पड़ते-पड़ते रह गया
हम काम करते हैं जिस स्पीड से इंटरनेट चलता है। हम दफ्तर के लिए घर से चलते हैं और लोकल पकड़ते हैं फिर हम चलते हैं जिस रफ्तार से लोकल चलती है। हम बात करने को होते हैं किसी से लेकिन फिर ठहर जाते हैं, थम जाते हैं, रूक जाते हैं जिस रफ्तार से दिमाग चलता है। हम किसी चीज को जानने के लिए अचानक व्याकुल हो जाते हैं लेकिन यूट्यूब खोलकर इंतजार करते हैं उस पांच सेकंड का जिसके बाद हम उस एड को स्किप कर सकें। जरूरी चीजें के लिए बात करने से पहले एक दबाएं, फिर दो, फिर नौ और फिर कुछ और।
सच में जिंदगी कितनी चीजों से भर गई है। इसे खाली कैसे किया जाए!
नकारात्मकता से भरते जा रहे मन में ऐसी रोशनी कैसे बिखेरी जाये कि अंदर पूरा रोशन हो जाए। कितना तेज-तेज सब होता है।
9 सितंबर को राजभवन जाते वक्त कितनी ही बार ऐसा लगा कि बहुत हुआ। अब और नहीं। अब और नहीं। नहीं हो पाएगा। कैसे हो पाएगा। छूटे कैसे ये सब। कब। कब तक।
11 बजे राजभवन पहुंचने का समय तय था। दिमाग मंथर गति से चलता जा रहा था रात से ही। पहले यह कि सवेरे आठ बजे ऑफिस में पंच कर दिया जाए ताकि राजभवन के कार्यक्रम के बाद थोड़ी देर ऑफिस में समय बिताकर निकला जा सके। इसके बाद यह कि नौ बजे पहुंचा जाए और सीधा कोस्टल पकड़कर राजभवन पहुंच जाया जा सके। सबकुछ दिमाग में ही चलता रहा। इस बीच सवेरे खीरा और अमरूद काटकर लंच को कसा गया। सब छिटपुट काम निपटाते हुए आखिरकार नौ बजकर कुछ मिनट पर दरवाजे को ताला लगाकर तेज कदमों से स्टेशन तो पहुंच गया लेकिन होनी जो थी सो हो गई।
9:4 की लोकल का छूटना भारी पड़ गया। उसके बाद की लोकल ठाणे वाली थी और फिर उसके बाद की एसी। कुल मिलाकर जो लोकल मिली वह थी 9 25 वाली और वह 10 38 में सीएसटी पहुंचती थी। दिल ऐसे धड़क रहा था जैसे बीच में ही रूक जाए और फिर सबको धीरे-धीरे मालूम हो कि दिल के दौरे से एक अड़तीस साल के लड़के ने मुंबई लोकल में दम तोड़ दिया। दो-तीन लोग तो ट्विट कर ही देंगे। ट्रेन धीरे-धीरे लेट होती गई और आखिरकार 10 52 में सीएसटी जाकर लगी। उतरकर भागते हुए मै प्रेस क्लब गया जहां ड्राईवर खड़ा था उजली ग्लांजा के साथ और फिर वहां से शुरू हुआ तनाव का दूसरा दौर।
गिरगांव चौपाटी से आगे बढ़ते ही जाम में गाड़ी फंस गई। थोड़ी देर में बगल से एक काफिला गुजरा। यह काफिला मुख्यमंत्री से किसी बड़े जज का ही था। देखकर खून ठंढा होने लगा कि राजभवन में एंट्री मिलनी कहीं मुश्किल न हो जाए। पुराने डायरेक्टर के ट्रांसफर के अभी एक सप्ताह भी नहीं बीते थे ऐसे में जिस महिला को कार्यभार सौंपा गया था उससे पहले से मेरी अनबन थी और यह अनबन मेरी देरी की वजह से ही थी। सांस धीरे-धीरे अंदर बाहर करते हुए रक्तचाप को नियंत्रित रखते हुए मन को समझाना कठिन हो रहा था। उधर से बुआ का फोन आ रहा था कि जल्दी आजा नहीं तो एंट्री में दिक्कत होगी।
कुल मिलाकर 1132 के करीब मैं राजभवन पहुंच गया। अंदर एंट्री में कोई दिक्कत नहीं आई क्योंकि मेरा नाम वहां पहले से लिस्ट में था। कुछ औपचारिकताओं के बाद मुझे छोड़ दिया गया। लेकिन जैसा कि होता आया है जबतक पूरी चीज न हो जाए हुआ को हुआ नहीं समझना चाहिए। राजभवन के जिस हॉल में कार्यक्रम होना था वहां के ठीक बाहर हड़बड़ी के कारण मैं सीढी से न जाकर सीधी ऊपर चढ गया। वहां एक पुलिस अधिकारी ने आईडी मांगी। दी तो बोला पास कहां है। फिर वह मेरी शैली को इतना इगो पर लिया हुआ था कि पास खड़ी एक महिला अधिकारी से कह दिया कि इसको अंदर नहीं जाने देना है। फिर उसने मुझे उसको फोन करने के लिए कहा जो अंदर पहले से है। बुआ को मैंने फोन किया। बुआ आया और तब जाकर मैं अंदर जा पाया। उसके बाद भी कहानी खत्म नहीं हुई। हुआ यह कि इस भागमभाग में मुझे शूशू लगी थी वह याद ही नहीं था। जब मैं उपर वाले फ्लोर जहां मीडिया बैठती वहां गया तो ध्यान आया कि जोर से शूशू लगी हुई है। ट्वाइलेट नीचे ही था। नीचे आया तो अब वह पुलिस वाला चिढ गया। वे सब एक साथ बोलने लगे कि तुमको कॉपरेट करके गुडविल में जाने दिया तो तुम फिर नीच क्यूं आए। मैंने ज्यादा मुंह नहीं लगाया और फिर वापस ऊपर चला गया। शपथ ग्रहण समारोह महज आधे घंटे के अंदर खत्म हो गया। मैं नीचे आया, शूशू किया और निकलने लगा। कहानी यहां भी खत्म नहीं हुई। जब मैं राजभवन से निकल रहा था तो उसी पुलिस अधिकारी पर नजर पड़ी और मैंने अपनी गाड़ी को धीरे करवाया और फिर पिछला शीशी खोलकर उनको थैंक्यू कहा। उन्होंने हाथ उठाकर हंसते हुए अभिवादन स्वीकार किया।
यूं तो कहानी यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी लेकिन हुई नहीं। हुआ यह कि खीरा और अमरूद से मेरा कुछ खास तो होने वाला था नहीं तो वहां आईएनएस के रिपोर्टर प्रशांत से बात में मालूम हुआ कि गरवारे क्लब में चंद्रकांत बावनकूले ने मीडिया वालों को बुलाया है। कुछ ब्रीफिंग है। इससे हमें कोई मतलब न था। मतलब की बात यह थी कि वहां खाना भी था। हम और बुआ ने मन बना लिया। ड्राइवर को गाड़ी गरवारे क्लब लेने के लिए कहा। वहां जाकर थोड़ी देर बैठे ही थे कि देखा हमारा एक कैमरामेन पहले से वहां है। अब यह मुंह छिपाने वाली बात हो गई। क्योंकि कान ही कान खबर उड़ती कि मैं वहां खाने के लिए गया हूं। छिपते-छिपाते हमलोग वहां खाकर निकल लिए और कैमरा मैन को भनक भी नहीं लगी। बुआ को उसके घर छोड़कर मैं आराम से गाड़ी में सोता हुआ ऑफिस आ गया।
पता नहीं ऐसी जिंदगी कब तक चलेगी।
