दिल्ली का वह अंधेरा
बात कब की है ठीक ठीक याद नहीं लेकिन हाँ मैं तब दिल्ली में था और मनीष सिसोदिया की स्टाफ स्नेह कोठावाड़े के टच में था। करेगी बनाने को लेकर चक्कर लगाने के उस दौर में मैं इधर उधर भटक रहा था। इसी दौरान उसे भी बोलता था कि कहीं कुछ मिले तो बताना।
स्नेहा का एक बॉयफ्रेंड था जोगी। वह अक्सर उसकी चर्चा करती और सुनकर मुझे भी अच्छा लगता था। स्नेहा लंबी थी और हमेशा सिस्टर लुक में रहती।
खैर, मुझे याद जहाँ तक आ रहा है बहुत उम्मीद लेकर मैं जहांगीरपुरी पहुँचा था। दिल्ली में रहने के दौरान शायद पहली और आख़िरी बार मैं वहाँ गया था। दूर कहीं पहाड़ ऐसा कुछ था, रेत थे, डरा देने वाले घर के स्ट्रक्चर थे और खुली नलियाँ जैसी थी जहाँ कोई पेशाब भी करके आगे जा सकता था। दिल्ली के भयानक दौर में ये वाला दिन मोटे अक्षरों से लिखने वाला दिन था।
उस दिन मैं सोच रहा था कि किस अँधेरे में मैं आ हुआ हूँ। घर में सबको क्या लगता होगा जिन्होंने दिल्ली कभी देखी नहीं…! बड़े शहर और खासकर दिल्ली का संघर्ष कैसा होता है यह दिल्ली कभी नहीं गया आदमी नहीं समझ सकता। पब्लिक ट्रांसपोर्ट और स्ट्रीट फ़ूड के सहारे किया जाने वाला वह स्ट्रगल कितना कठिन था।
हंटर फ़िल्म के शुरुआती सीन में 1989 का एक दृश्य फ़िल्माया गया है। जैसी ही उस दृश्य को देखा अचानक डेढ़ दशक पहले बीता वह दिन याद आ गया।
कितना भटकाव लिखा है जीवन में पता नहीं…
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