पावर और पैसा
पावर बड़ा या पैसा। या फिर दोनों या फिर दोनों में कोई नहीं। समय बड़ा बलवान है, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है। लेकिन जब बात पावर और पैसे की आती है तो उसके मेरे अपने अलग-अलग अनुभव हैं।
इस बार श्रीशैलम में लगा कि पावर तो ठीक है लेकिन पैसे का होना भी बहुत ज़रूरी है। मुंबई ऑफिस से आरएनयू हैदराबाद को मेरे श्रीशैलम जाने की सूचना लिखित रूप में दी गई थी और आरएनयू हैदराबाद ने श्रीशैलम मंदिर प्रशासन को इसकी जानकारी दी थी। हमें समय से फ़ोन आने शुरू हुए और २३ अगस्त की शाम हम मंदिर परिसर पहुँच गये। हमारी तरह कुछ और लोग थे जो इस तरह दर्शन के लिए आये थे। स्पर्श दर्शन के लिए जो निर्धारित शुल्क था उस दिन हमने सुबह मंदिर प्रशासन के आदमी को फ़ोन पर दे दिया था, जब उसका फ़ोन आया था। दिन में हमने ख़रीदारी की और फिर शाम में समय से पहुँच गये। सबकुछ ठीक-सा ही लग रहा था सिवाय मेरी जेब के। जैसा कि अक्सर मेरे साथ होता है मेरे हाथ में ज़्यादा रुपये तो थे नहीं, यही इधर-उधर से जुटा-जुटाकर सौ-हजार थे जिनमें से दिन में मंदिर जाने के लिए ख़रीदे जाने वाले कपड़े में कुछ खर्च हो गये थे। एक सौ का और एक पचास का फटा सा नोट जेब में था, बाक़ी गूगल-पे के भरोसे यात्रा चली जा रही थी।
अंदर जाकर जब दर्शन हो गये। हमलोग बाहर आये तो जो साथ में लड़का था उसने ज़ोर देकर कहा कि हो गया सबकुछ। भाग्य ने नोटिस किया था कि हमारे साथ जो और थे उनमें से एक ने उसे पाँच सौ रुपये दिए थे। मैं अंदर से दहला हुआ था और बेइज़्ज़ती के लिए ख़ुद को तैयार कर रहा था। कुल डेढ़ सौ मैंने उसे दे तो दिए और वहाँ से निकल भी गया लेकिन ऐसा लगता रहा कि कहीं भीड़ में वापस न टकरा जाऊँ। मन अजीब सा परेशान था। थोड़ी दूर जाकर जब प्रसाद वाले लड्डू के लिए भाग्य और हम जाने के लिए रास्ता बदले तो जिसका डर था वही हुआ। वह लड़का वापस आया था और मेरे दिए डेढ़ सौ वापस देने लगा हंसते हुए। घोर शर्मिंदगी की बात तो थी मेरे लिए लेकिन मैं इतना ही कर पाने की स्थिति में था। आख़िर मैंने उसे मोबाईल से ढाई सौ और भेजे। वह पाँच सौ की अपेक्षा कर रहा था। लेकिन उतना भेज के और जो डेढ़ सौ वह मुझे दे रहा था वह भी उसके हाथ में छोड़ते हुए बहुत झिझक के साथ हमलोग आगे बढ़ गये। फिर प्रसाद के लिए लड्डू लेकर जब हमलोग लौटे तो पूरे रास्ते मन सशंकित रहा कि कहीं वह वापस न आ जाए।
पिछले दिनों दार्जिलिंग में भी ऐसा ही हुआ था। जब केयरटेकर को मैं बस डेढ़ सौ रुपये दे पाया था। बाद में मैंने अपने मोबाईल के कैमरे में देखा तो नोटिस किया कि जब मैं वहाँ से निकल रहा था तो कार के पीछे कमरे में बरतन साफ़ करने वाली वह महिला हमारी कार को देख रही थी। वहाँ भी रहने का इंतज़ाम मैंने अपने कंटैक्ट से किया था।
पावर अपनी जगह है लेकिन रुपये का होना कितना ज़रूरी होता है वह ऐसे अनुभवों से पता चलता है। अगर मैं ऐसी जगहों पर आसपास के लोगों को पाँच सौ-हजार देते चलूँ तो शायद मुझे मेरे दफ़्तर की वजह से मिला पावर जस्टिफ़ाई हो जाएगा।
कुल मिलाकर न रुपया बड़ा है न पावर, बड़ा है तो बस समय। मुझे याद है जगन्नाथ पुरी में जब माँ-पापाजी के साथ सबलों दर्शन कर के लौटे और जिन्होंने मदद की थी उनको जब मैंने पाँच सौ रुपये दिये थे तो उन्होंने बड़ी विनम्रतापूर्वक लौटाते हुए कहा था कि आपने कहा था कि माँ नहीं चल सकती थीं इसलिए हमने आपकी मदद की। मुझे लगा कि इन्होंने पाँच सौ रुपये को ऐसे नकार दिया, इधर दूसरी तरफ़ कहीं पाँच सौ न देने के लिए अपमान की स्थिति भी बन गई। कुल मिलाकर हर तरह के लोग हैं तो न पावर बड़ा है न पैसा, बड़ा है समय। समय कब किससे, कहां, किस रूप में मिलवा दे किसे पता!

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