Thursday, August 20, 2026

ऐसी वैसी कैसी कैसी

 

                                               श्रीशैलम यात्रा 

पिछले दिनों जब लाडली ने कहा कि स्कूटी के री-रजिस्ट्रेशन में करीब साढे पांच हजार लगेंगे तो लगा जैसे किसी ने मेरे अंदर करंट दौड़ा दिया हो। सर फटने जैसा लगा, खून खौलता गया और समझ ही नहीं आया कि क्या कहा जाए। श्रीशैलम का एक बार प्लान जून में बना था जो नहीं हो पाया। दूसरी बार अगस्त में बना लेकिन हाथ खाली होता गया। 10-11 अगस्त तक चिंता की लकीरें दिमाग पर साफ थी कि पता नहीं कैसे हो पाएगा। हमलोग अलग-अलग जगह पर रह रहे हैं। खर्च भी उसी हिसाब से हो रहा है। कहीं जाने का मतलब बस टिकट का खर्चा नहीं होता है बल्कि कपड़े, खानपान, रहना और अन्य जरूरतें भी होती है। दार्जिलिंग का खर्चा बीस हजार से ज्याद पड़ गया था टिकट मिलाकर। 

अच्छा हुआ कि गढचिरौली का टूर आ गया ऑफिस से और फिर उसके एडवांस में 15000 रुपये मिल गये। टिकट में वैसे ही करीब आठ हजार खर्च हो चुके थे ऐसे में यही कोई सात हजार थे जो हाथ में थे। वहां रहने खाने के दौरान एक-दो हजार खर्च होने के बाद बस वही पांच हजार थे जिसको लेकर श्रीशैलम की यात्रा होनी थी। यह जगह न सीधे किसी रेलवे स्टेशन से जुड़ा था और न ही आसानी से पहुंच वाला। पांच हजार में दिक्कतें होनी ही थी फिर भी लग रहा था कि हाथ बांधते हुए यात्रा हो जाएगी। ऐसी यात्रा का मुझे और भाग्य को अनुभव है। 

ऐसे में लाडली का फोन आना और साढे पांच सौ का खर्च तुरंत बताना मन को बेध गया। अकेले कमरे में बहुत देर तक रोने और पागलों की तरह चिल्लाने के बाद कितनी बार मैंने अपने ही सर को धुना। मन में आ रहा था कि कोई आए और बताए कि ये सब कब तक चलेगा! क्या राहू मेरे अकाल मृत्यु की वजह बनेगा? क्या जो भी बिगड़ा है वह कभी ठीक नहीं हो पाएगा! भाग्य को फोन किया तो उसने जले पर नमक छिड़क दिया यह बोलकर कि आप ही न बोले थे लाडली को करने और लाडली को बोले थे छोटी दीदी को नहीं बताने। यह इस तरह था कि अब भुगतिए।

रोना-चिल्लाना जो था वो हुआ लेकिन रुपये तो देने ही थे तो मैंने दि दिए। उसके बाद श्रीशैलम को लेकर जो रहा-सहा उत्साह था वह भी खत्म हो गया। दिन और रात घुटन भरी हो गई और ऐसा लगा कि यह अंधेरा आजीवन रहेगा। पंडित जी पहले ही बता चुके हैं कि राहु का दशा बहुत प्रभावशाली है और शनि भी घोर विपरीत है। कुल मिलाकर जो दिन जैसे बीत रहा है उसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं। अकाउंटेंट साहब को लेकर मन में प्रतिशोध दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है और साथ में यह मलाल भी कि उनका कुछ ऐसा नहीं हो पा रहा जिसे देखकर मन संतोष हो। उनके पास इतने रुपये हैं कि हर तरह का पूजा पाठ करवाकर ग्रहों को शांत करवा सकते हैं वह।

खैर, परिस्थितियां अपना खेल दिखा रही थी। मैं पहले भी कई बार इस तरह की परिस्थितियों से गुजर चुका हूं जब चीजें एक के बाद एक बुरी और एकदम बुरी होती चली जाती है और जो नहीं करना है वह भी करने को आदमी बाध्य हो जाता है। उदाहरण के लिए मैं एकादशी में चावल नहीं खाता लेकिन अप्रैल में ऐसी परिस्थिति बनी कि उसक दिन मुझे मछली-भात खाने के लिए बाध्य होना पड़ा और वह भी यह जानते हुए कि उस दिन एकादशी था। ऐसा कई बार हुआ जब मुझे समझ में आया कि जो होना है वह होकर ही रहेगा। राहु इसी का नाम है। कर्ज राहु का प्रिय है और वह जिसपर सवार होता है उसे वह कर्ज से बाहर आने नहीं देता। 

अगले ही दिन घर का रसोई गैस खत्म हो गया। जो पांच हजार मैंने बचाए थे उसके खत्म हो जाने के बाद अब जो गैस का खर्च था वह कर्ज ही होना था। मैं इतना प्रताड़ित हो चुका था कि कई बार मन करता था कि रेलवे ट्रैक पर लेटकर अपने शरीर को दो टुकड़ों में कट जाने दूं। कुछ घंटों का असहनीय दर्द होगा लेकिन फिर इतने सालों से चला आ रहा और पता नहीं कितने सालों तक चलने वाला दर्द कम से कम जड़ से खत्म हो जाएगा। यह अलग बात है कि ऐसा करने की हिम्मत जुट ही नहीं पा रही। गैस खत्म होने के बाद मकानमालिक की बेटी ने गैस ऑर्डर किया और फिर मुझे उसे 941.50 भेजने पड़े। यह रुपये मेरे दूसरे बैंक में थे जिसे मैं आपात स्थिति के लिए बचाकर रखता हूं। मैं एकदम दरिद्र हो गया। आंध्रप्रदेश में मंदिर जा रहा हूं, ऐसा सोचकर ही चिढने लगा।

19 अगस्त को एक मेल आया कि साढे तीन हजार रुपये मुझे दूरदर्शन से आए हैं। यह एकदम ही चौकने वाली बात थी क्योंकि पिछले महीने की आखिरी तारीख को जो दौरा मैंने किया था यह उसके पैसे थे जो इतनी जल्दी कभी नहीं आते। हमारे पैसे अकाउंट से क्लियर होने में चार-पांच महीने कम से कम लगते ही हैं। मैंने चौंकते हुए अकाउंट स्टाफ सुजाली जी को फोन किया तो उन्होंने कहा कि क्लियर जल्दी कर दिया उन्होंने। कुछ महीने पहले मैंने अकाउंट सेक्शन की शिकायत की थी शायद यह उसी का परिणाम था। जो भी हो, जान में जान आई कि चलो कुछ तो हाथ में आया। उधर रुपये आए और इधर फिर भाग्य का मैसेज आया कि 15646 जो किशनगंज से दोपहर करीब तीन बजे निकलने वाली थी वह अब नौ घंटे देर से चलेगी। इसके कई मतलब थे। सबसे पहला यह कि भाग्य को किशनगंज के लिए अब पूर्णिया से दूसरी बस लेनी होगी, दूसरा कि भाग्य और बच्चों को रात के दो-तीन बजे एक ऐसे स्टेशन से ट्रेन लेनी होगी जहां उनके साथ कोई नहीं होगा और तीसरा हैदराबाद पहुंचकर वहां से श्रीशैलम की बस उस रोज मिलेगी या नहीं इसकी गारंटी नहीं क्योंकि वहां से आखिरी बास शाम पांच बजे तक ही चलती है। उसके बाद जो बसें चलती है उसके जंगली सीमा पर रोक दिया जाता है और बाकी का सफर वह अगले दिन पूरा करती है। श्रीशैलम में होटल पहले से बुक था जिसका रुपया पानी में जाने की आशंका भी बन गई। कुल मिलाकर सबकुछ उथल-पुथल हो गया। भाग्य से बातचीत के क्रम में भी कड़वाहट भरती गई। मन बैठा-बैठा सा हो गया लेकिन राहू के प्रभाव का काट के लिए मैं पूजा भी तो नहीं करवा पाया था।

भाग्य जब 20 अगस्त यानि कि आज पूर्णिया से निकली तो बस स्टैंड पर बच्चों के साथ वीडिया कॉल पर बात हुई। बच्चे उत्साहित थे लेकिन थके हुए भी लग रहे थे। मैं यह सोचकर ही परेशान हो गया कि ये करीब छह-सात बजे किशनगंज पहुंच तो जाएंगे लेकिन इनको वहां से ट्रेन रात को दो-तीन बजे पकड़नी होगी। गहरी नींद में भाग्य कैसे बच्चों को लेकर ट्रेन में चढेगी और उस वक्त ट्रेन के अंदर का क्या दृश्य होगा। किशनगंज स्टेशन पर रिटायरिंग रूम बुक करने का आइडिया अचानक सूझा। बिहार के स्टेशनों पर और खासकर जब ट्रेन विकली हो और एक ओर से दूसरे छोर तक जा रही हो, अंतिम समय में रिटायरिंग रूम बुक होने की संभावना बिल्कुल नहीं थी। मुझे तो लगा था कि स्टेशन पर शायद रिटायरिंग रूम होगा भी नहीं। प्रभादेवी बस स्टैंड से दूरदर्शन आने तक रास्ते में प्रयास किया लेकिन आईआरसीटीसी के मोबाईल एप में कुछ प्रॉब्लम आ रहा था। ऑफिस आते ही करीब सवा तीन बजे बार-बार कोशिश किया तो वेबसाईट से लॉगिन हो गया और डिलक्स रूम भी उपलब्ध था। कुल 1022 रुपये लगे लेकिन एक अच्छा एसी कमरा बुक हो गया। मन को थोड़ी तसल्ली मिली की पति और पिता होने का फर्ज गरीबी में भी निभ गया वरना बच्चे और भाग्य पता नहीं वेटिंग हॉल में कैसे रहते जहां न सामान की सुरक्षो होती न निजता रह पाती और न ही सोने की पर्याप्त सुविधानजनक जगह होती। लेकिन खुशी थोड़ी ही देर में हवा होने लगी जब रुपये की बात दिमाग में घूमी। दूरदर्शन से आए रुपयों से मैंने भुगतान तो कर दिया था लेकिन पास में कैश के नाम पर वही दो-ढाई हजार पड़े थे।

भाग्य ने वहां रिटायरिंग पहुंचकर वहां से वीडियो कॉल किया तो लगा कि अच्छा हो गया। इधर थोड़ी देर बाद ही अटल पेंशन योजना का मासिक किस्त कट गया खाते से। कुल मिलाकर ऐसा लग रहा था कि कोई बचा रहा है और कोई मार रहा है। जो हो, एक बात बहुत पहले प्रदीप रावत ने कही थी कि बचाने वाला मारने वाला से हमेशा बड़ा होता है। बचा तो वही रहा होगा जिसके आगे रोज मैं दीया जलाता हूं। 

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