इस अलगाव की एक वजह नहीं बल्कि अनेको वजहें हैं। दिमाग उन घटनाओं को भुला नहीं पा रहा जो कालांतर के विभिन्न कालखंड़ों में हुई। जैसे किसी बड़े वृक्ष को जड़ को तलाशना मुश्किल है वैसे ही परिवार में टूट की शुरुआत को तलाशना भी दुरूह कार्य है। कोई पौधा शुरू भले ही एक बीज के किसी रेशे से होता है लेकिन दिन-ब-दिन बदलते मौसम में वह रेशा कब अन्य रेशों को पोषित करते-करते अपना अस्तित्व भूलकर प्रकृति में विलीन हो जाता है इसकी भनक कभी किसी को नहीं लग पाती। जड़ें गहराते-गहराते नए-नए रास्ते तलाशती रहती है और आखिरकार एक समय ऐसा आता है जब ऊपर से हरा-भरा लगने वाला वृक्ष अंदर कितने ही ऐंठनों से भर चुका होता है। उस ऐंठनों के बीच उसकी जड़ें तलाशना फिर असंभव ही हो जाता है।
परिवार कब से टूटा कौन बताए! या कहीं
ऐसा तो नहीं कि परिवार तो पूरा होते ही टूटने लगा बस दरारें देर से दिखाई देनी
शुरू हुई!
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