Saturday, June 27, 2026

एक आपदा का टलना

 

कुछ समय पहले की बात है, कुछ साल शायद! डीएसएनजी में बैठकर मैं कहीं जा रहा है। स्वप्निल और दर्शन‌ के साथ मैं बैठा था। स्वप्निल गाड़ी चलाते-चलाते हंसा साईड मिरर में देखकर। फिर बोला सर देखा आपने पीछे। मैंने कुछ नहीं देखा था। फिर उसने कहा कि पीछे आ रही गाड़ी दो पलटी मारकर वापस चलने लगी। 

भैया के साथ‌ जो परसों हुआ वह वैसा ही था। जो हुआ वह चमत्कार ही था।

Saturday, June 20, 2026

पर‌ उपदेश बहुतेरे

 कोल्हापुर महालक्ष्मी दर्शन परंपरागत तरीके से

Tuesday, June 16, 2026

पापाजी की याद में

                                                   इनय्या के इक्कीस साल

ऐसा इतनी बार हो चुका था कि उनका एक्च्वल बर्थ-डे मुझे याद रहे न रहे यह जरूर याद रहता था कि जून महीने के किसी दिन ऐसा हुआ था। इनय्या वाली घटना हमसब के मस्तिष्क पर एक अटल छाप छोड़ा हुआ था। पापा जी ने इसे रि-बर्थ का नाम दिया था और मुझे भी यही लगता रहा कि उस दिन पिताजी शायद अंत हो जाते।

कल देर रात बात होने के बाद भैया का फिर आज सुबह सवेरे फोन आया तो लगा कुछ खास बात के लिए फोन होगा। पापाजी की शैली में उन्होंने याद दिलाया आज का दिन। मैंने सच में इस दिन को कभी फुर्सत में याद नहीं किया या फिर कभी फुर्सत ही इतनी नहीं मिली कि इस दिन को बहुत अच्छे से याद किया जाए। फिर, यह भी है कि याद करके किसके साथ बातें साझा की जाए। 










Sunday, June 14, 2026

छाता वाले सर

                        जिस स्कूल में मैंने लंबा समय बिताया 

गणित के सर के तौर पर उनकी पहचान होने के साथ साथ उनकी एक और पहचान थी छाता वाले सर। कॉलिजिएट स्कूल के बारे में आज सोचने पर कोई डरावना सा कुछ लगता है। ऐसा लगता है जैसे नालंदा यूनिवर्सिटी के खंडहर जैसा ही कुछ वहाँ भी हो गया होगा जहाँ उस वक्त के सब लोग ज़िंदा जल गए होंगे। कक्षा सात और आठ के उधर जो पतली जगह थी वास कक्षा छह की तरफ़ पीछे से जाती हुई कितनी डरावनी दिखती थी। ओह, सच में क्या मैंने वहाँ उस दौर में पहुँच रहा हूँ। नहीं…

वो विशम्भर सर के लिए कक्षा का सबसे प्रिय छात्र था चंदन। वही जयेश कुमार चंदन! वह उनकी आँखों का तारा था। गणित अच्छी थी उसकी और कोई भी हिसाब जब सर उसे देते तो वो बना देता था। यह एक तरह से ऐसा ही था जैसे सचदेव में हेमंत सर का सबसे प्यारा छात्र था चितरंजन।

खैर, कुछ दिन पहले जब कमोठे से मानसरोवर स्टेशन जा रहा था तो लगा जैसे धूप जला ही डालेगी। संयोग ये था कि दो-तीन दिन पहले ही बारिश हुई थी और मैंने साढ़े तीन सौ में छाता भी खरीदा था। छाता तब से बैग में ही पड़ा था। मैंने सोचा कि छाता निकाल हूँ धूप से बचने के लिये लेकिन फिर लगा कि लोग क्या कहेंगे जो देखेंगे! धूप से बचने के लिए छाता अक्सर सुंदर लड़कियां लगाती हैं। इतना सोच ही रहा था कि विश्वंभर सर की अचानक याद आई। क़रीब चौबीस साल हो गए उन्हें देखे। अब तो पता नहीं वह होंगे भी या नहीं और अगर होंगे तो किस हाल में होंगे! 

कलेजा मुंह को आ जाता है जब ऐसी कोई घटना याद आती है। शायद मैं बहुत दूर, बहुत अलग और बहुत अथाह में आ चुका हूँ।

Saturday, June 6, 2026

AIBE

 समानांतर दुनिया 


अंधेरे में जमीन टटोलती लाठी!