Sunday, March 1, 2026

Friday, February 27, 2026

राहु और शनि की महादशा और अंतर्दशा

 

                                                    अवरोध ही अवरोध

दिन ब दिन इस दौर को कहीं लिखा जा सकता तो बाद में पढ़ने पर यकीन होता कि हां ऐसा हुआ था। कहते हैं आइंसटीन ने ही शायद कहा था महात्मा गांधी के बारे में कि आने वाली पीढ़ी को यकीन नहीं होगा कि हाड़मांस का ऐसा कोई इंसान कभी धरती पर हुआ था। वो तो अच्छा हुआ कि गांधी के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा गया जिससे कम से कम यह तो स्पष्ट रहा कि हां गांधी थे। ऐसा ही इस दौर के बारे में भी होना चाहिए था हालांकि हुआ नहीं क्योंकि इतनी फुरसत ही नहीं हो सकी कि सबकुछ लिखा जा सके।

मुंबई छोड़ते वक्त जो चीजें काउंटडाउन में चल रही थी वह थी डोमिसाइल, चीजों को बेचना, स्कूटी को ठिकाने लगाना, ऑफिस और लैंड लॉर्ड को बताना और बाकी कुछ खुदना चीजें। इनमें से कोई भी चीज अच्छे से नहीं हो पाई। गाड़ी अंत-अंत तक कहां रहेगी यह तय नहीं हो पाया। मुंबई के खरीदार ने सोलह हजार का भाव बोला जिसपे बात बनी नहीं, दिल्ली भेजने की प्रक्रिया काफी जटिल रही इसलिए वह भी नहीं हो पाया और जब गाड़ी को कटिहार ले जाने के लिए एलटीटी ले जाया गया तो वह रात अबतक की भयानक रातों में से एक रही। पार्सल वाले ने लेने से मना कर दिया। रात साढे दस बजे सीपीआरओ डॉ स्वप्निल नीला को फोन करना पड़ा, वहां से फोन-फोन देर रात तक चला और आखिरकार वहां के क्लर्क ने जैसे-तैसे काम किया लेकिन कटिहार पहुंचकर वह गाड़ी उतर नहीं सकी क्योंकि दस मिनट में उतने सामान के बीच से गाड़ी निकालना नहीं हो पाया। कुल मिलाकर गाड़ी निकल गई आगे और कल होकर उसे किशनगंज या किसी दूसरे स्टेशन से वापस बुलाया गया। संयोग ऐसा बना कि मैं तब पटना बार काउंसिल के काम के लिए चला गया था और आने के बाद जब कटिहार गया तो गाड़ी के वहां पड़े रहने के कारण पैनाल्टी के रूप में ढाई सौ रुपये अलग से लग गये। 

मुंबई अकाउंट सेक्शन में टीएडीए के सारे बिल्स सही से जमा किये हुए थे और किसी में किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं थी। कल अप्रत्याशित रूप से दर्शना का फोन आया और कहा गया कि बिल में हॉटल का नाम लिखना है। सच ये है कि हॉटल के बिल को वैसे ही भरा गया था जैसे अबतक भरता आया था। ऐसा क्यूं हुआ पता नहीं। मैंने उनसे कह दिया कि कुछ चीज तो वह खुद से भी लिख सकती हैं। अब आज जब बात हुई तो कहा गया कि सिग्नेचर की भी जरूरत है। रूख भी बदला था। समझने में देर नहीं लगी कि यह भी उसी का किया कराया है। 

ऐसा ही एक और संकट पैदा हुआ। बार काउंसिल की परीक्षा का फार्म आ गया और उसमें लगने से साढे तीन हजार रुपये। मेरे बैंक अकाउंट में कुल चार रुपये थे और जब लाडली को देने के लिए दस रुपये भेज रहा था तो इनसफिसिएंट बैलेंस लिखा आ गया स्क्रीन पर। पैसो की तंगी तो खैर राहु की देन थी ही लेकिन मानसिक प्रताड़ना जो शायद शनि की वजह से था वह भी दमदार था। हुआ यूं कि 7 जून को परीक्षा की तिथी निर्धारित हुई लेकिन सेंटर कोई एक तय करना था। अब एक पैर मुंबई और एक पैर बिहार में रखकर यह अत्यन्त सरदर्द बन गया कि सैंटर क्या दिया जाए। अररिया में कितना रुपया कब मिलता है इसी पर यह तय होना था कि यहां रूका जाएगा या यहां से वापस मुंबई जला जाया जाएगा। दूसरी बात यह कि यहां से अगर मुंबई लौटता हूं तो आगे फिर यहां का रास्त शायद ही बन पाएगा कभी! 

अवरोध ही अवरोध हर जगह पसरा था। 

Thursday, February 26, 2026

अंधकार ही अंधकार

                                                     ऐसा दौर...

पुणे में एक निचली अदालत के बाहर एक आदमी से आत्महत्या कर ली। बिना गूगल देखे जो याद है वह यह कि उसका कोई सिविल मैटर कोर्ट में चल रहा था जो हर तारीख को अगली तारीख में बदलता जा रहा था। जो खबरें छपी उसके मुताबिक मामला उसके जमीन से संबंधित था और बार-बार तारीख मिलने के बाद एक दिन उसने आत्महत्या कर लिया।

पिछले साल 16 अक्टूबर को हिंदुस्तान टाइम्स की वेबसाईट पर छपी इस खबर के मुताबिक उसकी उम्र इकसठ साल थी और वह उसके मामले की सुनवाई पिछले इक्कीस साल से हो रही थी। आखिरकार उसने कोर्ट के तीसरे फ्लोर से सवेरे करीब पौने बारह बजे छलांग लगाई और अपना वजूद समाप्त कर लिया। बाद में पुलिस को उसके पास से एक सुसाइड नोट मिला जिससे पता चला कि नब्बे के दशक में उसके पिता ने जिस पुश्तैनी जमीन को बेचा उस बिक्री को उसने कोर्ट में चुनौती दी थी और वह इस सुनवाई के दौरान घोर मानसिक प्रताड़ना से जूझ रहा था। उसे एक टुकड़ा दिया गया था लेकिन उसपर उसके भाई ने कंस्ट्रक्शन किया जिसे बात में कोर्ट ने स्टे लगाया लेकिन फिर स्टे हटा लिया गया। कुल मिलाकर चीजें हर स्तर पर उलझी हुई थी। उसकी बेटी को बयान दर्ज के लिए पुलिस ने बुलाया और पूरे मामले को कानूनी दृष्टिकोण से देखते हुए मामले को रफा-दफा कर दिया गया। कौन पड़े इस झमेले में कि वह मरने से पहले कितनी बार मरा था और कितनी बार मर रहा था...

ऐसी ही एक खबर थी पुणे की जहां पोर्श कार मामला। एक लड़के ने नशे में एक बेशकीमती कार से कुछ लड़कों को कुचल दिया। मौते हुई। पुलिस ने जांच की और मामला दबता गया। मामला एक बार फिर उफान मारा जब पता चला कि मेडिकल रिपोर्ट में तो ड्राइवर के खून में नशा नहीं मिला लेकिन सीसीटीवी से पता चला कि उसने थोड़ी देर पहले ही जमकर दारू पी थी। जांच फिर बढ़ी तो पता चला कि वहां के एक बड़े अस्पताल के कुछ बड़े अधिकारियों ने रुपये लेकर खून बदल दिये थे। यही कोई दो-चार लाख। कहीं चिता जली लेकिन कही पैसों की भूख भरी नहीं! ससून अस्पताल के चिकित्सा अधिकारी जिसने रक्त में नमूनो में बदलाव किया से लेकर उस लड़के के परिवार वालों को पहले बॉम्बे उच्च न्यायालय और बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत दे दी। ट्विटर पर बहुत लोगों ने बहुत कुछ लिखा लेकिन कुछ नहीं हुआ। अनिश अवधिया और अश्विनी कोष्टा की चिता जल गई और उन दोनों के जाने की टीस उनके परिवारों को ताउम्र रहेगी लेकिन किसे पड़ी है...


भागलपुर में विक्रमशिला ब्रीज पर एक महिला का अपने छोटे से बेटे के साथ पुल से कूदने के प्रयास करने के दौरान एक पुलिसवाला द्वारा बचाने का वीडियो वायरल हुआ था। हिम्मत जुटाकर देखा तो औरत भी गरीब थी और बच्चा एकदम ही अबोध था। ऐसी कुछ तो नाउम्मीदी होगी जो उस औरत को लगा होगा कि मर जाना ही अब एकमात्र उपाय है। यह वीडियो एकदम थर्रा देने वाला था।


Tuesday, February 24, 2026

Thank you Papa

 

                                                                               A Tuesday!!

It was a much needed touch. By giving the keys respectfully, he touched my soul. Attending office in Araria daily from Purnea is difficult not because of distance but because of budget. My promised salary is 25000 and if I travel by my car the fuel cost would be roughly 24000, by bus the cost would be 6000. My mental state is so weak that I die millions death each moment. A few death averted as I was given the key of his car. Bhagya must have been instrumental in making my way easy but it’s not as it appears to be!




Monday, February 23, 2026

थमा हुआ समय

 

 

इस अलगाव की एक वजह नहीं बल्कि अनेको वजहें हैं। दिमाग उन घटनाओं को भुला नहीं पा रहा जो कालांतर के विभिन्न कालखंड़ों में हुई। जैसे किसी बड़े वृक्ष को जड़ को तलाशना मुश्किल है वैसे ही परिवार में टूट की शुरुआत को तलाशना भी दुरूह कार्य है। कोई पौधा शुरू भले ही एक बीज के किसी रेशे से होता है लेकिन दिन-ब-दिन बदलते मौसम में वह रेशा कब अन्य रेशों को पोषित करते-करते अपना अस्तित्व भूलकर प्रकृति में विलीन हो जाता है इसकी भनक कभी किसी को नहीं लग पाती। जड़ें गहराते-गहराते नए-नए रास्ते तलाशती रहती है और आखिरकार एक समय ऐसा आता है जब ऊपर से हरा-भरा लगने वाला वृक्ष अंदर कितने ही ऐंठनों से भर चुका होता है। उस ऐंठनों के बीच उसकी जड़ें तलाशना फिर असंभव ही हो जाता है।

परिवार कब से टूटा कौन बताए! या कहीं ऐसा तो नहीं कि परिवार तो पूरा होते ही टूटने लगा बस दरारें देर से दिखाई देनी शुरू हुई!