहले मैंने अकाउंट सेक्शन की शिकायत की थी शायद यह उसी का परिणाम था। जो भी हो, जान में जान आई कि चलो कुछ तो हाथ में आया। उधर रुपये आए और इधर फिर भाग्य का मैसेज आया कि 15646 जो किशनगंज से दोपहर करीब तीन बजे निकलने वाली थी वह अब नौ घंटे देर से चलेगी। इसके कई मतलब थे। सबसे पहला यह कि भाग्य को किशनगंज के लिए अब पूर्णिया से दूसरी बस लेनी होगी, दूसरा कि भाग्य और बच्चों को रात के दो-तीन बजे एक ऐसे स्टेशन से ट्रेन लेनी होगी जहां उनके साथ कोई नहीं होगा और तीसरा हैदराबाद पहुंचकर वहां से श्रीशैलम की बस उस रोज मिलेगी या नहीं इसकी गारंटी नहीं क्योंकि वहां से आखिरी बास शाम पांच बजे तक ही चलती है। उसके बाद जो बसें चलती है उसके जंगली सीमा पर रोक दिया जाता है और बाकी का सफर वह अगले दिन पूरा करती है। श्रीशैलम में होटल पहले से बुक था जिसका रुपया पानी में जाने की आशंका भी बन गई। कुल मिलाकर सबकुछ उथल-पुथल हो गया। भाग्य से बातचीत के क्रम में भी कड़वाहट भरती गई। मन बैठा-बैठा सा हो गया लेकिन राहू के प्रभाव का काट के लिए मैं पूजा भी तो नहीं करवा पाया था।

भाग्य जब 20 अगस्त यानि कि आज पूर्णिया से निकली तो बस स्टैंड पर बच्चों के साथ वीडिया कॉल पर बात हुई। बच्चे उत्साहित थे लेकिन थके हुए भी लग रहे थे। मैं यह सोचकर ही परेशान हो गया कि ये करीब छह-सात बजे किशनगंज पहुंच तो जाएंगे लेकिन इनको वहां से ट्रेन रात को दो-तीन बजे पकड़नी होगी। गहरी नींद में भाग्य कैसे बच्चों को लेकर ट्रेन में चढेगी और उस वक्त ट्रेन के अंदर का क्या दृश्य होगा। किशनगंज स्टेशन पर रिटायरिंग रूम बुक करने का आइडिया अचानक सूझा। बिहार के स्टेशनों पर और खासकर जब ट्रेन विकली हो और एक ओर से दूसरे छोर तक जा रही हो, अंतिम समय में रिटायरिंग रूम बुक होने की संभावना बिल्कुल नहीं थी। मुझे तो लगा था कि स्टेशन पर शायद रिटायरिंग रूम होगा भी नहीं। प्रभादेवी बस स्टैंड से दूरदर्शन आने तक रास्ते में प्रयास किया लेकिन आईआरसीटीसी के मोबाईल एप में कुछ प्रॉब्लम आ रहा था। ऑफिस आते ही करीब सवा तीन बजे बार-बार कोशिश किया तो वेबसाईट से लॉगिन हो गया और डिलक्स रूम भी उपलब्ध था। कुल 1022 रुपये लगे लेकिन एक अच्छा एसी कमरा बुक हो गया। मन को थोड़ी तसल्ली मिली की पति और पिता होने का फर्ज गरीबी में भी निभ गया वरना बच्चे और भाग्य पता नहीं वेटिंग हॉल में कैसे रहते जहां न सामान की सुरक्षो होती न निजता रह पाती और न ही सोने की पर्याप्त सुविधानजनक जगह होती। लेकिन खुशी थोड़ी ही देर में हवा होने लगी जब रुपये की बात दिमाग में घूमी। दूरदर्शन से आए रुपयों से मैंने भुगतान तो कर दिया था लेकिन पास में कैश के नाम पर वही दो-ढाई हजार पड़े थे।

भाग्य ने वहां रिटायरिंग पहुंचकर वहां से वीडियो कॉल किया तो लगा कि अच्छा हो गया। इधर थोड़ी देर बाद ही अटल पेंशन योजना का मासिक किस्त कट गया खाते से। कुल मिलाकर ऐसा लग रहा था कि कोई बचा रहा है और कोई मार रहा है। जो हो, एक बात बहुत पहले प्रदीप रावत ने कही थी कि बचाने वाला मारने वाला से हमेशा बड़ा होता है। बचा तो वही रहा होगा जिसके आगे रोज मैं दीया जलाता हूं। 

Sunday, August 16, 2026

गढ़चिरौली

                                                 एक सपने का पूरा होना

महाराष्ट्र में क़रीब-करीब सभी ज़िलों में जाना हो चुका था। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पूरे महाराष्ट्र के भ्रमण तो हो ही गया था और बाक़ी अलग-अलग मंत्रियों, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या अन्य सरकारी कार्यक्रमों के बहाने बहुत सारी जगहों पर जाना हो चुका था। हालाँकि एक ऐसी जगह थी जहां जाने को लेकर मन में हमेशा एक तरह की बेचैनी रहती थी लेकिन संयोग बनना बहुत मुश्किल था और वह जगह था गढ़चिरौली।

ऐसा नहीं था कि मैं कभी गढ़चिरौली गया नहीं था। दरअसल गढ़चिरौली के अंदर उन जगहों पर मेरे जाने की इच्छा थी जहां नक्सली हमले होते थे या फिर जो संवेदनशील जगह थी। एक बार राष्ट्रपति जब गढ़चिरौली के एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत में आए थे तो मैं उसमें गया था लेकिन वह विशुद्ध सरकारी कार्यक्रम था।

जब ११ अगस्त को ऑफिस से कहा गया कि दिल्ली चाहता है कि पंद्रह अगस्त को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से लाइव की जाए। इसके लिए मेरा नाम आगे किया गया और जगह तय हुआ गढ़चिरौली। जानते वक़्त लगा कि एक सपना ही पूरा होने जा रहा है। उन जगहों की वास्तविकता को जानने का मौक़ा देर से ही सही, मिलने वाला था। ऑफिस की ज़रूरत बस इतनी थी कि मैं वहाँ १५ अगस्त की सुबह की बुलेटिन में लाइव कर दूँ। इसके लिए मुझे १४ को मुंबई से नागपुर की फ्लाईट पकड़नी थी और फिर १५ को लाइव करके गढ़चिरौली से वापस नागपुर आकर वहाँ से मुंबई आ जाना था। मैं इस मौक़े को इतनी आसानी से गँवाना बिल्कुल नहीं चाहता था।

मैंने अपनी अलग योजना बनाई। ऑफिस से आग्रह किया कि मुझे एक दिन एडवांस में भेजा जाए ताकि मैं वहाँ से अच्छी स्टोरी फ़ाईल कर सकूँ। बोड़के सर मुझसे कनविंस हो गये। मैंने एक रोडमेप बनाया। सीआरपीएफ़ के अधिकारियों के नंबर जुटाए और फिर उनको एक-एक कर फ़ोन करना शुरू किया। समझ में आ गया कि दिल्ली  से एक लेटर अगर निकल जाए तो जो मैं चाह रहा हूँ वह करना आसान हो जाएगा। यहाँ भी क़िस्मत ने साथ दिया और दिल्ली ने मेरे कहने पर सीआरपीएफ़ के डीआईजी के नाम एक लेटर लिख दिया जिसमें मुझे हर संभव मदद करने की बात कही गई। यही मुझे चाहिए था।

मैं १३ की ही शाम गढ़चिरौली पहुँच गया। नवीं बटालियन के कमांडेंट शंभू कुमार नवादा ज़िले के निकले। उन्होंने प्राणहिताय थाने के अंदर नवीं बटालियन के मुख्यालय में रहने का प्रबंध करवा दिया। खाना-पीना भी सब वहीं। मैंने एक और काम यह किया था कि गढ़चिरौली के स्ट्रिंगर को बाईपास करके नागपुर से कैमरा टीम ले ली थी। गढ़चिरौली के स्ट्रिंगर के व्यवहार को मैं जानता था इसलिए उसके साथ मुझे वैसा सबकुछ करने में बड़ी कठिनाई होती जो बाहरी स्ट्रिंगर के साथ करना आसान था।

१३ की रात कमांडेंट के साथ उनके आवास पर खानपान हुआ। शराब भी हुई। देर रात तक अगले दिन का प्लान बना और अगले दिन मैं बिनागुंडा की तरफ़ निकल गया। पुलिस की सुरक्षा दी गई थी। गाड़ी के आगे-पीछे फोर्सेज सिविल ड्रेस में थी ही, मेरी गाड़ी में भी पुलिस के लोग सिविल ड्रेस में हथियारों से लैस चल रहे थे। जाते वक़्त ड्राईवर को देर हुई तैयार होने में तो मैंने ख़ुद ही इनोवा क्रिस्टा चलाई। दुनिया भर के जोखिम मैंने इस उमर में लिए हैं, उनमें से एक यह भी याद रहेगा। भामड़गढ में गाड़ी कीचड़ में ज़बरदस्त फँसी और तमाशा भी बना लेकिन सब फिर संभल गया। डीएसएनजी आई, जैसे-तैसे नो-नेटवर्क एरिया में फ़ीड दिल्ली को गया। ज़बरदस्त मेहनत के बाद उस दिन चैनल पर न केवल गढ़चिरौली के नक्सल प्रभावित क्षेत्र से मेरी स्टोरी चली बल्कि ज़बरदस्त असर भी हुआ। मैंने मुंबई में अपने बॉस को थैंक्स का मैसेज किया। मैं अपने सपने पूरे कर रहा था। अगले दिन यानि १५ अगस्त को वहाँ से हॉटस्वीच हुए और सबकुछ शानदार रहा।

मैं वहाँ से नागपुर आया। नागपुर के स्ट्रिंगर को उसके घर छोड़ा। उसके यहाँ खाना खाया, उसका इनकम टैक्स रिटर्न भरा और फिर दूरंतो से वापस मुंबई आया।

मुंबई में मेरे १२ साल पूरे हुए और गढ़चिरौली जाने का एक सपना बारह साल बाद आख़िरकार पूरा हो गया।