Friday, February 27, 2026

राहु और शनि की महादशा और अंतर्दशा

 

                                                    अवरोध ही अवरोध

दिन ब दिन इस दौर को कहीं लिखा जा सकता तो बाद में पढ़ने पर यकीन होता कि हां ऐसा हुआ था। कहते हैं आइंसटीन ने ही शायद कहा था महात्मा गांधी के बारे में कि आने वाली पीढ़ी को यकीन नहीं होगा कि हाड़मांस का ऐसा कोई इंसान कभी धरती पर हुआ था। वो तो अच्छा हुआ कि गांधी के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा गया जिससे कम से कम यह तो स्पष्ट रहा कि हां गांधी थे। ऐसा ही इस दौर के बारे में भी होना चाहिए था हालांकि हुआ नहीं क्योंकि इतनी फुरसत ही नहीं हो सकी कि सबकुछ लिखा जा सके।

मुंबई छोड़ते वक्त जो चीजें काउंटडाउन में चल रही थी वह थी डोमिसाइल, चीजों को बेचना, स्कूटी को ठिकाने लगाना, ऑफिस और लैंड लॉर्ड को बताना और बाकी कुछ खुदना चीजें। इनमें से कोई भी चीज अच्छे से नहीं हो पाई। गाड़ी अंत-अंत तक कहां रहेगी यह तय नहीं हो पाया। मुंबई के खरीदार ने सोलह हजार का भाव बोला जिसपे बात बनी नहीं, दिल्ली भेजने की प्रक्रिया काफी जटिल रही इसलिए वह भी नहीं हो पाया और जब गाड़ी को कटिहार ले जाने के लिए एलटीटी ले जाया गया तो वह रात अबतक की भयानक रातों में से एक रही। पार्सल वाले ने लेने से मना कर दिया। रात साढे दस बजे सीपीआरओ डॉ स्वप्निल नीला को फोन करना पड़ा, वहां से फोन-फोन देर रात तक चला और आखिरकार वहां के क्लर्क ने जैसे-तैसे काम किया लेकिन कटिहार पहुंचकर वह गाड़ी उतर नहीं सकी क्योंकि दस मिनट में उतने सामान के बीच से गाड़ी निकालना नहीं हो पाया। कुल मिलाकर गाड़ी निकल गई आगे और कल होकर उसे किशनगंज या किसी दूसरे स्टेशन से वापस बुलाया गया। संयोग ऐसा बना कि मैं तब पटना बार काउंसिल के काम के लिए चला गया था और आने के बाद जब कटिहार गया तो गाड़ी के वहां पड़े रहने के कारण पैनाल्टी के रूप में ढाई सौ रुपये अलग से लग गये। 

मुंबई अकाउंट सेक्शन में टीएडीए के सारे बिल्स सही से जमा किये हुए थे और किसी में किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं थी। कल अप्रत्याशित रूप से दर्शना का फोन आया और कहा गया कि बिल में हॉटल का नाम लिखना है। सच ये है कि हॉटल के बिल को वैसे ही भरा गया था जैसे अबतक भरता आया था। ऐसा क्यूं हुआ पता नहीं। मैंने उनसे कह दिया कि कुछ चीज तो वह खुद से भी लिख सकती हैं। अब आज जब बात हुई तो कहा गया कि सिग्नेचर की भी जरूरत है। रूख भी बदला था। समझने में देर नहीं लगी कि यह भी उसी का किया कराया है। 

ऐसा ही एक और संकट पैदा हुआ। बार काउंसिल की परीक्षा का फार्म आ गया और उसमें लगने से साढे तीन हजार रुपये। मेरे बैंक अकाउंट में कुल चार रुपये थे और जब लाडली को देने के लिए दस रुपये भेज रहा था तो इनसफिसिएंट बैलेंस लिखा आ गया स्क्रीन पर। पैसो की तंगी तो खैर राहु की देन थी ही लेकिन मानसिक प्रताड़ना जो शायद शनि की वजह से था वह भी दमदार था। हुआ यूं कि 7 जून को परीक्षा की तिथी निर्धारित हुई लेकिन सेंटर कोई एक तय करना था। अब एक पैर मुंबई और एक पैर बिहार में रखकर यह अत्यन्त सरदर्द बन गया कि सैंटर क्या दिया जाए। अररिया में कितना रुपया कब मिलता है इसी पर यह तय होना था कि यहां रूका जाएगा या यहां से वापस मुंबई जला जाया जाएगा। दूसरी बात यह कि यहां से अगर मुंबई लौटता हूं तो आगे फिर यहां का रास्त शायद ही बन पाएगा कभी! 

अवरोध ही अवरोध हर जगह पसरा था। 

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