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Saturday, October 3, 2026
Saturday, September 19, 2026
Saturday, September 12, 2026
Sunday, September 6, 2026
छोटी-मोटी बातें
विक्रांत और लेन-देन
यह एक संयोग जैसा था लेकिन लगा जैसे कोई परीक्षा ली जा रही हो। मई में जब विक्रांत के यहाँ दांत दर्द से कराहते हुए गया था तो ईलाज उस दिन लंबा चल गया। जो मुझे लगा था कि एक-दो घंटे में वहाँ से फ़्री हो जाऊँगा वह वहाँ पाँच-छह घंटे लगे क्योंकि विस्डम टूथ को निकालना पड़ा और उसकी प्रक्रिया एक्स-रे और बाक़ी चीजों से होकर गुजरी। अंत में उसने बाईस हज़ार का बिल बनाया था जो मैंने तब क्रेडिट कार्ड से चुका दिया। हालाँकि उस पूरी रात और अगले कुछ दिनों तक मैं बहुत परेशान रहा कि इतने पैसे फ़ालतू में लग गये लेकिन राहूकाल में ऐसे कई अनुभव पहले भी मिले थे जब अकस्मात् कोई खर्च आ जाता या फिर हाथ में रखे पैसे यूँ ही कहीं खर्च हो जाते। क़र्ज़ चुकाने के प्रयास असफल होते जाते और क़र्ज़ नहीं लेने की प्रतिबद्धता भी मज़बूत नहीं हो पाती।
इस घटना के कुछ दिनों बाद जब विक्रांत घबराये हुए मेरे पास आकर उसे मिलने वाली धमकियों के बारे में मुझे बताया था जो कि उसकी गर्लफ्रैंड के किसी दूसरे ब्वायफ्रैंड से उसे मिल रही थी तो उस रोज़ मैं उसे पुलिस थाने ले गया था और वहाँ जाकर पूरा मामला सेटल करवाया। उसी दिन थाने से निकलते हुए विक्रांत से उस बाईस हज़ार के एक बड़ा हिस्सा मुझे वापस कर दिया था ऑनलाइन। मुझे लगा कि मेरी फ़ी मिल गई और रिग्रेट भी कम हो गया। मैं यह भी सोच रहा था कि क्या होता अगर मैं उस वक्त बारगेनिंग करता जब मैं उसे बाईस हज़ार रुपये दे रहा था। मैंने नहीं किया और कलेजे पर पत्थर धरे रहा। बाद में मुझे मेरे चुकाए रुपयों पर छूट भी मिली और मेरी छवि भी उसके सामने अच्छी बनी उस दिन कि मैंने कोई बारगेनिंग नहीं की।
इस बीच मुझे भाग्ये के लिए कुछ रुपयों की ज़रूरत थी। मैंने उसे कहा और उसने पच्चीस हज़ार रुपये भेज दिये। यह रुपये अभी भी मुझपे उसका क़र्ज़ है।
कल देर रात जब मानसरोवर स्टेशन पर उतरा तो बात करने के लिए किसी को खोज रहा था। उसका ख़्याल आया और उसे फ़ोन कर दिया। बातचीत में पता चला कि वह कल्याण में है। वहीं उसका घर था। खारघर में उसने किराए पर अपना डेंटल क्लीनिक द अलाइनर डॉक्टर के नाम से शुरू किया हुआ था। फ़ोन रखने से पहले उसने यह भी बताया कि उसका जन्मदिन है आज। बात हो गई। मैं चलते हुए घर तक आ गया। दरवाज़ा खोला और थका हुआ सा निढाल हो गया। मन में कुछ बातें चलती जा रही थी। लग रहा था कि उसने बर्थडे बोला है तो ऐसे में उसे कुछ भेज देना चाहिए। यह भी लग रहा था कि मुझे कोई ऐसे कुछ बर्थडे पर भेजता तो कितना अच्छा लगता। उसको भी वैसा फ़ील करवाने के लिए मैंने देर रात क़रीब साढ़े ग्यारह बजे उसे ब्लिंकिट से आईसक्रीम, गोल वाली काजू बर्फ़ी और नमकीन भेजने का फ़ैसला किया।
इनकम टैक्स रिटर्न भरते वक़्त उसने अपना आधार और पेन कार्ड भेजा था वाट्सएप पर, जो मेरे चैटबॉक्स में अब भी था। मैंने उसी से उसका कल्याण का पता निकाला और ब्लिंकिट कर दिया। क़रीब पौने बारह बजे उसका फ़ोन आया मुझे लगा कि वह उत्साहित होकर कुछ बोलेगा लेकिन उसने उधर से कहा कि ऑर्डर जो ब्लिंकिट से किए हो वह कैंसल कर दो क्योंकि मैं यहाँ दूसरी जगह आ गया हूँ। मैं घर पर नहीं हूँ। मन खिन्न हो गया। एक दो मैं वैसे ही ऑनलाइन ट्रांजेक्शन से दूर रहता हूँ और उसके लिए उसके च्वाईस की चीजें भेजी थी वह भी बेकार हुई। अब मामला था कि उस ऑर्डर को कैंसल कैसे किया जाए जो डेलिवरी के लिए निकल चुका है। मैंने ब्लिंकिट एप में टिप-टिप करना शुरू किया। इतने में बड़े भैया का फ़ोन आ गया। अब बड़ा धर्मसंकट हो गया। क्योंकि उनसे बात करते हुए ब्लिंकिट वाले का फ़ोन आ रहा था। इधर आज भैया की बेटी का भी जन्मदिन था। बात-बात में जब मैं उन्हें बता रहा था कि दूसरे फ़ोन पर ब्लिंकिट वाले का फ़ोन आ रहा है तो बोलते-बोलते ठहर गया। उन्हें ऐसा भी लग सकता था कि मैं अपने दोस्त के बर्थ-डे पर उसे ब्लिंकिट से कुछ भेज रहा हूँ लेकिन अपनी भतीजी को कुछ नहीं भेजा।
खैर, बहुत उहापोह के बीच ऑर्डर कैंसल हुआ और भरोसा दिया गया कि बीस रुपये कैंसलेशन का चार्ज काटकर बाक़ी रुपये रिफंड कर दिये जाएँगे। अचानक दिमाग़ में घुमा कि विक्रांत को दिया गया रुपया कुछ डिडक्ट होकर मुझे वापस मिल जाता है। पहली बार यह संयोग था जब दांत निकलवाने गया था लेकिन क्या इस बार भी यह संयोग ही है या फिर कुछ और है!
Saturday, August 29, 2026
फिर वही दूरियां
कामोठे-पूर्णिया के बीच के फ़ासले
लोकमान्य तिलक टर्मिनस जाते हुए हर बार दोनों तरह की फीलिंग्स आती है - अच्छी भी और वैसी भी।
श्रीशैलम में तीन दिन और मुंबई में चार दिन बिताकर भाग्य और बच्चे वापस पूर्णिया के लिए निकल गये। यह सिलसिला २०२३ से लगातार चलता आ रहा है और पता नहीं कितने सालों तक ऐसा चलता रहेगा। कभी-कभी लगता है कि मैं किसी जेल में हूँ और मेरा परिवार कुछ दिनों के लिए आकर मेरी रिहाई करवाता है, अपने साथ हमें घुमाता है, बातचीत करता है, समय बिताता है और फिर मुझे इसी कारावास में छोड़कर चला जाता है।
गुंटूर में जब हमलोग मिले तो लगा जैसे कोई ठंडी हवा चली है। योजना जो बनी थी उसके मुताबिक़ भाग्य की ट्रेन चेरलापल्ली और मेरी ट्रेन सुबह हैदराबाद पहुँचने वाली थी, जिसके बाद मुझे हैदराबाद से चेरलापल्ली जाना था सबको लेने और फिर वहाँ से बस लेकर श्रीशैलम। योजना वैसे ही जटिल थी और असम की बाढ़ में और भी जटिल हो गई। हुआ यह कि सिलचर से किशनगंज होकर चलने वाली भाग्य की ट्रेन नौ घंटे देर से चलने की सूचना आई। जो ट्रेन किशनगंज में दोपहर के तीन बजे आने वाली थी वह बारह घंटा लेन यानि कि देर रात तीन बजे अब आने वाली थी। परिवार की सुरक्षा और सुविधा को देखते हुए मैंने किशनगंज में रिटायरिंग रूम बुक कर दिया और बच्चों की नींद पूरी हो गई। अब कहानी का अगला हिस्सा हैदराबाद में बदला। हुआ यह कि मेरी ट्रेन तो समय से बस दो घंटे देर से हैदराबाद पहुँच गई लेकिन चेरलापल्ली जाने का कोई मतलब नहीं रहा क्योंकि वह ट्रेन जो सुबह साढ़े चार बजे वहाँ आने वाली थी वह अब दोपहर के चार बजे आती। एक अलग टेंशन यह था कि श्रीशैलम के लिए आख़िरी बस पाँच बजे थी जो छूटनी तय हो गई थी, ट्रेन के देर होने की वजह से।
परिस्थितियाँ ग्राउंड पर कई बार अचानक बदल जाती हैं और इसका मुझे ठीकठाक अनुभव दूरदर्शन में काम करते हुए हो गया था। मैंने कैलकुलेशन किया और तय किया कि भाग्य की गाड़ी का चेरलापल्ली तक इंतज़ार नहीं किया जाएगा और उसको गुंटूर में उतरने के लिए कह दिया। इधर मैंने हैदराबाद से रेपिडो करके सिकंदराबाद जाकर वहाँ से कर्मभूमि एक्सप्रेस लेकर गुंटूर पहुँचा। कुल मिलाकर हम दोनों वहाँ ढाई बजे पहुँचे, भागकर गुंटूर बस स्टैंड पहुँचे और वहाँ से श्रीशैलम की बस ले ली। योजना ज़बरदस्त सफल हुई और हमें रात में जंगल में रूकना नहीं पड़ा। वहाँ जाकर पहले से बुक हरिथा रिजार्ट में रूककर फिर अगले दिन से हमारा कार्यक्रम शुरू हुआ।
जैसा कि अक्सर होता है वहाँ से निकलने से पहले वाली रात यानि २४ अगस्त की रात हमारे बीच ज़बरदस्त वाली लड़ाई हुई। बच्चों के चीख-पुकार हुए। सबकुछ घातक हुआ और फिर अगले दिन क़रीब-करीब चीजें सामान्य हुईं।
वहाँ से मुंबई आकर फिर पहले की यादें ताज़ा की गई। गमले में पेड़-पौधे लगाए गये। सबठीक सा रहा। पानी-पूरी, आलूचाट, ठेकुआ, नमकीन सब बने और फिर आख़िरकार ३० अगस्त की सुबह आ गई।
अगरतला एक्सप्रेस उसे पकड़ाकर मैं उसे वहीं छोड़कर ठाणे आ गया और मन की बात कार्यक्रम में लग गया। कभी-कभी बीत रही चीजों पर यक़ीन नहीं होता है। याद भी नहीं रहता कि मैं कब कहां रहा, किसके साथ रहा और वह दिन, समय, तारीख़ क्या थी।
Thursday, August 20, 2026
ऐसी वैसी कैसी कैसी
श्रीशैलम यात्रा
पिछले दिनों जब लाडली ने कहा कि स्कूटी के री-रजिस्ट्रेशन में करीब साढे पांच हजार लगेंगे तो लगा जैसे किसी ने मेरे अंदर करंट दौड़ा दिया हो। सर फटने जैसा लगा, खून खौलता गया और समझ ही नहीं आया कि क्या कहा जाए। श्रीशैलम का एक बार प्लान जून में बना था जो नहीं हो पाया। दूसरी बार अगस्त में बना लेकिन हाथ खाली होता गया। 10-11 अगस्त तक चिंता की लकीरें दिमाग पर साफ थी कि पता नहीं कैसे हो पाएगा। हमलोग अलग-अलग जगह पर रह रहे हैं। खर्च भी उसी हिसाब से हो रहा है। कहीं जाने का मतलब बस टिकट का खर्चा नहीं होता है बल्कि कपड़े, खानपान, रहना और अन्य जरूरतें भी होती है। दार्जिलिंग का खर्चा बीस हजार से ज्याद पड़ गया था टिकट मिलाकर।
अच्छा हुआ कि गढचिरौली का टूर आ गया ऑफिस से और फिर उसके एडवांस में 15000 रुपये मिल गये। टिकट में वैसे ही करीब आठ हजार खर्च हो चुके थे ऐसे में यही कोई सात हजार थे जो हाथ में थे। वहां रहने खाने के दौरान एक-दो हजार खर्च होने के बाद बस वही पांच हजार थे जिसको लेकर श्रीशैलम की यात्रा होनी थी। यह जगह न सीधे किसी रेलवे स्टेशन से जुड़ा था और न ही आसानी से पहुंच वाला। पांच हजार में दिक्कतें होनी ही थी फिर भी लग रहा था कि हाथ बांधते हुए यात्रा हो जाएगी। ऐसी यात्रा का मुझे और भाग्य को अनुभव है।
ऐसे में लाडली का फोन आना और साढे पांच सौ का खर्च तुरंत बताना मन को बेध गया। अकेले कमरे में बहुत देर तक रोने और पागलों की तरह चिल्लाने के बाद कितनी बार मैंने अपने ही सर को धुना। मन में आ रहा था कि कोई आए और बताए कि ये सब कब तक चलेगा! क्या राहू मेरे अकाल मृत्यु की वजह बनेगा? क्या जो भी बिगड़ा है वह कभी ठीक नहीं हो पाएगा! भाग्य को फोन किया तो उसने जले पर नमक छिड़क दिया यह बोलकर कि आप ही न बोले थे लाडली को करने और लाडली को बोले थे छोटी दीदी को नहीं बताने। यह इस तरह था कि अब भुगतिए।
रोना-चिल्लाना जो था वो हुआ लेकिन रुपये तो देने ही थे तो मैंने दि दिए। उसके बाद श्रीशैलम को लेकर जो रहा-सहा उत्साह था वह भी खत्म हो गया। दिन और रात घुटन भरी हो गई और ऐसा लगा कि यह अंधेरा आजीवन रहेगा। पंडित जी पहले ही बता चुके हैं कि राहु का दशा बहुत प्रभावशाली है और शनि भी घोर विपरीत है। कुल मिलाकर जो दिन जैसे बीत रहा है उसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं। अकाउंटेंट साहब को लेकर मन में प्रतिशोध दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है और साथ में यह मलाल भी कि उनका कुछ ऐसा नहीं हो पा रहा जिसे देखकर मन संतोष हो। उनके पास इतने रुपये हैं कि हर तरह का पूजा पाठ करवाकर ग्रहों को शांत करवा सकते हैं वह।
खैर, परिस्थितियां अपना खेल दिखा रही थी। मैं पहले भी कई बार इस तरह की परिस्थितियों से गुजर चुका हूं जब चीजें एक के बाद एक बुरी और एकदम बुरी होती चली जाती है और जो नहीं करना है वह भी करने को आदमी बाध्य हो जाता है। उदाहरण के लिए मैं एकादशी में चावल नहीं खाता लेकिन अप्रैल में ऐसी परिस्थिति बनी कि उसक दिन मुझे मछली-भात खाने के लिए बाध्य होना पड़ा और वह भी यह जानते हुए कि उस दिन एकादशी था। ऐसा कई बार हुआ जब मुझे समझ में आया कि जो होना है वह होकर ही रहेगा। राहु इसी का नाम है। कर्ज राहु का प्रिय है और वह जिसपर सवार होता है उसे वह कर्ज से बाहर आने नहीं देता।
अगले ही दिन घर का रसोई गैस खत्म हो गया। जो पांच हजार मैंने बचाए थे उसके खत्म हो जाने के बाद अब जो गैस का खर्च था वह कर्ज ही होना था। मैं इतना प्रताड़ित हो चुका था कि कई बार मन करता था कि रेलवे ट्रैक पर लेटकर अपने शरीर को दो टुकड़ों में कट जाने दूं। कुछ घंटों का असहनीय दर्द होगा लेकिन फिर इतने सालों से चला आ रहा और पता नहीं कितने सालों तक चलने वाला दर्द कम से कम जड़ से खत्म हो जाएगा। यह अलग बात है कि ऐसा करने की हिम्मत जुट ही नहीं पा रही। गैस खत्म होने के बाद मकानमालिक की बेटी ने गैस ऑर्डर किया और फिर मुझे उसे 941.50 भेजने पड़े। यह रुपये मेरे दूसरे बैंक में थे जिसे मैं आपात स्थिति के लिए बचाकर रखता हूं। मैं एकदम दरिद्र हो गया। आंध्रप्रदेश में मंदिर जा रहा हूं, ऐसा सोचकर ही चिढने लगा।
19 अगस्त को एक मेल आया कि साढे तीन हजार रुपये मुझे दूरदर्शन से आए हैं। यह एकदम ही चौकने वाली बात थी क्योंकि पिछले महीने की आखिरी तारीख को जो दौरा मैंने किया था यह उसके पैसे थे जो इतनी जल्दी कभी नहीं आते। हमारे पैसे अकाउंट से क्लियर होने में चार-पांच महीने कम से कम लगते ही हैं। मैंने चौंकते हुए अकाउंट स्टाफ सुजाली जी को फोन किया तो उन्होंने कहा कि क्लियर जल्दी कर दिया उन्होंने। कुछ महीने पहले मैंने अकाउंट सेक्शन की शिकायत की थी शायद यह उसी का परिणाम था। जो भी हो, जान में जान आई कि चलो कुछ तो हाथ में आया। उधर रुपये आए और इधर फिर भाग्य का मैसेज आया कि 15646 जो किशनगंज से दोपहर करीब तीन बजे निकलने वाली थी वह अब नौ घंटे देर से चलेगी। इसके कई मतलब थे। सबसे पहला यह कि भाग्य को किशनगंज के लिए अब पूर्णिया से दूसरी बस लेनी होगी, दूसरा कि भाग्य और बच्चों को रात के दो-तीन बजे एक ऐसे स्टेशन से ट्रेन लेनी होगी जहां उनके साथ कोई नहीं होगा और तीसरा हैदराबाद पहुंचकर वहां से श्रीशैलम की बस उस रोज मिलेगी या नहीं इसकी गारंटी नहीं क्योंकि वहां से आखिरी बास शाम पांच बजे तक ही चलती है। उसके बाद जो बसें चलती है उसके जंगली सीमा पर रोक दिया जाता है और बाकी का सफर वह अगले दिन पूरा करती है। श्रीशैलम में होटल पहले से बुक था जिसका रुपया पानी में जाने की आशंका भी बन गई। कुल मिलाकर सबकुछ उथल-पुथल हो गया। भाग्य से बातचीत के क्रम में भी कड़वाहट भरती गई। मन बैठा-बैठा सा हो गया लेकिन राहू के प्रभाव का काट के लिए मैं पूजा भी तो नहीं करवा पाया था।
भाग्य जब 20 अगस्त यानि कि आज पूर्णिया से निकली तो बस स्टैंड पर बच्चों के साथ वीडिया कॉल पर बात हुई। बच्चे उत्साहित थे लेकिन थके हुए भी लग रहे थे। मैं यह सोचकर ही परेशान हो गया कि ये करीब छह-सात बजे किशनगंज पहुंच तो जाएंगे लेकिन इनको वहां से ट्रेन रात को दो-तीन बजे पकड़नी होगी। गहरी नींद में भाग्य कैसे बच्चों को लेकर ट्रेन में चढेगी और उस वक्त ट्रेन के अंदर का क्या दृश्य होगा। किशनगंज स्टेशन पर रिटायरिंग रूम बुक करने का आइडिया अचानक सूझा। बिहार के स्टेशनों पर और खासकर जब ट्रेन विकली हो और एक ओर से दूसरे छोर तक जा रही हो, अंतिम समय में रिटायरिंग रूम बुक होने की संभावना बिल्कुल नहीं थी। मुझे तो लगा था कि स्टेशन पर शायद रिटायरिंग रूम होगा भी नहीं। प्रभादेवी बस स्टैंड से दूरदर्शन आने तक रास्ते में प्रयास किया लेकिन आईआरसीटीसी के मोबाईल एप में कुछ प्रॉब्लम आ रहा था। ऑफिस आते ही करीब सवा तीन बजे बार-बार कोशिश किया तो वेबसाईट से लॉगिन हो गया और डिलक्स रूम भी उपलब्ध था। कुल 1022 रुपये लगे लेकिन एक अच्छा एसी कमरा बुक हो गया। मन को थोड़ी तसल्ली मिली की पति और पिता होने का फर्ज गरीबी में भी निभ गया वरना बच्चे और भाग्य पता नहीं वेटिंग हॉल में कैसे रहते जहां न सामान की सुरक्षो होती न निजता रह पाती और न ही सोने की पर्याप्त सुविधानजनक जगह होती। लेकिन खुशी थोड़ी ही देर में हवा होने लगी जब रुपये की बात दिमाग में घूमी। दूरदर्शन से आए रुपयों से मैंने भुगतान तो कर दिया था लेकिन पास में कैश के नाम पर वही दो-ढाई हजार पड़े थे।
भाग्य ने वहां रिटायरिंग पहुंचकर वहां से वीडियो कॉल किया तो लगा कि अच्छा हो गया। इधर थोड़ी देर बाद ही अटल पेंशन योजना का मासिक किस्त कट गया खाते से। कुल मिलाकर ऐसा लग रहा था कि कोई बचा रहा है और कोई मार रहा है। जो हो, एक बात बहुत पहले प्रदीप रावत ने कही थी कि बचाने वाला मारने वाला से हमेशा बड़ा होता है। बचा तो वही रहा होगा जिसके आगे रोज मैं दीया जलाता हूं।
Sunday, August 16, 2026
गढ़चिरौली
Sunday, August 9, 2026
Sunday, August 2, 2026
Saturday, July 25, 2026
Sunday, July 12, 2026
Saturday, July 4, 2026
Saturday, June 27, 2026
एक आपदा का टलना
कुछ समय पहले की बात है, कुछ साल शायद! डीएसएनजी में बैठकर मैं कहीं जा रहा है। स्वप्निल और दर्शन के साथ मैं बैठा था। स्वप्निल गाड़ी चलाते-चलाते हंसा साईड मिरर में देखकर। फिर बोला सर देखा आपने पीछे। मैंने कुछ नहीं देखा था। फिर उसने कहा कि पीछे आ रही गाड़ी दो पलटी मारकर वापस चलने लगी।
भैया के साथ जो परसों हुआ वह वैसा ही था। जो हुआ वह चमत्कार ही था।
Saturday, June 20, 2026
Sunday, June 14, 2026
छाता वाले सर
जिस स्कूल में मैंने लंबा समय बिताया
गणित के सर के तौर पर उनकी पहचान होने के साथ साथ उनकी एक और पहचान थी छाता वाले सर। कॉलिजिएट स्कूल के बारे में आज सोचने पर कोई डरावना सा कुछ लगता है। ऐसा लगता है जैसे नालंदा यूनिवर्सिटी के खंडहर जैसा ही कुछ वहाँ भी हो गया होगा जहाँ उस वक्त के सब लोग ज़िंदा जल गए होंगे। कक्षा सात और आठ के उधर जो पतली जगह थी वास कक्षा छह की तरफ़ पीछे से जाती हुई कितनी डरावनी दिखती थी। ओह, सच में क्या मैंने वहाँ उस दौर में पहुँच रहा हूँ। नहीं…
वो विशम्भर सर के लिए कक्षा का सबसे प्रिय छात्र था चंदन। वही जयेश कुमार चंदन! वह उनकी आँखों का तारा था। गणित अच्छी थी उसकी और कोई भी हिसाब जब सर उसे देते तो वो बना देता था। यह एक तरह से ऐसा ही था जैसे सचदेव में हेमंत सर का सबसे प्यारा छात्र था चितरंजन।
खैर, कुछ दिन पहले जब कमोठे से मानसरोवर स्टेशन जा रहा था तो लगा जैसे धूप जला ही डालेगी। संयोग ये था कि दो-तीन दिन पहले ही बारिश हुई थी और मैंने साढ़े तीन सौ में छाता भी खरीदा था। छाता तब से बैग में ही पड़ा था। मैंने सोचा कि छाता निकाल हूँ धूप से बचने के लिये लेकिन फिर लगा कि लोग क्या कहेंगे जो देखेंगे! धूप से बचने के लिए छाता अक्सर सुंदर लड़कियां लगाती हैं। इतना सोच ही रहा था कि विश्वंभर सर की अचानक याद आई। क़रीब चौबीस साल हो गए उन्हें देखे। अब तो पता नहीं वह होंगे भी या नहीं और अगर होंगे तो किस हाल में होंगे!
कलेजा मुंह को आ जाता है जब ऐसी कोई घटना याद आती है। शायद मैं बहुत दूर, बहुत अलग और बहुत अथाह में आ चुका हूँ।
Saturday, June 6, 2026
Sunday, May 31, 2026
वो दौर
विक्रांत तुम उस दिन कह रहे थे न कि तुम्हें तब लगा कि तुम सही जगह आए हो जब तुमने मुझे अपनी कही बातों को मुझे सादे कागज पर लिखते देखा।
बात २००९ की होगी शायद। देर रात मैं विश्वनाथ बाबू के यहां गया था। उन्होंने मुझसे उस बदमाश के बारे में पूछा तो मैं बता नहीं पाया। फिर उन्होंने कहा था कि कैसा दिखता है। वह कागज पर उसका स्कैच बनवा रहे थे। तब मुझे भी लगा था कि मैं सही जगह आया।