एक सपने का पूरा होना
महाराष्ट्र में क़रीब-करीब सभी ज़िलों में जाना हो चुका था। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पूरे महाराष्ट्र के भ्रमण तो हो ही गया था और बाक़ी अलग-अलग मंत्रियों, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या अन्य सरकारी कार्यक्रमों के बहाने बहुत सारी जगहों पर जाना हो चुका था। हालाँकि एक ऐसी जगह थी जहां जाने को लेकर मन में हमेशा एक तरह की बेचैनी रहती थी लेकिन संयोग बनना बहुत मुश्किल था और वह जगह था गढ़चिरौली।
ऐसा नहीं था कि मैं कभी गढ़चिरौली गया नहीं था। दरअसल गढ़चिरौली के अंदर उन जगहों पर मेरे जाने की इच्छा थी जहां नक्सली हमले होते थे या फिर जो संवेदनशील जगह थी। एक बार राष्ट्रपति जब गढ़चिरौली के एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत में आए थे तो मैं उसमें गया था लेकिन वह विशुद्ध सरकारी कार्यक्रम था।
जब ११ अगस्त को ऑफिस से कहा गया कि दिल्ली चाहता है कि पंद्रह अगस्त को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से लाइव की जाए। इसके लिए मेरा नाम आगे किया गया और जगह तय हुआ गढ़चिरौली। जानते वक़्त लगा कि एक सपना ही पूरा होने जा रहा है। उन जगहों की वास्तविकता को जानने का मौक़ा देर से ही सही, मिलने वाला था। ऑफिस की ज़रूरत बस इतनी थी कि मैं वहाँ १५ अगस्त की सुबह की बुलेटिन में लाइव कर दूँ। इसके लिए मुझे १४ को मुंबई से नागपुर की फ्लाईट पकड़नी थी और फिर १५ को लाइव करके गढ़चिरौली से वापस नागपुर आकर वहाँ से मुंबई आ जाना था। मैं इस मौक़े को इतनी आसानी से गँवाना बिल्कुल नहीं चाहता था।
मैंने अपनी अलग योजना बनाई। ऑफिस से आग्रह किया कि मुझे एक दिन एडवांस में भेजा जाए ताकि मैं वहाँ से अच्छी स्टोरी फ़ाईल कर सकूँ। बोड़के सर मुझसे कनविंस हो गये। मैंने एक रोडमेप बनाया। सीआरपीएफ़ के अधिकारियों के नंबर जुटाए और फिर उनको एक-एक कर फ़ोन करना शुरू किया। समझ में आ गया कि दिल्ली से एक लेटर अगर निकल जाए तो जो मैं चाह रहा हूँ वह करना आसान हो जाएगा। यहाँ भी क़िस्मत ने साथ दिया और दिल्ली ने मेरे कहने पर सीआरपीएफ़ के डीआईजी के नाम एक लेटर लिख दिया जिसमें मुझे हर संभव मदद करने की बात कही गई। यही मुझे चाहिए था।
मैं १३ की ही शाम गढ़चिरौली पहुँच गया। नवीं बटालियन के कमांडेंट शंभू कुमार नवादा ज़िले के निकले। उन्होंने प्राणहिताय थाने के अंदर नवीं बटालियन के मुख्यालय में रहने का प्रबंध करवा दिया। खाना-पीना भी सब वहीं। मैंने एक और काम यह किया था कि गढ़चिरौली के स्ट्रिंगर को बाईपास करके नागपुर से कैमरा टीम ले ली थी। गढ़चिरौली के स्ट्रिंगर के व्यवहार को मैं जानता था इसलिए उसके साथ मुझे वैसा सबकुछ करने में बड़ी कठिनाई होती जो बाहरी स्ट्रिंगर के साथ करना आसान था।
१३ की रात कमांडेंट के साथ उनके आवास पर खानपान हुआ। शराब भी हुई। देर रात तक अगले दिन का प्लान बना और अगले दिन मैं बिनागुंडा की तरफ़ निकल गया। पुलिस की सुरक्षा दी गई थी। गाड़ी के आगे-पीछे फोर्सेज सिविल ड्रेस में थी ही, मेरी गाड़ी में भी पुलिस के लोग सिविल ड्रेस में हथियारों से लैस चल रहे थे। जाते वक़्त ड्राईवर को देर हुई तैयार होने में तो मैंने ख़ुद ही इनोवा क्रिस्टा चलाई। दुनिया भर के जोखिम मैंने इस उमर में लिए हैं, उनमें से एक यह भी याद रहेगा। भामड़गढ में गाड़ी कीचड़ में ज़बरदस्त फँसी और तमाशा भी बना लेकिन सब फिर संभल गया। डीएसएनजी आई, जैसे-तैसे नो-नेटवर्क एरिया में फ़ीड दिल्ली को गया। ज़बरदस्त मेहनत के बाद उस दिन चैनल पर न केवल गढ़चिरौली के नक्सल प्रभावित क्षेत्र से मेरी स्टोरी चली बल्कि ज़बरदस्त असर भी हुआ। मैंने मुंबई में अपने बॉस को थैंक्स का मैसेज किया। मैं अपने सपने पूरे कर रहा था। अगले दिन यानि १५ अगस्त को वहाँ से हॉटस्वीच हुए और सबकुछ शानदार रहा।
मैं वहाँ से नागपुर आया। नागपुर के स्ट्रिंगर को उसके घर छोड़ा। उसके यहाँ खाना खाया, उसका इनकम टैक्स रिटर्न भरा और फिर दूरंतो से वापस मुंबई आया।
मुंबई में मेरे १२ साल पूरे हुए और गढ़चिरौली जाने का एक सपना बारह साल बाद आख़िरकार पूरा हो गया।
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