योगिनी एकादशी
जैसे बुरा वक्त का एहसास हो जाता है वैसे ही अच्चे वक्त का भी एहसास हो जाता है। न्यूजरूम का दरवाजा अगर खुला हो तो पूरा कॉरीडोर वहां से साफ दिखाई देता है।
नीचे भाग्य से फोन पर बात करने के बाद जब वापस उपर आया तो पीछे सा आवाज आई। भारती ने आवाज दी थी। गया तो वहां सर भी थे। सर ने कहा कि दिल्ली को योगिनी एकादशी पर स्टोरी चाहिए। सर जिस तरीके से कह रहे थे उससे यही लगा कि वह यह मानकर चल रहे थे कि मैं चौंक जाऊंगा और पूछूंगा का यह एकादशी क्या होता है। लेकिन वैसा हुआ नहीं। जैसे ही उन्होंने योगिनी एकादशी कहा मैंने कहा वो तो कल है न! इसके बाद वह चकित से रह गये और वहां जितने लोग न्यूजरूम में थे सबने देखा कि किस तरह उन्होंने शाबाशी वाले लहजे में कहा कि तुमको पक्का पता होगा यह मुझे मालूम था। यह एहसास सुखद था।
इसके समानांतर दूसरी घटना हो रही थी कामोठे में। जब मैने पिछले दिनों तीनों कैलेंडर बदले तो मैं एकादशी की तारीख देख रहा था। यूं तो मैं एकादशी नहीं करता हूं लेकिन इस कोशिश में रहता हूं कि कम से कम उस दिन चावल नहीं खाऊं। यह मां-पापाजी की एक परंपरा है जिसे आगे चलाते रहने में कोई दिक्कत नहीं है। इसी क्रम में आज सुबह भात बनाते हुए मैंने देखा कि एकादशी कल है। मैंने गौर से देखा तो वहां लिखा था योगिनी एकादशी।
यह एक संयोग ही था कि सुबह का देखा हुआ कैलेंडर ऑफिस में इतनी इज्जत दिलवा दिया। कैलेंडर यही कोई अस्सी या सौ रुपये में मैंने लिया होगा आज वह पैसा एक तरह से वसूल हो गया।
No comments:
Post a Comment