Saturday, August 22, 2026

श्रीशैलम

                                                         पावर और पैसा

पावर बड़ा या पैसा। या फिर दोनों या फिर दोनों में कोई नहीं। समय बड़ा बलवान है, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है। लेकिन जब बात पावर और पैसे की आती है तो उसके मेरे अपने अलग-अलग अनुभव हैं।

इस बार श्रीशैलम में लगा कि पावर तो ठीक है लेकिन पैसे का होना भी बहुत ज़रूरी है। मुंबई ऑफिस से आरएनयू हैदराबाद को मेरे श्रीशैलम जाने की सूचना लिखित रूप में दी गई थी और आरएनयू हैदराबाद ने श्रीशैलम मंदिर प्रशासन को इसकी जानकारी दी थी। हमें समय से फ़ोन आने शुरू हुए और २३ अगस्त की शाम हम मंदिर परिसर पहुँच गये। हमारी तरह कुछ और लोग थे जो इस तरह दर्शन के लिए आये थे। स्पर्श दर्शन के लिए जो निर्धारित शुल्क था उस दिन हमने सुबह मंदिर प्रशासन के आदमी को फ़ोन पर दे दिया था, जब उसका फ़ोन आया था। दिन में हमने ख़रीदारी की और फिर शाम में समय से पहुँच गये। सबकुछ ठीक-सा ही लग रहा था सिवाय मेरी जेब के। जैसा कि अक्सर मेरे साथ होता है मेरे हाथ में ज़्यादा रुपये तो थे नहीं, यही इधर-उधर से जुटा-जुटाकर सौ-हजार थे जिनमें से दिन में मंदिर जाने के लिए ख़रीदे जाने वाले कपड़े में कुछ खर्च हो गये थे। एक सौ का और एक पचास का फटा सा नोट जेब में था, बाक़ी गूगल-पे के भरोसे यात्रा चली जा रही थी।

अंदर जाकर जब दर्शन हो गये। हमलोग बाहर आये तो जो साथ में लड़का था उसने ज़ोर देकर कहा कि हो गया सबकुछ। भाग्य ने नोटिस किया था कि हमारे साथ जो और थे उनमें से एक ने उसे पाँच सौ रुपये दिए थे। मैं अंदर से दहला हुआ था और बेइज़्ज़ती के लिए ख़ुद को तैयार कर रहा था। कुल डेढ़ सौ मैंने उसे दे तो दिए और वहाँ से निकल भी गया लेकिन ऐसा लगता रहा कि कहीं भीड़ में वापस न टकरा जाऊँ। मन अजीब सा परेशान था। थोड़ी दूर जाकर जब प्रसाद वाले लड्डू के लिए भाग्य और हम जाने के लिए रास्ता बदले तो जिसका डर था वही हुआ। वह लड़का वापस आया था और मेरे दिए डेढ़ सौ वापस देने लगा हंसते हुए। घोर शर्मिंदगी की बात तो थी मेरे लिए लेकिन मैं इतना ही कर पाने की स्थिति में था। आख़िर मैंने उसे मोबाईल से ढाई सौ और भेजे। वह पाँच सौ की अपेक्षा कर रहा था। लेकिन उतना भेज के और जो डेढ़ सौ वह मुझे दे रहा था वह भी उसके हाथ में छोड़ते हुए बहुत झिझक के साथ हमलोग आगे बढ़ गये। फिर प्रसाद के लिए लड्डू लेकर जब हमलोग लौटे तो पूरे रास्ते मन सशंकित रहा कि कहीं वह वापस न आ जाए। 

पिछले दिनों दार्जिलिंग में भी ऐसा ही हुआ था। जब केयरटेकर को मैं बस डेढ़ सौ रुपये दे पाया था। बाद में मैंने अपने मोबाईल के कैमरे में देखा तो नोटिस किया कि जब मैं वहाँ से निकल रहा था तो कार के पीछे कमरे में बरतन साफ़ करने वाली वह महिला हमारी कार को देख रही थी। वहाँ भी रहने का इंतज़ाम मैंने अपने कंटैक्ट से किया था।

पावर अपनी जगह है लेकिन रुपये का होना कितना ज़रूरी होता है वह ऐसे अनुभवों से पता चलता है। अगर मैं ऐसी जगहों पर आसपास के लोगों को पाँच सौ-हजार देते चलूँ तो शायद मुझे मेरे दफ़्तर की वजह से मिला पावर जस्टिफ़ाई हो जाएगा। 

कुल मिलाकर न रुपया बड़ा है न पावर, बड़ा है तो बस समय। मुझे याद है जगन्नाथ पुरी में जब माँ-पापाजी के साथ सबलों दर्शन कर के लौटे और जिन्होंने मदद की थी उनको जब मैंने पाँच सौ रुपये दिये थे तो उन्होंने बड़ी विनम्रतापूर्वक लौटाते हुए कहा था कि आपने कहा था कि माँ नहीं चल सकती थीं इसलिए हमने आपकी मदद की। मुझे लगा कि इन्होंने पाँच सौ रुपये को ऐसे नकार दिया, इधर दूसरी तरफ़ कहीं पाँच सौ न देने के लिए अपमान की स्थिति भी बन गई। कुल मिलाकर हर तरह के लोग हैं तो न पावर बड़ा है न पैसा, बड़ा है समय। समय कब किससे, कहां, किस रूप में मिलवा दे किसे पता!

Thursday, August 20, 2026

ऐसी वैसी कैसी कैसी

 

                                                            श्रीशैलम यात्रा 

पिछले दिनों जब लाडली ने कहा कि स्कूटी के री-रजिस्ट्रेशन में करीब साढे पांच हजार लगेंगे तो लगा जैसे किसी ने मेरे अंदर करंट दौड़ा दिया हो। सर फटने जैसा लगा, खून खौलता गया और समझ ही नहीं आया कि क्या कहा जाए। श्रीशैलम का एक बार प्लान जून में बना था जो नहीं हो पाया। दूसरी बार अगस्त में बना लेकिन हाथ खाली होता गया। 10-11 अगस्त तक चिंता की लकीरें दिमाग पर साफ थी कि पता नहीं कैसे हो पाएगा। हमलोग अलग-अलग जगह पर रह रहे हैं। खर्च भी उसी हिसाब से हो रहा है। कहीं जाने का मतलब बस टिकट का खर्चा नहीं होता है बल्कि कपड़े, खानपान, रहना और अन्य जरूरतें भी होती है। दार्जिलिंग का खर्चा बीस हजार से ज्याद पड़ गया था टिकट मिलाकर। 

अच्छा हुआ कि गढचिरौली का टूर आ गया ऑफिस से और फिर उसके एडवांस में 15000 रुपये मिल गये। टिकट में वैसे ही करीब आठ हजार खर्च हो चुके थे ऐसे में यही कोई सात हजार थे जो हाथ में थे। वहां रहने खाने के दौरान एक-दो हजार खर्च होने के बाद बस वही पांच हजार थे जिसको लेकर श्रीशैलम की यात्रा होनी थी। यह जगह न सीधे किसी रेलवे स्टेशन से जुड़ा था और न ही आसानी से पहुंच वाला। पांच हजार में दिक्कतें होनी ही थी फिर भी लग रहा था कि हाथ बांधते हुए यात्रा हो जाएगी। ऐसी यात्रा का मुझे और भाग्य को अनुभव है। 

ऐसे में लाडली का फोन आना और साढे पांच सौ का खर्च तुरंत बताना मन को बेध गया। अकेले कमरे में बहुत देर तक रोने और पागलों की तरह चिल्लाने के बाद कितनी बार मैंने अपने ही सर को धुना। मन में आ रहा था कि कोई आए और बताए कि ये सब कब तक चलेगा! क्या राहू मेरे अकाल मृत्यु की वजह बनेगा? क्या जो भी बिगड़ा है वह कभी ठीक नहीं हो पाएगा! भाग्य को फोन किया तो उसने जले पर नमक छिड़क दिया यह बोलकर कि आप ही न बोले थे लाडली को करने और लाडली को बोले थे छोटी दीदी को नहीं बताने। यह इस तरह था कि अब भुगतिए।

रोना-चिल्लाना जो था वो हुआ लेकिन रुपये तो देने ही थे तो मैंने दि दिए। उसके बाद श्रीशैलम को लेकर जो रहा-सहा उत्साह था वह भी खत्म हो गया। दिन और रात घुटन भरी हो गई और ऐसा लगा कि यह अंधेरा आजीवन रहेगा। पंडित जी पहले ही बता चुके हैं कि राहु का दशा बहुत प्रभावशाली है और शनि भी घोर विपरीत है। कुल मिलाकर जो दिन जैसे बीत रहा है उसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं। अकाउंटेंट साहब को लेकर मन में प्रतिशोध दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है और साथ में यह मलाल भी कि उनका कुछ ऐसा नहीं हो पा रहा जिसे देखकर मन संतोष हो। उनके पास इतने रुपये हैं कि हर तरह का पूजा पाठ करवाकर ग्रहों को शांत करवा सकते हैं वह।

खैर, परिस्थितियां अपना खेल दिखा रही थी। मैं पहले भी कई बार इस तरह की परिस्थितियों से गुजर चुका हूं जब चीजें एक के बाद एक बुरी और एकदम बुरी होती चली जाती है और जो नहीं करना है वह भी करने को आदमी बाध्य हो जाता है। उदाहरण के लिए मैं एकादशी में चावल नहीं खाता लेकिन अप्रैल में ऐसी परिस्थिति बनी कि उसक दिन मुझे मछली-भात खाने के लिए बाध्य होना पड़ा और वह भी यह जानते हुए कि उस दिन एकादशी था। ऐसा कई बार हुआ जब मुझे समझ में आया कि जो होना है वह होकर ही रहेगा। राहु इसी का नाम है। कर्ज राहु का प्रिय है और वह जिसपर सवार होता है उसे वह कर्ज से बाहर आने नहीं देता। 

अगले ही दिन घर का रसोई गैस खत्म हो गया। जो पांच हजार मैंने बचाए थे उसके खत्म हो जाने के बाद अब जो गैस का खर्च था वह कर्ज ही होना था। मैं इतना प्रताड़ित हो चुका था कि कई बार मन करता था कि रेलवे ट्रैक पर लेटकर अपने शरीर को दो टुकड़ों में कट जाने दूं। कुछ घंटों का असहनीय दर्द होगा लेकिन फिर इतने सालों से चला आ रहा और पता नहीं कितने सालों तक चलने वाला दर्द कम से कम जड़ से खत्म हो जाएगा। यह अलग बात है कि ऐसा करने की हिम्मत जुट ही नहीं पा रही। गैस खत्म होने के बाद मकानमालिक की बेटी ने गैस ऑर्डर किया और फिर मुझे उसे 941.50 भेजने पड़े। यह रुपये मेरे दूसरे बैंक में थे जिसे मैं आपात स्थिति के लिए बचाकर रखता हूं। मैं एकदम दरिद्र हो गया। आंध्रप्रदेश में मंदिर जा रहा हूं, ऐसा सोचकर ही चिढने लगा।

19 अगस्त को एक मेल आया कि साढे तीन हजार रुपये मुझे दूरदर्शन से आए हैं। यह एकदम ही चौकने वाली बात थी क्योंकि पिछले महीने की आखिरी तारीख को जो दौरा मैंने किया था यह उसके पैसे थे जो इतनी जल्दी कभी नहीं आते। हमारे पैसे अकाउंट से क्लियर होने में चार-पांच महीने कम से कम लगते ही हैं। मैंने चौंकते हुए अकाउंट स्टाफ सुजाली जी को फोन किया तो उन्होंने कहा कि क्लियर जल्दी कर दिया उन्होंने। कुछ महीने पहले मैंने अकाउंट सेक्शन की शिकायत की थी शायद यह उसी का परिणाम था। जो भी हो, जान में जान आई कि चलो कुछ तो हाथ में आया। उधर रुपये आए और इधर फिर भाग्य का मैसेज आया कि 15646 जो किशनगंज से दोपहर करीब तीन बजे निकलने वाली थी वह अब नौ घंटे देर से चलेगी। इसके कई मतलब थे। सबसे पहला यह कि भाग्य को किशनगंज के लिए अब पूर्णिया से दूसरी बस लेनी होगी, दूसरा कि भाग्य और बच्चों को रात के दो-तीन बजे एक ऐसे स्टेशन से ट्रेन लेनी होगी जहां उनके साथ कोई नहीं होगा और तीसरा हैदराबाद पहुंचकर वहां से श्रीशैलम की बस उस रोज मिलेगी या नहीं इसकी गारंटी नहीं क्योंकि वहां से आखिरी बास शाम पांच बजे तक ही चलती है। उसके बाद जो बसें चलती है उसके जंगली सीमा पर रोक दिया जाता है और बाकी का सफर वह अगले दिन पूरा करती है। श्रीशैलम में होटल पहले से बुक था जिसका रुपया पानी में जाने की आशंका भी बन गई। कुल मिलाकर सबकुछ उथल-पुथल हो गया। भाग्य से बातचीत के क्रम में भी कड़वाहट भरती गई। मन बैठा-बैठा सा हो गया लेकिन राहू के प्रभाव का काट के लिए मैं पूजा भी तो नहीं करवा पाया था।

भाग्य जब 20 अगस्त यानि कि आज पूर्णिया से निकली तो बस स्टैंड पर बच्चों के साथ वीडिया कॉल पर बात हुई। बच्चे उत्साहित थे लेकिन थके हुए भी लग रहे थे। मैं यह सोचकर ही परेशान हो गया कि ये करीब छह-सात बजे किशनगंज पहुंच तो जाएंगे लेकिन इनको वहां से ट्रेन रात को दो-तीन बजे पकड़नी होगी। गहरी नींद में भाग्य कैसे बच्चों को लेकर ट्रेन में चढेगी और उस वक्त ट्रेन के अंदर का क्या दृश्य होगा। किशनगंज स्टेशन पर रिटायरिंग रूम बुक करने का आइडिया अचानक सूझा। बिहार के स्टेशनों पर और खासकर जब ट्रेन विकली हो और एक ओर से दूसरे छोर तक जा रही हो, अंतिम समय में रिटायरिंग रूम बुक होने की संभावना बिल्कुल नहीं थी। मुझे तो लगा था कि स्टेशन पर शायद रिटायरिंग रूम होगा भी नहीं। प्रभादेवी बस स्टैंड से दूरदर्शन आने तक रास्ते में प्रयास किया लेकिन आईआरसीटीसी के मोबाईल एप में कुछ प्रॉब्लम आ रहा था। ऑफिस आते ही करीब सवा तीन बजे बार-बार कोशिश किया तो वेबसाईट से लॉगिन हो गया और डिलक्स रूम भी उपलब्ध था। कुल 1022 रुपये लगे लेकिन एक अच्छा एसी कमरा बुक हो गया। मन को थोड़ी तसल्ली मिली की पति और पिता होने का फर्ज गरीबी में भी निभ गया वरना बच्चे और भाग्य पता नहीं वेटिंग हॉल में कैसे रहते जहां न सामान की सुरक्षो होती न निजता रह पाती और न ही सोने की पर्याप्त सुविधानजनक जगह होती। लेकिन खुशी थोड़ी ही देर में हवा होने लगी जब रुपये की बात दिमाग में घूमी। दूरदर्शन से आए रुपयों से मैंने भुगतान तो कर दिया था लेकिन पास में कैश के नाम पर वही दो-ढाई हजार पड़े थे।

भाग्य ने वहां रिटायरिंग पहुंचकर वहां से वीडियो कॉल किया तो लगा कि अच्छा हो गया। इधर थोड़ी देर बाद ही अटल पेंशन योजना का मासिक किस्त कट गया खाते से। कुल मिलाकर ऐसा लग रहा था कि कोई बचा रहा है और कोई मार रहा है। जो हो, एक बात बहुत पहले प्रदीप रावत ने कही थी कि बचाने वाला मारने वाला से हमेशा बड़ा होता है। बचा तो वही रहा होगा जिसके आगे रोज मैं दीया जलाता हूं। 

Sunday, August 16, 2026

गढ़चिरौली

                                                 एक सपने का पूरा होना

महाराष्ट्र में क़रीब-करीब सभी ज़िलों में जाना हो चुका था। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पूरे महाराष्ट्र के भ्रमण तो हो ही गया था और बाक़ी अलग-अलग मंत्रियों, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या अन्य सरकारी कार्यक्रमों के बहाने बहुत सारी जगहों पर जाना हो चुका था। हालाँकि एक ऐसी जगह थी जहां जाने को लेकर मन में हमेशा एक तरह की बेचैनी रहती थी लेकिन संयोग बनना बहुत मुश्किल था और वह जगह था गढ़चिरौली।

ऐसा नहीं था कि मैं कभी गढ़चिरौली गया नहीं था। दरअसल गढ़चिरौली के अंदर उन जगहों पर मेरे जाने की इच्छा थी जहां नक्सली हमले होते थे या फिर जो संवेदनशील जगह थी। एक बार राष्ट्रपति जब गढ़चिरौली के एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत में आए थे तो मैं उसमें गया था लेकिन वह विशुद्ध सरकारी कार्यक्रम था।

जब ११ अगस्त को ऑफिस से कहा गया कि दिल्ली चाहता है कि पंद्रह अगस्त को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से लाइव की जाए। इसके लिए मेरा नाम आगे किया गया और जगह तय हुआ गढ़चिरौली। जानते वक़्त लगा कि एक सपना ही पूरा होने जा रहा है। उन जगहों की वास्तविकता को जानने का मौक़ा देर से ही सही, मिलने वाला था। ऑफिस की ज़रूरत बस इतनी थी कि मैं वहाँ १५ अगस्त की सुबह की बुलेटिन में लाइव कर दूँ। इसके लिए मुझे १४ को मुंबई से नागपुर की फ्लाईट पकड़नी थी और फिर १५ को लाइव करके गढ़चिरौली से वापस नागपुर आकर वहाँ से मुंबई आ जाना था। मैं इस मौक़े को इतनी आसानी से गँवाना बिल्कुल नहीं चाहता था।

मैंने अपनी अलग योजना बनाई। ऑफिस से आग्रह किया कि मुझे एक दिन एडवांस में भेजा जाए ताकि मैं वहाँ से अच्छी स्टोरी फ़ाईल कर सकूँ। बोड़के सर मुझसे कनविंस हो गये। मैंने एक रोडमेप बनाया। सीआरपीएफ़ के अधिकारियों के नंबर जुटाए और फिर उनको एक-एक कर फ़ोन करना शुरू किया। समझ में आ गया कि दिल्ली  से एक लेटर अगर निकल जाए तो जो मैं चाह रहा हूँ वह करना आसान हो जाएगा। यहाँ भी क़िस्मत ने साथ दिया और दिल्ली ने मेरे कहने पर सीआरपीएफ़ के डीआईजी के नाम एक लेटर लिख दिया जिसमें मुझे हर संभव मदद करने की बात कही गई। यही मुझे चाहिए था।

मैं १३ की ही शाम गढ़चिरौली पहुँच गया। नवीं बटालियन के कमांडेंट शंभू कुमार नवादा ज़िले के निकले। उन्होंने प्राणहिताय थाने के अंदर नवीं बटालियन के मुख्यालय में रहने का प्रबंध करवा दिया। खाना-पीना भी सब वहीं। मैंने एक और काम यह किया था कि गढ़चिरौली के स्ट्रिंगर को बाईपास करके नागपुर से कैमरा टीम ले ली थी। गढ़चिरौली के स्ट्रिंगर के व्यवहार को मैं जानता था इसलिए उसके साथ मुझे वैसा सबकुछ करने में बड़ी कठिनाई होती जो बाहरी स्ट्रिंगर के साथ करना आसान था।

१३ की रात कमांडेंट के साथ उनके आवास पर खानपान हुआ। शराब भी हुई। देर रात तक अगले दिन का प्लान बना और अगले दिन मैं बिनागुंडा की तरफ़ निकल गया। पुलिस की सुरक्षा दी गई थी। गाड़ी के आगे-पीछे फोर्सेज सिविल ड्रेस में थी ही, मेरी गाड़ी में भी पुलिस के लोग सिविल ड्रेस में हथियारों से लैस चल रहे थे। जाते वक़्त ड्राईवर को देर हुई तैयार होने में तो मैंने ख़ुद ही इनोवा क्रिस्टा चलाई। दुनिया भर के जोखिम मैंने इस उमर में लिए हैं, उनमें से एक यह भी याद रहेगा। भामड़गढ में गाड़ी कीचड़ में ज़बरदस्त फँसी और तमाशा भी बना लेकिन सब फिर संभल गया। डीएसएनजी आई, जैसे-तैसे नो-नेटवर्क एरिया में फ़ीड दिल्ली को गया। ज़बरदस्त मेहनत के बाद उस दिन चैनल पर न केवल गढ़चिरौली के नक्सल प्रभावित क्षेत्र से मेरी स्टोरी चली बल्कि ज़बरदस्त असर भी हुआ। मैंने मुंबई में अपने बॉस को थैंक्स का मैसेज किया। मैं अपने सपने पूरे कर रहा था। अगले दिन यानि १५ अगस्त को वहाँ से हॉटस्वीच हुए और सबकुछ शानदार रहा।

मैं वहाँ से नागपुर आया। नागपुर के स्ट्रिंगर को उसके घर छोड़ा। उसके यहाँ खाना खाया, उसका इनकम टैक्स रिटर्न भरा और फिर दूरंतो से वापस मुंबई आया।

मुंबई में मेरे १२ साल पूरे हुए और गढ़चिरौली जाने का एक सपना बारह साल बाद आख़िरकार पूरा हो गया।

Thursday, July 30, 2026

The Domino Effect of a missed train


 I've restructured your story into a smoother, more engaging narrative while preserving your experiences and emotions.

Writing



What a Frustrating Day

I missed the 11:20 local by just a few seconds, and that single moment made me reach the office almost an hour late. In Mumbai, the value of time is unmatched. Missing one train can throw your entire day off schedule.


The day already felt heavy because the previous night had been even heavier. I reached home after midnight, went straight to bed, and woke up only after 9 a.m. the next morning. With little enthusiasm, I prepared my meal, packed my bag, and left home without paying much attention to the time.


On the way, I called Kalpana to ask if she had filed her Income Tax Return (ITR). She told me that her sister also wanted to file hers. That immediately caught my interest because I was hoping to find a client who could at least pay me something. So far, I have filed around 14 ITRs free of cost.


While talking to her, I completely lost track of time. By the time I reached the platform at Mansarovar, the train had already started moving. Having had two unpleasant experiences trying to board moving trains, I decided not to risk it.


Just then, I noticed a Panvel-bound train arriving on the opposite platform. I also realized that the 11:51 CST local from Mansarovar was an AC train. That made me panic. I boarded the Panvel train, intending to get down at Khandeshwar and catch the 11:51 local from there. Normally, after an AC local, the following general compartment isn't as crowded because many commuters choose the AC train.


But fate had other plans.


As we approached Khandeshwar, an announcement informed us that a non-stop train would be passing through Platform 2. I felt utterly defeated. Inside, I was almost in tears. After what felt like an eternity—around fifteen painfully expensive minutes—I finally boarded the train that was scheduled to leave Mansarovar at 12:00. By then, it had only reached Khandeshwar.


The setbacks didn't end there.

A Day When Everything Went Wrong

At Kurla, yet another AC local arrived ahead of us, forcing us to wait again. By then, my frustration had peaked. I messaged Bhagya, switched off my phone, and for a brief moment, I was so angry that I felt like throwing it onto the tracks.


What made it worse was that I had planned to reach home early because I had to leave for Pune the next day. That plan was now falling apart.


Finally, I reached Parel at around 1:00 p.m. After waiting another 15–20 minutes, I got a bus.


Even there, my luck refused to improve.


I had my Chalo smart mobility card, so I offered to pay for a fellow passenger's ticket if she gave me ₹12 in cash. She quietly handed me the money, and I bought her ticket using my card.


The irritating part came later. She got down at Gopal Nagar, taking the ticket with her. Since I had to get off only two stops later, at Doordarshan, I needed that ticket to show the conductor if asked. But I couldn't gather the courage to ask her to return it before she got off. Feeling mentally exhausted, I simply got down at Gopal Nagar as well and walked the remaining distance.


Some days, nothing seems to go your way.


Today was one of those days.

If you're writing this as a personal blog or memoir, I can also make it more literary and reflective, with stronger descriptions of Mumbai's relentless pace and the emotional weight of the day.

Saturday, July 25, 2026

Sunday, July 19, 2026

Friday, July 17, 2026

योद्धा

                                              पापाजी का गणित 

पिताजी की पुरानी लेखनी और उनके कागजात देखकर यही लगता है कि पापाजी एक ऐसे योद्धा थे जैसा कोई दूसरा मैंने अपने जीवन में नहीं देखा।

उनका डिक्टेशन, गणित की पढ़ाई, हिंदी-अंग्रेजी का ज्ञान और कितना कुछ था जो मौका-बेमौका वह देते थे। सरस्वती से हमेशा वह संबद्ध रहे। आज किसी जमाने का उनका ये कागज देखा तो फिर से गर्व हुआ कि मैं उनका बेटा हूं। जानकारी के अभाव में मन में उनको लेकर अलग-अलग भावना आती रही लेकिन कभी-कभी सुकून भी मिलता रहा कि जो हो पाया मैंने किया।



Sunday, July 12, 2026

पानी देने का तरीका

 

                                          पापाजी की सीख


पानी देते वक्त उंगली डालना नहीं हाथ में। 


Thursday, July 9, 2026

अच्छा वक्त

                                                      योगिनी एकादशी 

जैसे बुरा वक्त का एहसास हो जाता है वैसे ही अच्चे वक्त का भी एहसास हो जाता है। न्यूजरूम का दरवाजा अगर खुला हो तो पूरा कॉरीडोर वहां से साफ दिखाई देता है।

नीचे भाग्य से फोन पर बात करने के बाद जब वापस उपर आया तो पीछे सा आवाज आई। भारती ने आवाज दी थी। गया तो वहां सर भी थे। सर ने कहा कि दिल्ली को योगिनी एकादशी पर स्टोरी चाहिए। सर जिस तरीके से कह रहे थे उससे यही लगा कि वह यह मानकर चल रहे थे कि मैं चौंक जाऊंगा और पूछूंगा का यह एकादशी क्या होता है। लेकिन वैसा हुआ नहीं। जैसे ही उन्होंने योगिनी एकादशी कहा मैंने कहा वो तो कल है न! इसके बाद वह चकित से रह गये और वहां जितने लोग न्यूजरूम में थे सबने देखा कि किस तरह उन्होंने शाबाशी वाले लहजे में कहा कि तुमको पक्का पता होगा यह मुझे मालूम था। यह एहसास सुखद था।

इसके समानांतर दूसरी घटना हो रही थी कामोठे में। जब मैने पिछले दिनों तीनों कैलेंडर बदले तो मैं एकादशी की तारीख देख रहा था। यूं तो मैं एकादशी नहीं करता हूं लेकिन इस कोशिश में रहता हूं कि कम से कम उस दिन चावल नहीं खाऊं। यह मां-पापाजी की एक परंपरा है जिसे आगे चलाते रहने में कोई दिक्कत नहीं है। इसी क्रम में आज सुबह भात बनाते हुए मैंने देखा कि एकादशी कल है। मैंने गौर से देखा तो वहां लिखा था योगिनी एकादशी। 

यह एक संयोग ही था कि सुबह का देखा हुआ कैलेंडर ऑफिस में इतनी इज्जत दिलवा दिया। कैलेंडर यही कोई अस्सी या सौ रुपये में मैंने लिया होगा आज वह पैसा एक तरह से वसूल हो गया। 

Wednesday, July 8, 2026

A lesson from Araria

 

                                                         Felt the change!

I think, I am a bit changed in the last few months. This change relates to my way of listening and responding to the subject matters. Better I would say, I have become more patient than what I was before joining Arun Honda in Mid March-April this year.

I saw Arun Bhaiya, Roshan Ji, Mithilesh Ji, Manoj Ji and all other staffs to give a patience hearing to everyone. I never saw anyone disconnecting the calls without listening the last words or completing his sentences fully. No phone was disconnected or put on hold just because someone was waiting.

In Mumbai, things are totally opposite. We run physically, mentally and virtually also. Messages are exchanged on WhatsApp in shortest possible terms. Most of the times, messages are left to be unattended despite action is initiated. Similarly, some messages are responded not in words but in smileys pasted on the senders' chat. Rush hours always dominate our activities but now I found myself in a different state of mind.

Yesterday, I attended a press conference in BMC. After the PC concluded, I met Kiran, Assistant PRO, and requested him to add in the official WhatsApp group for News. I had requested him earlier also but this time it was different. The wordings were the difference. I drafted a message of around 70 words with full of technical details such as why my presence in the WhatsApp group is important and how I qualify to be a bona fide member of that group where already my colleague is added. To my surprise, I was added within a few hours, I sent the request. 

Another example! Last night I had a long telephonic chat with Bunty, who's facing job crisis in Delhi. I was honestly trying to help him. His family is getting marriage proposals but due to not having job in hand, he is badly humiliated within himself. I drafted a comparatively big message to Raghunath Sir seeking his appointment. Sir is suffering from Cancer but he responded. It was again a surprise not because he responded but the way I typed long message, was different from my nature.

Everything teaches something to a person who wants to learn. I feel it. 

Saturday, June 27, 2026

एक आपदा का टलना

 

कुछ समय पहले की बात है, कुछ साल शायद! डीएसएनजी में बैठकर मैं कहीं जा रहा है। स्वप्निल और दर्शन‌ के साथ मैं बैठा था। स्वप्निल गाड़ी चलाते-चलाते हंसा साईड मिरर में देखकर। फिर बोला सर देखा आपने पीछे। मैंने कुछ नहीं देखा था। फिर उसने कहा कि पीछे आ रही गाड़ी दो पलटी मारकर वापस चलने लगी। 

भैया के साथ‌ जो परसों हुआ वह वैसा ही था। जो हुआ वह चमत्कार ही था।

Saturday, June 20, 2026

पर‌ उपदेश बहुतेरे

 कोल्हापुर महालक्ष्मी दर्शन परंपरागत तरीके से

Tuesday, June 16, 2026

पापाजी की याद में

                                                   इनय्या के इक्कीस साल

ऐसा इतनी बार हो चुका था कि उनका एक्च्वल बर्थ-डे मुझे याद रहे न रहे यह जरूर याद रहता था कि जून महीने के किसी दिन ऐसा हुआ था। इनय्या वाली घटना हमसब के मस्तिष्क पर एक अटल छाप छोड़ा हुआ था। पापा जी ने इसे रि-बर्थ का नाम दिया था और मुझे भी यही लगता रहा कि उस दिन पिताजी शायद अंत हो जाते।

कल देर रात बात होने के बाद भैया का फिर आज सुबह सवेरे फोन आया तो लगा कुछ खास बात के लिए फोन होगा। पापाजी की शैली में उन्होंने याद दिलाया आज का दिन। मैंने सच में इस दिन को कभी फुर्सत में याद नहीं किया या फिर कभी फुर्सत ही इतनी नहीं मिली कि इस दिन को बहुत अच्छे से याद किया जाए। फिर, यह भी है कि याद करके किसके साथ बातें साझा की जाए। 










Sunday, June 14, 2026

छाता वाले सर

                        जिस स्कूल में मैंने लंबा समय बिताया 

गणित के सर के तौर पर उनकी पहचान होने के साथ साथ उनकी एक और पहचान थी छाता वाले सर। कॉलिजिएट स्कूल के बारे में आज सोचने पर कोई डरावना सा कुछ लगता है। ऐसा लगता है जैसे नालंदा यूनिवर्सिटी के खंडहर जैसा ही कुछ वहाँ भी हो गया होगा जहाँ उस वक्त के सब लोग ज़िंदा जल गए होंगे। कक्षा सात और आठ के उधर जो पतली जगह थी वास कक्षा छह की तरफ़ पीछे से जाती हुई कितनी डरावनी दिखती थी। ओह, सच में क्या मैंने वहाँ उस दौर में पहुँच रहा हूँ। नहीं…

वो विशम्भर सर के लिए कक्षा का सबसे प्रिय छात्र था चंदन। वही जयेश कुमार चंदन! वह उनकी आँखों का तारा था। गणित अच्छी थी उसकी और कोई भी हिसाब जब सर उसे देते तो वो बना देता था। यह एक तरह से ऐसा ही था जैसे सचदेव में हेमंत सर का सबसे प्यारा छात्र था चितरंजन।

खैर, कुछ दिन पहले जब कमोठे से मानसरोवर स्टेशन जा रहा था तो लगा जैसे धूप जला ही डालेगी। संयोग ये था कि दो-तीन दिन पहले ही बारिश हुई थी और मैंने साढ़े तीन सौ में छाता भी खरीदा था। छाता तब से बैग में ही पड़ा था। मैंने सोचा कि छाता निकाल हूँ धूप से बचने के लिये लेकिन फिर लगा कि लोग क्या कहेंगे जो देखेंगे! धूप से बचने के लिए छाता अक्सर सुंदर लड़कियां लगाती हैं। इतना सोच ही रहा था कि विश्वंभर सर की अचानक याद आई। क़रीब चौबीस साल हो गए उन्हें देखे। अब तो पता नहीं वह होंगे भी या नहीं और अगर होंगे तो किस हाल में होंगे! 

कलेजा मुंह को आ जाता है जब ऐसी कोई घटना याद आती है। शायद मैं बहुत दूर, बहुत अलग और बहुत अथाह में आ चुका हूँ।

Saturday, June 6, 2026

AIBE

 समानांतर दुनिया 


अंधेरे में जमीन टटोलती लाठी!

Sunday, May 31, 2026

वो दौर

 विक्रांत तुम उस दिन‌ कह रहे थे न कि तुम्हें तब लगा कि तुम सही जगह आए हो जब तुमने मुझे अपनी कही बातों को मुझे सादे कागज पर लिखते देखा।


बात २००९ की होगी शायद। देर रात मैं विश्वनाथ बाबू के यहां गया था। उन्होंने मुझसे उस बदमाश के बारे में पूछा तो मैं बता नहीं पाया। फिर उन्होंने कहा था कि कैसा दिखता है। वह कागज पर उसका स्कैच बनवा रहे थे। तब मुझे भी लगा था कि मैं सही जगह आया।