एक उम्र तक आ जाने के बाद कोई आदमी इतने चेहरे, भाव, तौर-तरीके और आवाजों को सुन चुका होता है कि उसे हर ऐसी चीजों पर कभी पहले के अनुभवों से मिलती-जुलती दिखती है।
गौतम बुद्ध ने कहा था कि "संसार दुखों से भरा है" (दुःख), और यह उनके चार आर्य सत्यों का पहला सत्य है, जिसका अर्थ है कि जीवन में जन्म, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, प्रिय से बिछड़ना और न चाहने वाली चीज़ों का मिलना दुख के ही रूप हैं, और इन दुखों का कारण हमारी अतृप्त तृष्णा आसक्ति है, जिन्हें अष्टांगिक मार्ग से मिटाया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने अष्टांगिक मार्ग (सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि) का पालन करने का रास्ता दिखाया, जो मन को शांत करने और जीवन को संतुलित बनाने की विधि है।
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