नांदेड़ को अलविदा
Y K SHEETAL
JOURNALIST
Sunday, January 25, 2026
Saturday, January 17, 2026
कामोठे डायरी
समेटने का वक्त
समेटना आसान नहीं होता लेकिन मेरे मामले में यह उतना कठिन नहीं रहा। मुझे याद है बच्चों के कपड़े रखने के लिए हमने आलमीरा लंबे समय तक नहीं लिया था और अमेजन या फ्लिपकार्ट से तीन-चार हजार में पाईप और कपड़े का एक आलमीरा लिया था जो लंबे समय तक चला। जब यह पता हो कि यह घर अपना नहीं, यह ईमारत अपनी नहीं, यहां के लोग अपने नहीं, यहां की चीजें अपनी नहीं, कुछ भी अपना नहीं तो फिर क्यूं वहां पैसे लगाना...!
ये रविवार समेटने के नाम रहा। सबकुछ समेटना। कपड़े, किताब और अन्य चीजें।
भावनाएं बिखरी नहीं, दृढ रहीं। हो सकता है ऐसा इसलिए हुआ हो क्योंकि पापाजी के सामान और मां के सुहाग की निशानियों को जमा करके घर से बाहर करते हुए अभी महीना ही बीता था।
अटैचमेंट। यही सब दुख की जड़ है। खुद से अरजा हुए एक-एक सामान अपने हाथों से दूसरे को दे देना। आसान तो नहीं होता है लेकिन अगर इस लड़ाई को नहीं जीता गया तो जो युद्ध है उसे कैसे जीता जा सकेगा। क्यूं याद करूं कि मैंने उस सोफा-कम-बेड को कब लिया या फिर आलमीरा को लेते वक्त कितना तैयार था मैं। घर में एक-एक चीज जोड़ना और फिर उसे उस घर से निकाल देना। खुद मैं भी निकल जाऊंगा अब इस घर से। एक घर जहां गजब का स्ट्रगल रहा लेकिन उस बीच कितनी मीठी-मीठी यादें भी रहीं। एक न एक दिन तो यहां से निकलना ही था।
बच्चों के छोटे कपड़े, भाग्य के वे नोट्स बुक्स जिसको उसने रात-रात भर जगकर पूरा किया था और एक सरकारी नौकरी हासिल की, मेरी मेहनत की वे सब दास्तान जो अनगिनत पन्नों में दर्ज हैं, सबको एक-एक कर कबाड़ वाले तो देते वक्त दिल धक-धक तो तेज करता रहा लेकिन आंखें नम नहीं हुई।
याद है जब दिल्ली से पैकिंग करके निकल रहा था तो आंखें भींग गईं थीं। मेरी भी और उन लोगों की भी जो वहां थे। दिल्ली का कटवारिया सराय छूटा, न्यू अशोक नगर छूटा, मुंबई का घाटकोपर छूटा, एंटोप हिल छूटा दो बार अलग-अलग और अब कामोठे छूट रहा है। जिंदगी तब शायद सफल हो जाएगी जब मैं छुटूंगा उस जमीन से जो मेरे खुद के पैसे से ली हुई होगी। अपना जमीन, अपना घर। पिताजी की अर्थी उस आंगन से निकली जो जमीन उन्होंने खरीदी। मैं भी यही चाहूंगा कि कभी जब मेरी अर्थी निकले तो किराए के मकान से नहीं निकले।
कितना कुछ बदल गया अक्टूबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच। पापाजी का जाना सबकुछ ले गया अपने साथ शायद!
गोविंद, गोविंद...
Wednesday, January 14, 2026
पापाजी की याद में
- संस्मरण (24 दिसंबर 2024)
कोई कितना भी विवश हो लेकिन उतनी विवशता किसी के भाग्य में न लिखी हो जितनी पापाजी के हाथ में लिखी थी। अपने कर्म, आध्यात्मिक संसर्ग, संतुलित जीवनशैली और कठोर अनुशासन की वजह से पापाजी गिरते-पड़ते अपनी विवशता के साथ न केवल पूरी जिंदगी सामंजस्य बनाते रहे बल्कि उस गट्ठर को भी पग-पग पर संभाले रहे जो दिन-ब-दिन वृहत और जटिल होता गया। पापाजी को भले ही उस गट्ठर के अलग-अलग हिस्सों से खरोंचे आती रही हो और वह घायल और लहूलुहान होते रहे, लेकिन पथराई आंखों और डगमगाते कदमों से भी भगवान-भगवान करके उस गट्ठर को उन्होंने कभी न टूटने दिया और न गिरने दिया। झूठ-सच और कूटनीतिक तरीकों का प्रयोग भी वह गट्ठर को संजोए रखने में करते गये। धर्म निभाने को उन्होंने अपने जीवन के उदाहरणों से परिभाषित कर दिया।
धर्म को लेकर जो उनके अपने दर्शन थे वह बदलती परिस्थितियों के अनुरूप कई बार उनके लिए धर्मसंकट पैदा करते थे। एकतरफ बटखरे पर कुछ भी रखा जाए पापाजी दूसरी तरफ धर्म रखते थे और उनका पलरा हमेशा भारी रहता था। सहमतियों-असहमतियों के बीच यह उनका तिलस्मी अंदाज था कि उनके आंख में आंख डालकर किसी की कुछ कहने की हिम्मत कभी नहीं होती थी। उनको क्रोध विरासत में मिला था और मुझे या भैया को जब गुस्से में चिल्लाते देखते तो कहते थे "इ त खून म ही छै"।
वह हर छोटी-बड़ी चीज को लेकर अतिरिक्त सतर्क रहते थे और किसी भी सुपर कंप्यूटर के स्टोरेज से बड़ा उनका स्टोरेज था जहां वह हर तरह की स्मृतियों को संजोए रखते थे। वह प्रतिक्रियावादी थे और इसका सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू था। इसी स्वभाव की वजह से वह उर्दू सीखे थे और इसी वजह से वह पारिवारिक चक्रव्यूह में कई बार फंसते दिखते थे। वह किसी भी चीज को भुला नहीं पाते थे, खासकर जिसे वह अपना अपमान समझते थे।
अगर वह किसी के साथ सहयोगात्मक थे तो उसकी वजह उनके स्मृतियों में बैठी घटनाएं थीं और अगर वह किसी को लेकर वस्तुनिष्ठ या उदासीन थे तो उसकी भी उनकी अपनी वजहें थीं। उर्दू, कैथी, अंग्रेजी, हिंदी के अलावा वह जिस भाषा को समझते थे वह था "वाइब्स"। जो उनकी नजर से एक बार किसी वजह से गिर गया हो वह कभी नहीं उठा भले ही इसका भ्रम होता रहा हो।
भैया ने जब घर का समय-समय पर मरम्मत करवाया और कायाकल्प किया था तो लैट्रिन के लिए काम करवाते वक्त वह इसका ध्यान रख रहे थे कि जमीन के हिस्सा कहीं ऐसा-वैसा न हो कि भाइयों के बीच में झगड़ा हो! भाग्य की नौकरी लगने के बाद जब पहली सैलरी से उनको दस हजार रुपये दिया जाने लगा तो वह बोले "बेटा क साथ-साथ अब बहुओ क रुपया लेबय की..."। इस बात पर मैंने आपत्ति भी जताई लेकिन वह टस से मस नहीं हुए। चौंकाने वाली बात यह रही कि भाग्य को जब मैंने यह कहा तो वह मेरी तरफ होने की बजाय पापाजी के तर्क से ही सहमत थी और बोली कि पापाजी की तरफ से सोचोगे तो समझ पाओगे। जैसे बाप की स्थिति कोई बेटा तब समझता है जब वह खुद बाप की जिम्मेदारी निभाना शुरू करता है वैसे ही पापाजी की पूरी स्थिति और उनके प्रतिक्रियावादी स्वभाव को समझना उसी से हो पाएगा जो तपती धूप, शीतलहरी और मूसलाधार बारिश में उन पगडंडियों पर होते हुए गुजरेगा जिसपर वह आजीवन गुजरे।
देहाती परिवेश में प्राथमिक शिक्षा, टाइपिस्ट से धीरे-धीरे स्थाई नौकरी, शादी, संपूर्ण समर्पण के साथ मां को पढ़ाना, बड़े-बड़े फैसले लेना जिसमें बेगूसराय में जमीन, अपना स्कूल खोलना, बरतन खरीदकर भाड़े पर देना, घर में किराएदार रखना, शादी-ब्याह, केस-मुकदमे एवं स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें, आकस्मिक खर्च आदि पर अगर एक नजर दौड़ाई जाए तो लगेगा कि उन्होंने अपने चादर से पैर बाहर निकाल-निकालकर सबकुछ अकेला किया।
चार ईंटों को चार कोनों पर रखकर उसके ऊपर काठ पसारकर, लैंप-लालटेन-डीबिया में रात-दिन तैयारी करते-करते जब भैया बीएचयू पहुंचे और फिर उनको नौकरी मिली तो पापाजी की कठोर तपस्या सार्थक हुई। भैया धीरे-धीरे पापाजी की सभी बड़ी जवाबदेही में साझेदार बने और एक ऐसा सपूत बनकर उभरे जो कहीं भी रहे अपना एक पैर हमेशा घर में टिकाए रहे।
अरजने की एक प्रवृति उनमें थी और वह कुछ भी नई चीज को देखते तो उनकी आंखों में चमक आ जाती थी। वो किसी भी चीज को बेचने के पक्ष में कभी नहीं होते थे चाहे कबार की तरह सालों पड़ा उनका लूना हो या फिर जर्जर पर चुका ट्रंक। यहां तक कि बगीचे की टूट चुकी चौंकी भी नई चौंकी आने के बावजूद वह नहीं हटाए थे और उसको अन्य इस्तेमाल में लाते थे। जो अरजता है वही समझता है, यह आवाज पापाजी के अंदर से सुनाई देती थी। जब पापाजी मुंबई आए थे तो मैंने एक आलमीरा खरीदा था। मां और पापाजी ने उसकी पूजा की थी और स्वास्तिक बनाया था। पापाजी उसको दोनों हाथ से पकड़कर कहे थे, "इ एगो चीज भे गेलय"। पापाजी बहुत खुश थे और मिठाई मंगवाए थे। हम और भाग्य सोचे नहीं थे कि एक आलमीरा पापाजी को इतनी खुशी देगा। भैया और दीदी की जमीन के वह पहरेदार की तरह रहते थे। फोन पर कभी-कभी कहते आय जमीन पर गेलिय-र तो हमको पूछना पड़ता कहां-किसके जमीन पर! एक बार मैंने बोल भी दिया था कि आप काहे जाते हैं...! भाग्य की पोस्टिंग पूर्णिया होने के बाद जो तत्कालीन स्थितियां बनी वह अजीब थी। आधा घर शिफ्ट करना था और मेरे रहने में झिझक थी क्योंकि वहां मेरा ससुराल था। बात घरजमाई या फिर भाग्य का अलग किराए पर अकेले रहने के बीच टिकी थी। पापाजी की सलाह से बीच का रास्ता निकाला गया। जमीन खरीदने के समय हम और भाग्य एकदम अकेले पड़े थे क्योंकि न रुपये उतने थे न जमीन के कागज की उतनी समझ थी और न किसी पे पूरा-पूरा भरोसा हो पा रहा था। पापाजी से मैंने बहुत गोपनीय तरीके से कहा था कि जमीन का पेपर देख दीजिएगा क्योंकि आप ही हैं जिसपर इतना भरोसा मैं कर पा रहा हूं! उनसे कहा था किसी को बोलिएगा मत लेकिन पापाजी ने भाग्य को बता दिया। वह मुझसे ज्यादा भाग्य पर भरोसा करते थे। वह मेरे बर्ताव से परेशान रहते थे और भाग्य को ही कुछ बोलते थे।
महाकुंभ के लिए योजना जब मन में अंकुरित हो रही थी तो उसकी रूपरेखा तय करने में तरह-तरह की दिक्कतें आनी शुरू हुई। उस जटिल योजना को लेकर मन इतना सशंकित था कि पापाजी को बक्सर पार करने के बाद पता चला था उन्हें महाकुंभ ले जा रहे हैं। वह भी उन्हें पता नहीं चलता अगर फोन पर मेरी बात पर वह ध्यान नहीं देते! यह पापाजी का प्रताप ही था जो महाकुंभ का दुर्लभ स्नान उन्होंने मां के साथ हाथ पकड़कर किया। बड़ी दीदी हर कदम पर साथ खड़ी रहती थी और वही मेरा "एस ओ एस" या "एमरजेंसी कांटैक्ट" होती थी। मेरी निजी जिंदगी के बड़े फैसलों की तरह पापाजी-मां के तीर्थ को लेकर जो भी योजना हम और भाग्य बनाते थे उसपर अंतिम ठप्पा बड़ी दीदी का ही होता था। जगन्नाथ पुरी का आईडिया उसका ही था। उससे विचार-विमर्श करके की मेरे फैसले होते रहे और जब पापाजी योजना के बारे में पूछते तो मैं बताता कि बड़ी दीदी से बात हो गई है।
हवाईजहाज पर उनको उड़ाने का सपना बड़े भैया-भाभी की मदद के बिना पूरा नहीं हो पाता। पटना में हार्दिक और सिम्मी की पूरी व्यवस्था भाभी और भैया ने की थी तभी पापाजी हवाईजहाज से काशी जा पाए। वहां मंगला आरती के साथ-साथ देव दीपावली में गंगा आरती का इतना अच्छा संयोग बना कि मैं सोचता ही रह गया कि ऐसा हुआ कैसे!
लाइबिलिटी वह कभी नहीं बने। उनके देहांत के बाद भी कचहरी में उनका बकाया साढ़े सात सौ रुपये लेकर उनका कोई क्लाइंट छोटे मामूजी से मिला।
मैंने अपने कई शौक उनके साथ पूरे किए थे जिसमें प्लेटफॉर्म पर उनके साथ मार्निंग वाक, हवाई जहाज पर उनके साथ उड़ना, विदेश यात्रा (नेपाल), रामेश्वरम वगैरह यादों में हमेशा रहेगा। मेरी कुछ और प्लानिंग थी जो नहीं हो पाई। उसका अफसोस मुझे है लेकिन संतुष्टि है कि वो मेरा शौक था न कि उनका। उनके मुंह पर हरिहरनाथ, जनकपुर, अयोध्या और रामेश्वरम था जो हो चुका था। मां को लेकर वह सशंकित थे कि उनके जाने के बाद मां को दिक्कत होगी। उन्होंने एक बार बहुत उदास होकर कहा था कि वह चाहते हैं कि मां उनके सामने विदा हो जाए। वह पुलिस-थाने के चक्कर के दौरान जो मां का हश्र देखे थे वैसी आहट फिर से महसूस करके घबराए थे।
खैर, होनी जो थी सो हुई! पापाजी किसी के सामने कभी झुके नहीं, अलग बात है कि परिस्थितियों ने कई बार बेबस कर दिया लेकिन उनके स्वभाव में जो जड़ता थी वह गजब की थी। वह बस मां से हार जाते थे। मेड को लेकर मां ने उनको झुका दिया था और उन्होंने अपनी हार मान कर मेड बंद करा दिया। मैंने उनको मां के अलावा और किसी के सामने झुकते कभी नहीं देखा।
वह मेरे शौक को कैसे पूरा करते थे उसका उदाहरण उनकी स्कूटी है। 2015 तक वह साईकिल से चलते थे और मेरे मन में एक ईच्छा थी कि पापाजी को स्कूटर दें। तब मेरी सैलरी पच्चीस हजार रुपए थी और मैं मुंबई में नया-नया था। अच्छी बात यह थी कि मेरे ऊपर तब परिवार जैसी कोई जवाबदेही न थी और न क़र्ज़ था। बड़ी दीदी को भी मैं अपनी इस इच्छा से अवगत करा चुका था। हुआ ये कि जब मैं पापाजी, हार्दिक और सिम्मी के साथ द्वारका, सोमनाथ, आगरा, मथुरा और अयोध्या होकर बेगूसराय आया तो मेरे पास बस तीस हजार रुपए बचे। मेरी छुट्टियां खत्म हो रही थीं और मुझे मुंबई लौटना था मां-पापाजी, हार्दिक-सिम्मी को बेगूसराय छोड़कर। स्कूटी तब पचहत्तर हजार रुपए की थी लेकिन बेगूसराय डीलर के यहां वेटिंग था। मैं पागलों की घर में चिल्ला रहा था क्योंकि न कोई इतना पहचान था कि कर्ज लूं किसी से और मन इस बात के लिए राजी नहीं था कि पापाजी को स्कूटी दिए बिना वापस जाऊं। आखिरकार मैंने पापाजी को सच-सच सारी बात बता दी कि मेरे पास रुपये कम गये हैं लेकिन आपको स्कूटी लेनी है। पापाजी तो पापाजी थे। बोले मन छोटा मत करो। फिर मैंने होंडा कस्टमर केयर से बात करके अर्जेंट डिलीवरी की मांग की तो खगड़िया डीलर के यहां तत्काल डिलीवरी की बात हुई। हम और पापाजी बस से खगड़िया निकले। वहां पापाजी ने मां के पसंद के रंग की स्कूटी ली और मैंने अपने पूरे रुपये वहां खाली कर दिए। उसके बाद पापाजी की तरफ देखा तो पापाजी ने अपना एटीएम निकाला और हिसाब बराबर कर दिया। मेरा एक सपना पूरा हुआ और मैं पापाजी को खगड़िया में स्कूटी पर बिठाकर बखरी दुर्गा स्थान ले गया और विधिवत पूजा-अर्चना के बाद हम घर आए। उनको अपनी कार पर घुमाने का सपना भी पूरा हुआ। मन तब तृप्त हुआ था जब अयोध्या में मैं थोड़ी देर आराम कर रहा था और भाग्य गाड़ी चला रही थी। पापाजी बोलते थे "तोरा स अच्छा दुल्हिन चलाबै छै"।
कुछ ही महीने पहले मां-पापाजी का पासपोर्ट बनवाया था जो कि एक शौक था। मेरे पास पैसे हों न हों अरमान आसमान पर होते थे और भाग्य कई बार कहती थी कि आपसे बात करते ही मेरा सरदर्द करने लगता है। मैं बोलता था पापाजी साथ में हैं तो काहे लोड ले रही हो। पशुपतिनाथ से लौटते हुए ड्राइवर ने गाड़ी पेट्रोल पंप पर लगा दी और मैं सहम गया। मेरे पास क्रेडिट कार्ड ही था जिसपर इंटरनेशनल एक्सेस नहीं था। नेपाली करेंसी तो नहीं ही थी मेरे पास इंडियन रुपये भी खत्म हो चुके थे। भगवान भरोसे ही मैंने पूरा प्लानिंग किया था। अगर भारत में होते तो क्रेडिट कार्ड से पेमेंट करते। पापाजी से बड़ी हिम्मत करके मैंने पूछा कि कुछ रुपये हैं? पापाजी ने अपने स्पेशल पाकेट से पांच सौ निकाला। उतने का फ्यूल हम लिए और किस्मत ऐसी रही कि हम बार्डर पार रात में उतने ही फ्यूल से कर पाए। ड्राइवर बदमाश था लेकिन पापाजी ने हम सबको बचा लिया था। सीतामढ़ी आकर फिर हमलोगों ने राहत की सांस ली थी।
मुझे इस बात का हरदम अफसोस रहेगा कि पापाजी के संदर्भ में मैं भैया-दीदी की तरह नहीं हो पाया! मां-पापाजी की हर बारीक जरूरतों को जितना भैया समझे और दीदी समझी मैं उस स्तर के आसपास भी नहीं पहुंच पाया!
पापाजी जहां भी होंगे मां की चिंता ही कर रहे होंगे क्योंकि जो जिंदगी उन्होंने जिया है उसके बाद मां को लेकर उनकी जितनी चिंताएं या शंकाएं थी वे सब वाजिब थीं। मां जितना खुश रहेगी पापाजी की आत्मा को उतना ही शांति मिलेगा। मां खुश तभी रहेगी जब वह पापाजी की इच्छा के अनुरूप ही चीजों को होते हुए देखेगी।
Saturday, January 10, 2026
एक उम्र तक आ जाने के बाद कोई आदमी इतने चेहरे, भाव, तौर-तरीके और आवाजों को सुन चुका होता है कि उसे हर ऐसी चीजों पर कभी पहले के अनुभवों से मिलती-जुलती दिखती है।
गौतम बुद्ध ने कहा था कि "संसार दुखों से भरा है" (दुःख), और यह उनके चार आर्य सत्यों का पहला सत्य है, जिसका अर्थ है कि जीवन में जन्म, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, प्रिय से बिछड़ना और न चाहने वाली चीज़ों का मिलना दुख के ही रूप हैं, और इन दुखों का कारण हमारी अतृप्त तृष्णा आसक्ति है, जिन्हें अष्टांगिक मार्ग से मिटाया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने अष्टांगिक मार्ग (सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि) का पालन करने का रास्ता दिखाया, जो मन को शांत करने और जीवन को संतुलित बनाने की विधि है।
