Saturday, September 12, 2026

मीठी याद छोटे के साथ

 खिड़की टू खिड़की किताब के पन्नों को दिखलाना 

Friday, September 11, 2026

दिल का दौरा

                                                      पड़ते-पड़ते रह गया

हम काम करते हैं जिस स्पीड से इंटरनेट चलता है। हम दफ्तर के लिए घर से चलते हैं और लोकल पकड़ते हैं फिर हम चलते हैं जिस रफ्तार से लोकल चलती है। हम बात करने को होते हैं किसी से लेकिन फिर ठहर जाते हैं, थम जाते हैं, रूक जाते हैं जिस रफ्तार से दिमाग चलता है। हम किसी चीज को जानने के लिए अचानक व्याकुल हो जाते हैं लेकिन यूट्यूब खोलकर इंतजार करते हैं उस पांच सेकंड का जिसके बाद हम उस एड को स्किप कर सकें। जरूरी चीजें के लिए बात करने से पहले एक दबाएं, फिर दो, फिर नौ और फिर कुछ और।

सच में जिंदगी कितनी चीजों से भर गई है। इसे खाली कैसे किया जाए! 

नकारात्मकता से भरते जा रहे मन में ऐसी रोशनी कैसे बिखेरी जाये कि अंदर पूरा रोशन हो जाए। कितना तेज-तेज सब होता है।

9 सितंबर को राजभवन जाते वक्त कितनी ही बार ऐसा लगा कि बहुत हुआ। अब और नहीं। अब और नहीं। नहीं हो पाएगा। कैसे हो पाएगा। छूटे कैसे ये सब। कब। कब तक।

11 बजे राजभवन पहुंचने का समय तय था। दिमाग मंथर गति से चलता जा रहा था रात से ही। पहले यह कि सवेरे आठ बजे ऑफिस में पंच कर दिया जाए ताकि राजभवन के कार्यक्रम के बाद थोड़ी देर ऑफिस में समय बिताकर निकला जा सके। इसके बाद यह कि नौ बजे पहुंचा जाए और सीधा कोस्टल पकड़कर राजभवन पहुंच जाया जा सके। सबकुछ दिमाग में ही चलता रहा। इस बीच सवेरे खीरा और अमरूद काटकर लंच को कसा गया। सब छिटपुट काम निपटाते हुए आखिरकार नौ बजकर कुछ मिनट पर दरवाजे को ताला लगाकर तेज कदमों से स्टेशन तो पहुंच गया लेकिन होनी जो थी सो हो गई।

9:4 की लोकल का छूटना भारी पड़ गया। उसके बाद की लोकल ठाणे वाली थी और फिर उसके बाद की एसी। कुल मिलाकर जो लोकल मिली वह थी 9 25 वाली और वह 10 38 में सीएसटी पहुंचती थी। दिल ऐसे धड़क रहा था जैसे बीच में ही रूक जाए और फिर सबको धीरे-धीरे मालूम हो कि दिल के दौरे से एक अड़तीस साल के लड़के ने मुंबई लोकल में दम तोड़ दिया। दो-तीन लोग तो ट्विट कर ही देंगे। ट्रेन धीरे-धीरे लेट होती गई और आखिरकार 10 52 में सीएसटी जाकर लगी। उतरकर भागते हुए मै प्रेस क्लब गया जहां ड्राईवर खड़ा था उजली ग्लांजा के साथ और फिर वहां से शुरू हुआ तनाव का दूसरा दौर।

गिरगांव चौपाटी से आगे बढ़ते ही जाम में गाड़ी फंस गई। थोड़ी देर में बगल से एक काफिला गुजरा। यह काफिला मुख्यमंत्री से किसी बड़े जज का ही था। देखकर खून ठंढा होने लगा कि राजभवन में एंट्री मिलनी कहीं मुश्किल न हो जाए। पुराने डायरेक्टर के ट्रांसफर के अभी एक सप्ताह भी नहीं बीते थे ऐसे में जिस महिला को कार्यभार सौंपा गया था उससे पहले से मेरी अनबन थी और यह अनबन मेरी देरी की वजह से ही थी। सांस धीरे-धीरे अंदर बाहर करते हुए रक्तचाप को नियंत्रित रखते हुए मन को समझाना कठिन हो रहा था। उधर से बुआ का फोन आ रहा था कि जल्दी आजा नहीं तो एंट्री में दिक्कत होगी। 

कुल मिलाकर 1132 के करीब मैं राजभवन पहुंच गया। अंदर एंट्री में कोई दिक्कत नहीं आई क्योंकि मेरा नाम वहां पहले से लिस्ट में था। कुछ औपचारिकताओं के बाद मुझे छोड़ दिया गया। लेकिन जैसा कि होता आया है जबतक पूरी चीज न हो जाए हुआ को हुआ नहीं समझना चाहिए। राजभवन के जिस हॉल में कार्यक्रम होना था वहां के ठीक बाहर हड़बड़ी के कारण मैं सीढी से न जाकर सीधी ऊपर चढ गया। वहां एक पुलिस अधिकारी ने आईडी मांगी। दी तो बोला पास कहां है। फिर वह मेरी शैली को इतना इगो पर लिया हुआ था कि पास खड़ी एक महिला अधिकारी से कह दिया कि इसको अंदर नहीं जाने देना है। फिर उसने मुझे उसको फोन करने के लिए कहा जो अंदर पहले से है। बुआ को मैंने फोन किया। बुआ आया और तब जाकर मैं अंदर जा पाया। उसके बाद भी कहानी खत्म नहीं हुई। हुआ यह कि इस भागमभाग में मुझे शूशू लगी थी वह याद ही नहीं था। जब मैं उपर वाले फ्लोर जहां मीडिया बैठती वहां गया तो ध्यान आया कि जोर से शूशू लगी हुई है। ट्वाइलेट नीचे ही था। नीचे आया तो अब वह पुलिस वाला चिढ गया। वे सब एक साथ बोलने लगे कि तुमको कॉपरेट करके गुडविल में जाने दिया तो तुम फिर नीच क्यूं आए। मैंने ज्यादा मुंह नहीं लगाया और फिर वापस ऊपर चला गया। शपथ ग्रहण समारोह महज आधे घंटे के अंदर खत्म हो गया। मैं नीचे आया, शूशू किया और निकलने लगा। कहानी यहां भी खत्म नहीं हुई। जब मैं राजभवन से निकल रहा था तो उसी पुलिस अधिकारी पर नजर पड़ी और मैंने अपनी गाड़ी को धीरे करवाया और फिर पिछला शीशी खोलकर उनको थैंक्यू कहा। उन्होंने हाथ उठाकर हंसते हुए अभिवादन स्वीकार किया।

यूं तो कहानी यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी लेकिन हुई नहीं। हुआ यह कि खीरा और अमरूद से मेरा कुछ खास तो होने वाला था नहीं तो वहां आईएनएस के रिपोर्टर प्रशांत से बात में मालूम हुआ कि गरवारे क्लब में चंद्रकांत बावनकूले ने मीडिया वालों को बुलाया है। कुछ ब्रीफिंग है। इससे हमें कोई मतलब न था। मतलब की बात यह थी कि वहां खाना भी था। हम और बुआ ने मन बना लिया। ड्राइवर को गाड़ी गरवारे क्लब लेने के लिए कहा। वहां जाकर थोड़ी देर बैठे ही थे कि देखा हमारा एक कैमरामेन पहले से वहां है। अब यह मुंह छिपाने वाली बात हो गई। क्योंकि कान ही कान खबर उड़ती कि मैं वहां खाने के लिए गया हूं। छिपते-छिपाते हमलोग वहां खाकर निकल लिए और कैमरा मैन को भनक भी नहीं लगी। बुआ को उसके घर छोड़कर मैं आराम से गाड़ी में सोता हुआ ऑफिस आ गया।

पता नहीं ऐसी जिंदगी कब तक चलेगी।

Sunday, September 6, 2026

छोटी-मोटी बातें

                                                         विक्रांत और लेन-देन 

यह एक संयोग जैसा था लेकिन लगा जैसे कोई परीक्षा ली जा रही हो। मई में जब विक्रांत के यहाँ दांत दर्द से कराहते हुए गया था तो ईलाज उस दिन लंबा चल गया। जो मुझे लगा था कि एक-दो घंटे में वहाँ से फ़्री हो जाऊँगा वह वहाँ पाँच-छह घंटे लगे क्योंकि विस्डम टूथ को निकालना पड़ा और उसकी प्रक्रिया एक्स-रे और बाक़ी चीजों से होकर गुजरी। अंत में उसने बाईस हज़ार का बिल बनाया था जो मैंने तब क्रेडिट कार्ड से चुका दिया। हालाँकि उस पूरी रात और अगले कुछ दिनों तक मैं बहुत परेशान रहा कि इतने पैसे फ़ालतू में लग गये लेकिन राहूकाल में ऐसे कई अनुभव पहले भी मिले थे जब अकस्मात् कोई खर्च आ जाता या फिर हाथ में रखे पैसे यूँ ही कहीं खर्च हो जाते। क़र्ज़ चुकाने के प्रयास असफल होते जाते और क़र्ज़ नहीं लेने की प्रतिबद्धता भी मज़बूत नहीं हो पाती।

इस घटना के कुछ दिनों बाद जब विक्रांत घबराये हुए मेरे पास आकर उसे मिलने वाली धमकियों के बारे में मुझे बताया था जो कि उसकी गर्लफ्रैंड के किसी दूसरे ब्वायफ्रैंड से उसे मिल रही थी तो उस रोज़ मैं उसे पुलिस थाने ले गया था और वहाँ जाकर पूरा मामला सेटल करवाया। उसी दिन थाने से निकलते हुए विक्रांत से उस बाईस हज़ार के एक बड़ा हिस्सा मुझे वापस कर दिया था ऑनलाइन। मुझे लगा कि मेरी फ़ी मिल गई और रिग्रेट भी कम हो गया। मैं यह भी सोच रहा था कि क्या होता अगर मैं उस वक्त बारगेनिंग करता जब मैं उसे बाईस हज़ार रुपये दे रहा था। मैंने नहीं किया और कलेजे पर पत्थर धरे रहा। बाद में मुझे मेरे चुकाए रुपयों पर छूट भी मिली और मेरी छवि भी उसके सामने अच्छी बनी उस दिन कि मैंने कोई बारगेनिंग नहीं की।

इस बीच मुझे भाग्ये के लिए कुछ रुपयों की ज़रूरत थी। मैंने उसे कहा और उसने पच्चीस हज़ार रुपये भेज दिये। यह रुपये अभी भी मुझपे उसका क़र्ज़ है। 

कल देर रात जब मानसरोवर स्टेशन पर उतरा तो बात करने के लिए किसी को खोज रहा था। उसका ख़्याल आया और उसे फ़ोन कर दिया। बातचीत में पता चला कि वह कल्याण में है। वहीं उसका घर था। खारघर में उसने किराए पर अपना डेंटल क्लीनिक द अलाइनर डॉक्टर के नाम से शुरू किया हुआ था। फ़ोन रखने से पहले उसने यह भी बताया कि उसका जन्मदिन है आज। बात हो गई। मैं चलते हुए घर तक आ गया। दरवाज़ा खोला और थका हुआ सा निढाल हो गया। मन में कुछ बातें चलती जा रही थी। लग रहा था कि उसने बर्थडे बोला है तो ऐसे में उसे कुछ भेज देना चाहिए। यह भी लग रहा था कि मुझे कोई ऐसे कुछ बर्थडे पर भेजता तो कितना अच्छा लगता। उसको भी वैसा फ़ील करवाने के लिए मैंने देर रात क़रीब साढ़े ग्यारह बजे उसे ब्लिंकिट से आईसक्रीम, गोल वाली काजू बर्फ़ी और नमकीन भेजने का फ़ैसला किया। 

इनकम टैक्स रिटर्न भरते वक़्त उसने अपना आधार और पेन कार्ड भेजा था वाट्सएप पर, जो मेरे चैटबॉक्स में अब भी था। मैंने उसी से उसका कल्याण का पता निकाला और ब्लिंकिट कर दिया। क़रीब पौने बारह बजे उसका फ़ोन आया मुझे लगा कि वह उत्साहित होकर कुछ बोलेगा लेकिन उसने उधर से कहा कि ऑर्डर जो ब्लिंकिट से किए हो वह कैंसल कर दो क्योंकि मैं यहाँ दूसरी जगह आ गया हूँ। मैं घर पर नहीं हूँ। मन खिन्न हो गया। एक दो मैं वैसे ही ऑनलाइन ट्रांजेक्शन से दूर रहता हूँ और उसके लिए उसके च्वाईस की चीजें भेजी थी वह भी बेकार हुई। अब मामला था कि उस ऑर्डर को कैंसल कैसे किया जाए जो डेलिवरी के लिए निकल चुका है। मैंने ब्लिंकिट एप में टिप-टिप करना शुरू किया। इतने में बड़े भैया का फ़ोन आ गया। अब बड़ा धर्मसंकट हो गया। क्योंकि उनसे बात करते हुए ब्लिंकिट वाले का फ़ोन आ रहा था। इधर आज भैया की बेटी का भी जन्मदिन था। बात-बात में जब मैं उन्हें बता रहा था कि दूसरे फ़ोन पर ब्लिंकिट वाले का फ़ोन आ रहा है तो बोलते-बोलते ठहर गया। उन्हें ऐसा भी लग सकता था कि मैं अपने दोस्त के बर्थ-डे पर उसे ब्लिंकिट से कुछ भेज रहा हूँ लेकिन अपनी भतीजी को कुछ नहीं भेजा।


खैर, बहुत उहापोह के बीच ऑर्डर कैंसल हुआ और भरोसा दिया गया कि बीस रुपये कैंसलेशन का चार्ज काटकर बाक़ी रुपये रिफंड कर दिये जाएँगे। अचानक दिमाग़ में घुमा कि विक्रांत को दिया गया रुपया कुछ डिडक्ट होकर मुझे वापस मिल जाता है। पहली बार यह संयोग था जब दांत निकलवाने गया था लेकिन क्या इस बार भी यह संयोग ही है या फिर कुछ और है!


Saturday, August 29, 2026

फिर वही दूरियां


                                                 कामोठे-पूर्णिया के बीच के फ़ासले

 लोकमान्य तिलक टर्मिनस जाते हुए हर बार दोनों तरह की फीलिंग्स आती है - अच्छी भी और वैसी भी।

श्रीशैलम में तीन दिन और मुंबई में चार दिन बिताकर भाग्य और बच्चे वापस पूर्णिया के लिए निकल गये। यह सिलसिला २०२३ से लगातार चलता आ रहा है और पता नहीं कितने सालों तक ऐसा चलता रहेगा। कभी-कभी लगता है कि मैं किसी जेल में हूँ और मेरा परिवार कुछ दिनों के लिए आकर मेरी रिहाई करवाता है, अपने साथ हमें घुमाता है, बातचीत करता है, समय बिताता है और फिर मुझे इसी कारावास में छोड़कर चला जाता है।

गुंटूर में जब हमलोग मिले तो लगा जैसे कोई ठंडी हवा चली है। योजना जो बनी थी उसके मुताबिक़ भाग्य की ट्रेन चेरलापल्ली और मेरी ट्रेन सुबह हैदराबाद पहुँचने वाली थी, जिसके बाद मुझे हैदराबाद से चेरलापल्ली जाना था सबको लेने और फिर वहाँ से बस लेकर श्रीशैलम। योजना वैसे ही जटिल थी और असम की बाढ़ में और भी जटिल हो गई। हुआ यह कि सिलचर से किशनगंज होकर चलने वाली भाग्य की ट्रेन नौ घंटे देर से चलने की सूचना आई। जो ट्रेन किशनगंज में दोपहर के तीन बजे आने वाली थी वह बारह घंटा लेन यानि कि देर रात तीन बजे अब आने वाली थी। परिवार की सुरक्षा और सुविधा को देखते हुए मैंने किशनगंज में रिटायरिंग रूम बुक कर दिया और बच्चों की नींद पूरी हो गई। अब कहानी का अगला हिस्सा हैदराबाद में बदला। हुआ यह कि मेरी ट्रेन तो समय से बस दो घंटे देर से हैदराबाद पहुँच गई लेकिन चेरलापल्ली जाने का कोई मतलब नहीं रहा क्योंकि वह ट्रेन जो सुबह साढ़े चार बजे वहाँ आने वाली थी वह अब दोपहर के चार बजे आती। एक अलग टेंशन यह था कि श्रीशैलम के लिए आख़िरी बस पाँच बजे थी जो छूटनी तय हो गई थी, ट्रेन के देर होने की वजह से। 

परिस्थितियाँ ग्राउंड पर कई बार अचानक बदल जाती हैं और इसका मुझे ठीकठाक अनुभव दूरदर्शन में काम करते हुए हो गया था। मैंने कैलकुलेशन किया और तय किया कि भाग्य की गाड़ी का चेरलापल्ली तक इंतज़ार नहीं किया जाएगा और उसको गुंटूर में उतरने के लिए कह दिया। इधर मैंने हैदराबाद से रेपिडो करके सिकंदराबाद जाकर वहाँ से कर्मभूमि एक्सप्रेस लेकर गुंटूर पहुँचा। कुल मिलाकर हम दोनों वहाँ ढाई बजे पहुँचे, भागकर गुंटूर बस स्टैंड पहुँचे और वहाँ से श्रीशैलम की बस ले ली। योजना ज़बरदस्त सफल हुई और हमें रात में जंगल में रूकना नहीं पड़ा। वहाँ जाकर पहले से बुक हरिथा रिजार्ट में रूककर फिर अगले दिन से हमारा कार्यक्रम शुरू हुआ।

जैसा कि अक्सर होता है वहाँ से निकलने से पहले वाली रात यानि २४ अगस्त की रात हमारे बीच ज़बरदस्त वाली लड़ाई हुई। बच्चों के चीख-पुकार हुए। सबकुछ घातक हुआ और फिर अगले दिन क़रीब-करीब चीजें सामान्य हुईं। 

वहाँ से मुंबई आकर फिर पहले की यादें ताज़ा की गई। गमले में पेड़-पौधे लगाए गये। सबठीक सा रहा। पानी-पूरी, आलूचाट, ठेकुआ, नमकीन सब बने और फिर आख़िरकार ३० अगस्त की सुबह आ गई।

अगरतला एक्सप्रेस उसे पकड़ाकर मैं उसे वहीं छोड़कर ठाणे आ गया और मन की बात कार्यक्रम में लग गया। कभी-कभी बीत रही चीजों पर यक़ीन नहीं होता है। याद भी नहीं रहता कि मैं कब कहां रहा, किसके साथ रहा और वह दिन, समय, तारीख़ क्या थी।


Saturday, August 22, 2026

श्रीशैलम

                                                         पावर और पैसा

पावर बड़ा या पैसा। या फिर दोनों या फिर दोनों में कोई नहीं। समय बड़ा बलवान है, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है। लेकिन जब बात पावर और पैसे की आती है तो उसके मेरे अपने अलग-अलग अनुभव हैं।

इस बार श्रीशैलम में लगा कि पावर तो ठीक है लेकिन पैसे का होना भी बहुत ज़रूरी है। मुंबई ऑफिस से आरएनयू हैदराबाद को मेरे श्रीशैलम जाने की सूचना लिखित रूप में दी गई थी और आरएनयू हैदराबाद ने श्रीशैलम मंदिर प्रशासन को इसकी जानकारी दी थी। हमें समय से फ़ोन आने शुरू हुए और २३ अगस्त की शाम हम मंदिर परिसर पहुँच गये। हमारी तरह कुछ और लोग थे जो इस तरह दर्शन के लिए आये थे। स्पर्श दर्शन के लिए जो निर्धारित शुल्क था उस दिन हमने सुबह मंदिर प्रशासन के आदमी को फ़ोन पर दे दिया था, जब उसका फ़ोन आया था। दिन में हमने ख़रीदारी की और फिर शाम में समय से पहुँच गये। सबकुछ ठीक-सा ही लग रहा था सिवाय मेरी जेब के। जैसा कि अक्सर मेरे साथ होता है मेरे हाथ में ज़्यादा रुपये तो थे नहीं, यही इधर-उधर से जुटा-जुटाकर सौ-हजार थे जिनमें से दिन में मंदिर जाने के लिए ख़रीदे जाने वाले कपड़े में कुछ खर्च हो गये थे। एक सौ का और एक पचास का फटा सा नोट जेब में था, बाक़ी गूगल-पे के भरोसे यात्रा चली जा रही थी।

अंदर जाकर जब दर्शन हो गये। हमलोग बाहर आये तो जो साथ में लड़का था उसने ज़ोर देकर कहा कि हो गया सबकुछ। भाग्य ने नोटिस किया था कि हमारे साथ जो और थे उनमें से एक ने उसे पाँच सौ रुपये दिए थे। मैं अंदर से दहला हुआ था और बेइज़्ज़ती के लिए ख़ुद को तैयार कर रहा था। कुल डेढ़ सौ मैंने उसे दे तो दिए और वहाँ से निकल भी गया लेकिन ऐसा लगता रहा कि कहीं भीड़ में वापस न टकरा जाऊँ। मन अजीब सा परेशान था। थोड़ी दूर जाकर जब प्रसाद वाले लड्डू के लिए भाग्य और हम जाने के लिए रास्ता बदले तो जिसका डर था वही हुआ। वह लड़का वापस आया था और मेरे दिए डेढ़ सौ वापस देने लगा हंसते हुए। घोर शर्मिंदगी की बात तो थी मेरे लिए लेकिन मैं इतना ही कर पाने की स्थिति में था। आख़िर मैंने उसे मोबाईल से ढाई सौ और भेजे। वह पाँच सौ की अपेक्षा कर रहा था। लेकिन उतना भेज के और जो डेढ़ सौ वह मुझे दे रहा था वह भी उसके हाथ में छोड़ते हुए बहुत झिझक के साथ हमलोग आगे बढ़ गये। फिर प्रसाद के लिए लड्डू लेकर जब हमलोग लौटे तो पूरे रास्ते मन सशंकित रहा कि कहीं वह वापस न आ जाए। 

पिछले दिनों दार्जिलिंग में भी ऐसा ही हुआ था। जब केयरटेकर को मैं बस डेढ़ सौ रुपये दे पाया था। बाद में मैंने अपने मोबाईल के कैमरे में देखा तो नोटिस किया कि जब मैं वहाँ से निकल रहा था तो कार के पीछे कमरे में बरतन साफ़ करने वाली वह महिला हमारी कार को देख रही थी। वहाँ भी रहने का इंतज़ाम मैंने अपने कंटैक्ट से किया था।

पावर अपनी जगह है लेकिन रुपये का होना कितना ज़रूरी होता है वह ऐसे अनुभवों से पता चलता है। अगर मैं ऐसी जगहों पर आसपास के लोगों को पाँच सौ-हजार देते चलूँ तो शायद मुझे मेरे दफ़्तर की वजह से मिला पावर जस्टिफ़ाई हो जाएगा। 

कुल मिलाकर न रुपया बड़ा है न पावर, बड़ा है तो बस समय। मुझे याद है जगन्नाथ पुरी में जब माँ-पापाजी के साथ सबलों दर्शन कर के लौटे और जिन्होंने मदद की थी उनको जब मैंने पाँच सौ रुपये दिये थे तो उन्होंने बड़ी विनम्रतापूर्वक लौटाते हुए कहा था कि आपने कहा था कि माँ नहीं चल सकती थीं इसलिए हमने आपकी मदद की। मुझे लगा कि इन्होंने पाँच सौ रुपये को ऐसे नकार दिया, इधर दूसरी तरफ़ कहीं पाँच सौ न देने के लिए अपमान की स्थिति भी बन गई। कुल मिलाकर हर तरह के लोग हैं तो न पावर बड़ा है न पैसा, बड़ा है समय। समय कब किससे, कहां, किस रूप में मिलवा दे किसे पता!