पहचान
ऐसा क्या है जो पिछले कुछ सालों में वैसा नहीं रहा जैसा था! रिश्ते, नौकरी, जगह, लोग, समय या फिर मैं खुद!
तुम मुझे कैसे जानती हो?
तुम्हें मुहल्ले में देखा है।
अच्छा तो तुम मुझे मुहल्ले से जानती हो?
नहीं, तुम्हारे बारे में पड़ोस की दीदी ने बताया...कि तुम मोनू के भाई हो।
कौन मोनू?
"कौन मोनू" टाइप करते हुए लगा कि समय अब भी वही है। बदला नहीं।
मोनू कौन? उस चैट को बेनतीजा खत्म करने के थोड़ी देर बाद लगा कि भले ही रिश्ते, नौकरी, जगह, लोग या फिर मैं खुद बदल रहा हूं लेकिन समय नहीं बदला।
अगर हाइपोथिटिकल होकर सोचा जाए तो चीजें कितनी बदली हुई होती अभी!
बेगूसराय से विदा लिए दशक होने को आए लेकिन पहचान तो वही रही। संदर्भ तो वैसा ही मिला। चेहरे तो वही रहे। और तुम?
काश तुम इनसब चीजों को एकबार अपनी आंखों के सामने घटित होते हुए देखते। काश तुम यह देख पाते कि किस तरह उस एक घटना ने सिलसिलेवार अनगिनत घटनाओं के होने की वजह बना और किस तरह कई निर्दोष लोग उसकी चपेट में बारी-बारी से आते चले गये।
इस बीच बसी एक अलग सी दुनिया को हमेशा समेटे रहने की जरूरत कब पैदा हुई उसका ठीक-ठीक पता मुझे भी नहीं है।
जो डर 2003-2004 के समय पैदा हुआ, वह डर वैसे ही बहुत समय बाद तक बना रहा। उस डर को उस छोटे से चैट ने फिर से ताजा कर दिया।
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